मुखपृष्‍ठ

पाँचवी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी, 10-14 मार्च, 2014, इलाहाबाद
(विषय: समाजवादी संक्रमण की समस्‍याएँ)

सोवियत समाजवादी प्रयोग और समाजवादी संक्रमण की समस्याएं : इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएं

“सोवियत समाजवादी प्रयोग और समाजवादी संक्रमण की समस्याएं : इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएं” आलेख प्रस्तुयत करते हुए अभिनव सिन्हाा

“सोवियत समाजवादी प्रयोग और समाजवादी संक्रमण की समस्याएं : इतिहास और सिद्धान्त की समस्याएं” आलेख प्रस्तुोत करते हुए अभिनव सिन्हा

विचारधारा और कार्यक्रम के प्रश्न पर जिस विभ्रम का आज कम्युनिस्ट आन्दोलन शिकार है उसे दूर करने में एक प्रमुख मुद्दा बीसवीं सदी के समाजवादी प्रयोगों के पुनर्मूल्यांकन का भी है। और इन प्रयोगों में भी सोवियत समाजवाद का मुद्दा आज भारी विवाद का विषय बना हुआ है। इसका एक कारण यह है कि सोवियत समाजवाद के पूरे दौर में, यानी कि 1917 से 1953 तक, जो प्रयोग हुए वे गम्भीर विचारधारात्मक बहसों के बीच हुए। मार्क्स और एंगेल्स के दौर में समाजवादी अर्थव्यवस्था और राज्य के बारे में कुछ आम राजनीतिक प्रस्थापनाएँ पेश की गयी थीं, लेकिन ठोस तौर पर एक समाजवादी अर्थव्यवस्था किस रूप में काम करेगी, सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व किस रूप में काम करेगा, उसका ढाँचा क्या होगा, उसके तहत पार्टी और राज्य की क्या भूमिका होगी और उनके अन्तर्सम्बन्ध कैसे होंगे, पार्टी व वर्ग के बीच क्या रिश्ता होगा, इन प्रश्नों पर कोई ठोस कार्यक्रम या ‘ब्लू प्रिण्ट’ नहीं पेश किया गया था, और न ही ऐसा किया जा सकता था। मार्क्स व एंगेल्स हवा में किले बनाने के ख़ि‍लाफ़ थे और उन्होंने भावी समाजवादी व्यवस्था के तमाम पहलुओं के ठोस प्रश्नों को भविष्य का एजेण्डा माना था। उस समय एक आम दिशा और बुनियादी सिद्धान्तों को ही सूत्रबद्ध किया जा सकता था और यह कार्य पहले समाजवादी राज्य को नेतृत्व देने वाली पार्टी और उसके नेतृत्व का था कि इस प्रश्न को एजण्डे पर ले कि इस आम दिशा और बुनियादी सिद्धातों के आधार पर समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति का समाजवादी रूपान्तरण कैसे किया जाये और उसमें पार्टी की क्या भूमिका हो। इसलिए सोवियत समाजवादी प्रयोग के इतिहास का आलोचनात्मक अध्ययन वास्तव में वर्ग, राज्य, पार्टी, ट्रेड यूनियन और इन सबके आपसी सम्बन्धों आदि के प्रश्नों पर सही मार्क्सवादी अवस्थिति के निःसरण से जुड़ा हुआ है। अक्टूबर क्रान्ति के बाद सोवियत संघ में पहली बार एक सर्वहारा सत्ता के निर्माण ने इन बहसों को शुद्ध सिद्धान्त और आरम्भिक वर्ग संघर्ष के राज्य से निकालकर समकालीन इतिहास और राजनीति के राज्य में पहुँचा दिया और भावी सैद्धान्तिक विकास का भी रास्ता खोल दिया। बोल्शेविक पार्टी ने इन प्रश्नों को सैद्धान्तिक और व्यावहारिक तौर पर किस रूप में हल किया, यह सिर्फ़ सोवियत समाजवाद के मूल्यांकन के लिए नहीं बल्कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद के लिए सर्वकालिक ऐतिहासिक, सैद्धान्तिक और राजनीतिक महत्व रखता है।
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अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की आम दिशा विषयक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का ऐतिहासिक दस्तावेज़ः आधी सदी बाद एक विचारधारात्मक पुनर्मूल्यांकन

हमेशा की तरह आज भी कठमुल्लावाद एवं अतिवामपंथ तथा संशोधनवाद – इन दोनों सिरों के भटकाव विश्व स्तर पर और हमारे देश में भी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच मौजूद हैं। लम्बे समय तक कठमुल्लावाद की मौजूदगी या “वाम” दुस्साहसवादी लाइन का ठहराव भी अंततोगत्वा संशोधनवादी भटकाव के दूसरे छोर तक ही ले जाता है। कहा जा सकता है कि आज भी मुख्य ख़तरा भाँति-भाँति के चोले पहनकर आने वाला संशोधनवाद ही है, जिसके विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष के बिना कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन का पुनरुत्थान कत्तई सम्भव नहीं। पर साथ ही, दूसरे छोर के भटकाव की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए आधी सदी बाद, आज 1963 की आम दिशा के युगांतरकारी दस्तावेज़ को और उसकी व्याख्या करने वाली नौ टिप्पणियों को, नये परिप्रेक्ष्य में, अहसास के नये धरातल के साथ, गहराई से समझने की और उसकी सारवस्तु को आत्मसात करने की ज़रूरत है।
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स्तालिन और सोवियत समाजवाद

विश्वभर के पूँजीपतियों को आज फिर कम्युनिज़्म का भूत पहले किसी भी समय से कहीं अधिक सता रहा है। मज़दूर वर्ग की विचारधारा और क्रान्ति के विज्ञान मार्क्सवाद पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं; मार्क्सवाद, बीसवीं सदी की क्रान्तियों और समाजवाद के प्रयोगों और कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेताओं पर पहले से कहीं अधिक कीचड़ उछाला जा रहा है। क्योंकि बुर्जुआजी मार्क्सवाद को एक विज्ञान के रूप में नकारने में पूरी तरह से नाकाम हो चुकी है, इसलिए अब उसके बाद कीचड़ उछालने, भ्रम फैलाने और ग़लत जानकारियाँ प्रचारित करने के सिवा अन्य कोई तरीका बचा भी नहीं है; यह काम अपने विशाल मीडिया तंत्र की सहायता से बड़े पैमाने पर कर रही है।
कीचड़ उछालने और भ्रम पैदा करने के पूरे कारोबार में दो प्रकार के लोग हैं – पहले प्रकार के लोग तो मार्क्सवाद और मज़दूर-वर्गीय आन्दोलन के ऐलानिया शत्रु हैं, जबकि दूसरे प्रकार के लोग ‘‘मार्क्सवादी’’ हैं। इन मार्क्सवादियों में से कई बुर्जुआ प्रचार के असर में आए हुए साधारण लोग हैं, कई ‘‘अनुभववादी’’ क़ि‍स्म के क्रान्तिकारी हैं जो मार्क्सवाद, मज़दूर वर्गीय आन्दोलन का इतिहास और बीसवीं सदी की क्रान्तियों के समाजवादी प्रयोगों के अध्ययन के ‘‘मुश्किल’’ काम में हाथ डालने से डरते हैं या ग़ैर-ज़रूरी समझते हैं। कई अन्य हैं जो अपनी अधकचरी मार्क्सवादी समझ से विश्लेषण करते हैं और नतीजे के तौर पर ग़लत विश्लेषण करके भ्रम फैलाते हैं। कुछ अन्य ‘‘क्रान्तिकारियों’’ व ‘‘आवारा-चिन्तकों’’ को मार्क्सवाद में इज़ाफ़ा करने की जल्दी है, इस जल्दी में वे मार्क्सवाद की बुनियादी प्रस्थापनाओं को तिलांजलि दे रहे हैं और नये-नये सिद्धान्त पेश कर रहे हैं। ऐलानिया दुश्मनों और ‘‘मार्क्सवाद’’ के लबादे में छिपे हुए कुत्साप्रचार के कारण बहुत सारे ईमानदार क्रान्तिकारियों और साधारण क़तारों व जनता में भी भ्रामक स्थिति बनी हुई है। इसलिए कम्युनिस्ट आन्दोलन के आगे के विकास के लिए बीसवीं सदी की क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों की सफलताओं और असफलताओं का विश्लेषण करते हुए न सिर्फ़ कुत्साप्रचार का पुख्ता जवाब देगा, बल्कि सही नतीजे निकालने और हासिल किए गए सबकों को आत्मसात करना एक महत्वपूर्ण शर्त है।
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समाजवादी संक्रमण और नेपाली क्रान्ति का सवाल

इक्किसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में नेपाल के क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन के द्वारा ली गई उचाइँ, वैचारिक बहस का सघनता, संविधान सभा लगायत के कुछ व्यवहारिक नऐं प्रयोगों और शान्तिपूर्ण राजनीति में प्रवेश के साथ आर्जित प्रारम्भिक लोकप्रियता छोटे समय में ही एक गम्भीर धक्के का शिकार हो गया है । बीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में सोभियत संघ और पूर्वी युरोप में कथित रूप से समाजवादी सत्ताओं के गिरने (विघटन) के बाद ‘समाजवाद की असफलता’, ‘इतिहास का अन्त्य’, ‘महाआख्यान का अन्त्य’ जैसे रागों के नगाडे बज रहे निराशाजनक समय में भी सगरमाथा के आधार तल से चोटी की ओर चढ रहे जनयुद्ध ने संसार का ध्यान आकृष्ट किया था । विश्व के क्रान्तिकारियों ने नेपाल की ओर आशावादी नजरों से देख रहे थे– ‘हिमालय की ओर देखो, नयाँ विश्व जन्म ले रहा है ।’ लेकिन आज दो दशक पुरे होते न होते वह आस्था डगमगा रहा है । विश्व के कई भाइचारा पार्टीयाँ निराश है । नेपाल के अन्दर भी पिछले दो दशक के माओवादी आन्दोलन का निर्मम आलोचना तथा गम्भीर समीक्षा शुरु हो चुका है और आन्दोलन नऐं शिरे से पुनर्निर्माण के तयारी में जुटा है । प्रस्तुत छलफल पत्र में समाजवादी संक्रमण को सन्दर्भ के तौर पर रखते हुए नेपाली क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्मुख अपने सपनों के रक्षार्थ कैसी–कैसी चुनौतीयों को सामना किया जाना है, इस विषय में कुछ सवालें को खडी की गई है ।
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नेपाली क्रान्तिः विपर्यय का दौर और भविष्य का रास्ता

नेपाली क्रान्ति की गाथा बेहद उतार-चढ़ावों से भरी रही है। नेपाली जनता ने कम्युनिस्टों के नेतृत्व में शानदार बहादुराना संघर्ष में अकूत कुर्बानियाँ देकर क्रान्तिकारी आन्दोलन को उस मुकाम तक पहुँचाया जहाँ एक समय वह सारी दुनिया की जनता के लिए आशा और प्रेरणा का स्रोत बन गया था। लम्बे चले जनयुद्ध के बाद नेपाली क्रान्ति ने राजशाही को इतिहास के कूड़ेदान में धकेलकर एक बड़ी जीत हासिल की। हालाँकि क्रान्ति अभी अधूरी थी लेकिन नेपाल और विश्व की जनता को उससे बहुत उम्मीदें थीं। दूसरी ओर यह भी सच है कि क्रान्ति शुरू से ही अनेक विचारधारात्मक समस्याओं से ग्रस्त थी जो 2008 में संविधान सभा के चुनाव के बाद से बढ़ती गयीं। नेपाल के हालिया घटनाक्रम से अब यह स्पष्ट हो चुका है कि नेपाली क्रान्ति विच्युति, विचलन, भटकाव और गतिरोध के दौर से आगे निकलकर विपर्यय और विघटन की मंजिल में प्रविष्ट हो चुकी है। 10 नवंबर 2013 को सम्पन्न दूसरी संविधान सभा के चुनावों में एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की भारी शिकस्त के बाद इस पार्टी और इसके नेतृत्व की चहुँओर आलोचना हो रही है। यहाँ तक कि नेपाल और भारत सहित अन्य देशों के तमाम अनुभववादी भावुक क्रान्तिवादी बुद्धिजीवी जो विच्युति और विचलन के दौर में नेपाली क्रान्ति का अनालोचनात्मक महिमामंडन कर रहे थे, वे भी अब निराश और हताश होकर मीन-मेख निकालते हुए नेतृत्व को कोस रहे हैं। दरअसल अनालोचनात्मक महिमामंडन और भयंकर पस्ती और निराशा दोनों का स्रोत एक ही है और वह है मार्क्सवादी विज्ञान की समझ का अभाव और समाज को ऐतिहासिक भौतिकवादी नज़रिये से समझने की बजाय अनुभववादी और भावुकतावादी नज़रिये से देखना। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आज जो लोग निराश और हताश होकर कोप भवन में जा चुके हैं वे वही लोग हैं जो कभी अतिउत्साहित होकर माचू पिच्चू के शिखर पर लाल झण्डा फ़हराने के ख़्याली पुलाव पका रहे थे तो कभी सगरमाथा पर लाल झण्डा फहराने को लेकर काफ़ी जोश से भरे थे। इस क़ि‍स्म का अतिउत्साह और निराशा और हताशा दोनों ही मार्क्सवादी विज्ञान के अधकचरी समझ की ही निशानी है। मार्क्सवाद हमें विजय के दौर में भी संयम न खोने और भयंकर से भयंकर पराजय के दौर में भी निराश और हताश होने की बजाय अपनी ग़लतियों का निर्ममता से विश्लेषण कर उन्हें दुरुस्त कर संघर्ष के मोर्चे पर नये संकल्प के साथ जुट जाने की शिक्षा देता है। इसलिए नेपाली क्रान्ति के इस विपर्यय के दौर में भी ज़रूरत इस बात की है कि इसकी कमियों, कमज़ोरियों और विघटन के स्रोतों का निर्ममता से विश्लेषण किया जाये और भविष्य की राह निकाली जाये।
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महान बहस के 50 वर्ष

मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन से लेकर स्तालिन तथा माओ तक कम्युनिस्ट आन्दोलन का सैद्धान्तिक विकास संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष करते हुए हुआ है। विकास के इस पूरे दौर में स्तालिन कालीन सोवियत यूनियन और माओ कालीन चीन के महान क्रांतिकारी समाजवादी प्रयोगों ने इन सिद्धान्तों को व्यवहार में लागू किया और समाजवादी संक्रमण की विचारधारात्मक समझ को और परिपक्व बनाया।
सर्वहारा क्रांतियों के विचारधारात्मक विकास की इस कड़ी में 1963-64 में माओ के नेतृत्व में चली महान बहस ने आधुनिक संशोधनवाद के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष करते हुये समाजवादी संक्रमण के बारे में पूरी दुनिया के कम्युनिस्टों को एक सुव्यवस्थित मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धान्त से हथियारबन्द किया। इस बहस ने स्तालिन कालीन सोवियत यूनियन के अनुभवों और ख्रुश्चेव द्वारा पूँजीवाद की पुनर्स्थापना का सैद्धान्तिक निचोड़ प्रस्तुत किया जो समाजवादी संक्रमण को समझने मे एक मील के पत्थर है। इन अनुभवों के आधार पर महान बहस में माओ ने चीन में 1966 से 1976 तक चली महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की पूर्वपीठिका तैयार की।
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Long Live Marxism-Leninism-Mao Zedong Thought or Maoism!

We have to remember the immortal contributions of Comrades like Marx,Lenin,Stalin and Mao Tse Tung. The achievements of U.S.S.R from 1917-1956 and China from 1949-1976 are unprecedented in the history of mankind. Socialist U.S.S.R was responsible for the defeat of Nazi Germany in World War 2.Under Stalin it made strides in the field of health, education ,industrial production and employment which no capitalist country could even compare with. Similarly particularly during the Cultural Revolution under Mao China had created the revolutionary democratic Society ever created in mankind which incorporated a revolution within a Socialist Society itself.

Mao Tse Tung made a historic contribution to the development of Marxism-Leninism in the spheres of philosophy, practice and Theory. It was Mao who developed the first military line of the proletariat in semi-colonial third world countries through his work on protracted peoples War..Com Mao created the most democratic society in the history of mankind in the Chinese revolution from the Socialist to the stage of the Cultural Revolution. Mao was the first Marxist to recognize the need for continuing class struggle under the dictatorship of the Proletariat. He thus founded the theory of continuous revolution under the dictatorship of the proletariat. We may call it Mao Zedong Thought or Maoism. In the Great proletarian Cultural Revolution the C.C.P made epoch path –breaking innovations and experiments never witnessed before in mankind. The formation of revolutionary Commitees created an entirely new revolutionary form of power and the proletariat enjoyed democracy as never before in history. Ranks were abolished in the army. The most innovative forms experiments ever witnessed in mankind were made in the fields of industrial production,agriculture,education and medicine.

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उत्तर-मार्क्सवाद के ‘कम्युनिज़्म’: उग्रपरिवर्तन के नाम पर परिवर्तन की हर परियोजना को तिलांजलि देने की सैद्धान्तिकी

“उत्तर-मार्क्सवाद के ‘कम्युनिज़्म’” इस विषय पर एक आलेख की ज़रूरत क्यों? क्या मार्क्सवाद का दौर बीत चुका है और कोई उत्तर-मार्क्सवादी दौर शुरू हो गया है? इस आलेख के आरम्भ में ही हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमारे विचार में एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद के सामने कोई संकट नहीं है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मार्क्सवाद पर विचारधारात्मक हमलों का सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है। फ़र्क बस इतना है कि 1989 में बर्लिन की दीवार के गिरने और 1990 में सोवियत संघ के औपचारिक विघटन के साथ विचारधारा और राजनीति की दुनिया में पूँजीवादी विजयवाद की उन्मत्त घोषणाओं की तरह ये नये बौद्धिक आक्रमण उतने खुले और आवरणहीन नहीं हैं। आज के दौर में, एक बार फिर, बुर्जुआ सांस्कृतिक और बौद्धिक उपकरण मार्क्सवाद पर नये हमले कर रहे हैं और कम्युनिस्ट आन्दोलन से लेकर छात्रों, बुद्धिजीवियों आदि के बीच एक विभ्रम पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी अनायास नहीं है कि पूँजीवाद, अपने वर्चस्वकारी मैकेनिज़्म के ज़रिये सहज गति से तमाम क़ि‍स्म के रंग-बिरंगे ‘रैडिकल’ बुद्धिजीवियों को पैदा कर रहा है, जो मार्क्सवाद की बुनियादी प्रस्थापनाओं पर चोट कर रहे हैं। उत्तर-मार्क्सवादियों की एक पूरी धारा है जो उग्र-परिवर्तनवादी जुमलों का सहारा लेकर मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी अर्न्तवस्तु पर निशाना साध रही है। ऐलन बेज्यू, स्लावोय ज़ि‍ज़ेक, एण्टोनियो नेग्री, माइकल हार्ट, याक्स रैंशिये, अर्नेस्टो लाक्लाऊ, चैण्टेल माउफ आदि जैसे तमाम “रैडिकल दार्शनिक” इसी उत्तर-मार्क्सवादी विचार-सरणि से आते हैं। एक बात जिसे यहाँ पर विशेष तौर पर रेखांकित करने की ज़रूरत है वह यह कि मार्क्सवाद पर जो भी विचारधारात्मक-बौद्धिक हमले होते रहे हैं या फिर हो रहे हैं, उनके नाम नये हो सकते हैं लेकिन उनकी अन्तर्वस्तु में कुछ भी नया नहीं है, जैसा कि एक बार एक अलग सन्दर्भ में ज्याँ पॉल सार्त्र ने कहा था। सार्त्र ने कहा था कि मार्क्सवाद-विरोधी विचारधाराएँ जो कुछ सही कह रही हैं, वह मार्क्सवाद पहले ही कह चुका है और जो कुछ वे नया कह रही हैं वह ग़लत है! उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, प्राच्यवाद, उत्तर-प्राच्यवाद, सबऑल्टर्निज्म जैसी तमाम ‘उत्तर-’ विचार-सरणियों की “चुनौतियों” का क्या हश्र हुआ, यह हम सभी जानते हैं। ये सभी विचार-सरणियाँ विचारधारात्मक कोमा में पड़ी आख़ि‍री साँसें गिन रही हैं! उत्तर-मार्क्सवादी दर्शन और सिद्धान्त इन्हीं क़िस्म-क़िस्म की ‘उत्तर-’ विचार सरणियों का एक ‘अपग्रेडेड वर्जन’ है।
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बोलिवारियन विकल्पः विभ्रम और यथार्थ

यह 21वीं सदी का नया “समाजवाद” क्या है? इसका आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम क्या है? क्या अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करणों का समय सच में ही बीत चुका है? क्या ‘शीत प्रासाद पर धावे’ का युग बीत चुका है? मेस्ज़ारोस के शब्दों में, क्या क्रान्तियों के नये संस्करण अब चुनाव के रास्ते सरकारों में जाने के रूप में ही हो सकते हैं? इस प्रकार के तमाम सवालों का जवाब देकर ही इस ‘21वीं सदी के समाजवाद’ की मूल अन्तर्वस्तु की सही और सटीक पहचान की जा सकती है क्योंकि साम्राज्यवाद-विरोधी होना, कल्याणकारी नीतियों को लागू करना और लोकप्रिय जनवादी संस्थाओं की स्थापना अपने आप में समाजवाद का द्योतक नहीं है। सच है कि अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण कहीं घटित होते नज़र नहीं आ रहे हैं। अरब जनउभार, ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो’ आन्दोलन व यूरोप से लेकर एशिया और पूरी दुनिया में उठे छिटपुट आन्दोलन किसी युगान्तरकारी राजनीतिक व आर्थिक-सामाजिक परिवर्तनों की तरप़फ़ इशारा नहीं कर रहे हैं। आज साम्राज्यवाद के ऐसे दौर में जब पूँजीवाद-विरोधी जनान्दोलन स्वतःस्फूर्त रूप से फूटते हुए नज़र आ रहे हैं लेकिन कहीं भी पूँजीवाद का कोई व्यावहारिक विकल्प खड़ा होता नहीं नज़र आ रहा है, जब अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के निकट भविष्य में निर्मित होने की कोई सम्भावना नहीं नज़र आ रही है, तो ऐसे में कोई भी जनपक्षधर स्वप्नद्रष्टा व्यक्ति दो तरह की उम्मीदों में जी सकता है। एक तो है वैज्ञानिक आशावाद जिसमें आशावाद की बुनियाद किसी ठोस समाजवादी मॉडल की वर्तमान दुनिया में मौजूदगी या ऐसे किसी मॉडल के निकट भविष्य में निर्मित हो जाने की सम्भावना नहीं है बल्कि एक वैज्ञानिक इतिहासबोध, जनता और समाज विकास के विज्ञान पर भरोसा होता है। दूसरे किस्म की उम्मीद है एक प्रकार का छद्म आशावाद। इतिहास बोध से वंचित और जनसंघर्षों से कटे तमाम बुद्धिजीवियों को अपने निराशावाद को ढकने के लिए किसी न किसी छद्म विकल्प की ज़रूरत होती है ताकि वे एक छद्म आशावाद में जी सकें। जनता से कटे और हवाई-गुलाबी सपनों में जीने वाले ऐसे बुद्धिजीवी जो कुछ मौज़ूद है उसी से काम चला लेने के पक्षधर होते हैं और पुरानी चीज़ों को ही नये नाम देकर उसे ही नये के तौर पर प्रस्तुत करते रहते हैं ताकि इनका जश्न मना सकें और नया विकल्प खड़ा करने की ज़हमत से भी बचा जा सके। आज हम मेस्ज़ारोस, लोबोवित्ज़, मारता आनेकर, और ‘पिंक टाइड’ के रंग में रंगे ‘मंथली रिव्यू स्कूल’ से जुड़े बुद्धिजीवियों को इसी प्रकार के छद्म आशावाद पालने वाले बुद्धिजीवियों के रूप में देख सकते हैं। न सिर्फ ये लोग बल्कि हमारे देश में भी ऐसे ग्रुप और बुद्धिजीवी मौज़ूद हैं जो इस ‘निराशावादी आशावाद’ के शिकार हैं। चूँकि इन्हें अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण कहीं संघटित होते नज़र नहीं आ रहे हैं, इसलिए ये अपनी निराशा और एक प्रकार के क्षोभ को छिपाने के लिए बोल उठते हैं कि अब ‘शीत प्रासाद पर धावे’ का दौर बीत चुका है और अब लातिन अमेरिकी बोलिवारियन विकल्प ही आज का समाजवादी विकल्प है; कि अब हम मार्क्स और लेनिन के दौर से काफी आगे निकल चुके हैं और अब बोलिवारियन विकल्प ही समाजवाद के स्वप्न का समकालीन साकार रूप है।
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The Promise that Never Was: A Critique of Post-1968 European “Autonomous” Left

We have seen and heard people coming up with ideas where party has to be a tail end of the working class instead of providing a conscious leadership. The transition or the leap that they take from the classes and the masses and their willingness to learn see them forming strange alliances with reactionary elements. However, one of the problems of the left movement in India is that they have to invoke Marxism-Leninism in order to gain legitimacy and when all has been said and done one has to ask them that despite their original thinking on almost every aspect of Marxism have we decisively moved away from the world-historic moment where the dictatorship of the proletariat, the question of the Bolshevik party and the question of the state is redundant. If not, can we not then infer that their seduction with the new comes at the cost of dialectics. And less said about the NGOs the better. But we do see a change in modus operandi of the NGOs. They are now coming in the garb of Marxist-Leninists but armed with the concept and lots of emotions about some esoteric “community”. The question to them remains the same. And it’s no strange coincidence that the two find themselves on the same side.

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स्वागत वक्तव्य पेश करते हुए अरविन्द स्मृ्ति न्यास की मुख्य न्यासी का. मीनाक्षी

स्वागत वक्तव्य पेश करते हुए अरविन्द स्मृ्ति न्यास की मुख्य न्यासी का. मीनाक्षी

संगोष्ठी में उपस्थित सभी कामरेड्स,

हार्दिक क्रान्तिकारी अभिवादन!

हम पाँचवीं अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ की ओर से आपका दिल से स्वागत करते हैं।

हमारे बीच से कामरेड अरविन्द को विदा हुए छह वर्षों का समय बीत चुका है। एक ऐसे योग्य, प्रतिभावान, ज़िम्मेदार और ऊर्जस्वी कामरेड को एक बेहद कठिन समय में खो देना निश्चय ही हमारे लिए बेहद कठिन था और हमारे साहस का इम्तिहान था। हमने पूरे संकल्प और युयुत्सु भावना के साथ शोक को शक्ति में बदलने की कोशिश की और एकदम धारा के विरुद्ध तैरते हुए सर्वहारा वर्ग की मुक्ति और भारतीय क्रान्ति के दिशा-सन्धान से जुड़े सैद्धान्तिक-व्यावहारिक प्रयोगों को आगे बढ़ाने का सिलसिला जारी रखा। हमने कोशिश की कि देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे ऊर्जस्वी क्रान्तिकारी युवाओं की नयी पीढ़ी तैयार की जाये, जो उस मुहिम के सच्चे सिपाही हों जिसमें का- अरविन्द बीस वर्ष की आयु से होकर 44 वर्ष की आयु में आकस्मिक निधन के समय तक लगातार लगे रहे। एक दिवंगत साथी के लिए यही एक सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।

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संगोष्ठी का विषय-प्रवर्तन करते हुए अरविन्द‍ स्मृति न्यास से जुड़ी प्रसिद्ध कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता का. कात्यायनी

संगोष्ठी का विषय-प्रवर्तन करते हुए अरविन्द‍ स्मृति न्यास से जुड़ी प्रसिद्ध कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता का. कात्यायनी

कामरेड्स,

अब से चौबीस वर्षों पूर्व जून 1990 में ‘मार्क्सवाद ज़िन्दाबाद मंच’ के बैनर तले गोरखपुर में एक पाँच दिवसीय सेमिनार हुआ था, जिसका विषय था ‘समाजवाद की समस्याएँ, पूँजीवादी पुनर्स्थापना और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति’। उस दौर के ऐतिहासिक ‘‘अवशेष’’ के रूप में यहाँ हम तीन (मैं, सत्यम और मीनाक्षी) मौजूद हैं। पाँच दिनों की वह बहस इतनी सघन और विस्तारित हो गयी कि निर्धारित समय-सीमा को लाँघकर रोज़ देर रात तक चलती रही। उस संगोष्ठी में उ.प्र., बिहार, दिल्ली, पंजाब, बंगाल, केरल और आन्ध्र से आये कामरेडों की व्यापक भागीदारी रही थी।

अब इतने वर्षों बाद समाजवादी संक्रमण की समस्याओं पर एक बार फिर आपस में विचार-विमर्श और बहस-मुबाहिसे के लिए हम यहाँ, इलाहाबाद में एकत्र हुए हैं। इस लम्बे समय के दौरान गंगा-यमुना के पानी में काफ़ी प्रदूषण घुल चुका है। समाजवाद के संक्रमण की आर्थिक गतिकी और राजनीतिक अधिरचना को लेकर अलग-अलग अवस्थितियों से कई नये प्रश्न, और नये आवरण में कई पुराने प्रश्न फिर से उठाये जा रहे हैं। समाजवाद-विषयक मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-स्तालिन-माओ की प्रस्थापनाओं और बीसवीं शताब्दी के समाजवादी प्रयोगों पर फिर से कुछ नये प्रश्नचिन्ह खड़े किये जा रहे हैं और सोचने-विचारने के कुछ नये आयाम भी उद्घाटित हो रहे हैं।

1990 का सेमिनार जब हुआ था तब पूर्वी यूरोप में समाजवाद नामधारी राजकीय सत्ताओं का पतन हो चुका था, सोवियत संघ का विघटन आसन्न था, चीन में ‘‘बाज़ार समाजवाद’’ का असली चेहरा नंगा हो चुका था। तिएनआनमेन चौक नरसंहार की घटना भी घट चुकी थी। चतुर्दिक ‘इतिहास के अन्त’ का शोर था और मार्क्सवाद की ‘‘शवपेटिका अन्तिम तौर पर क़ब्र में उतार दिये जाने’’ के दावे बुर्जुआ भाड़े के कलमघसीट बढ़-चढ़कर कर रहे थे। वित्तीय पूँजी की कृत्या राक्षसी का उन्मुक्त भूमण्डलीय नृत्य शुरू हो चुका था। क्रान्ति की लहर पर हावी प्रतिक्रान्ति की लहर चरमोत्कर्ष पर थी। क्रान्तिकारी कतारों में निराशा और विभ्रम का माहौल था। भावुकतावादी और जड़सूत्रवादी कम्युनिस्टों के बीच ‘‘वैराग्य’’, ‘‘धर्म-परिवर्तन’’ और ‘‘धर्म-सुधार’’ की लहर ज़ोर-शोर से चल रही थी। तब सर्वहारा क्रान्ति और मार्क्सवाद-लेनिनवाद के प्रति वैज्ञानिक निष्ठा और इतिहास-बोध-सम्पन्न दुनिया के तमाम कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की तरह हम लोगों ने भी सोचा कि मार्क्सवाद की बुनियादी अन्तर्वस्तु पर सभी सैद्धान्तिक हमलों का तर्कसंगत उत्तर आक्रामक प्रतिरक्षा के ढंग से दिया जाना चाहिए, सर्वहारा अधिनायकत्व और समाजवादी प्रयोगों के मार्क्सवादी सिद्धान्त और व्यवहार से तथा उनके विकास की प्रक्रिया से लोगों को परिचित कराया जाना चाहिए, 1954-56 में सोवियत संघ में और 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के कारणों, प्रक्रिया और परिणतियों से लोगों को परिचित कराया जाना चाहिए, उन्हें बताया जाना चाहिए कि 1980 के दशक के अंत में जो हो रहा है वह समाजवाद की पराजय नहीं, बल्कि समाजवादी रंग-रोगन वाले भ्रष्ट-ठहरावग्रस्त राजकीय पूँजीवाद का विघटन है, जो उसकी तार्किक परिणति थी। हमें यह स्पष्ट करना ज़रूरी लगा कि क्रान्तिकारी प्रयोगों के प्रथम चक्र की पराजय विचारधारा के ग़लत, मृत या पराजित होने का परिचायक नहीं है और समाजवाद की यह पराजय अन्तिम नहीं है, पूँजीवाद अमर नहीं है और यह ‘इतिहास का अंत’ नहीं है। इसके साथ ही, हमें यह भी लगा, कि जैसा कि हर विज्ञान की विकास-प्रक्रिया में होता है, बीसवीं शताब्दी की महान सर्वहारा क्रान्तियों के अनुभवों के नये सिरे से विश्लेषण-समाहार की ज़रूरत है, समाजवादी संक्रमण की आर्थिक गतिकी तथा राजनीतिक और पूरे अधिरचनात्मक अट्टालिका के क्रान्तिकारी रूपान्तरण की तफ़सीलों को समाजवादी समाज में जारी वर्ग-संघर्ष के विविध रूपों एवं आयामों की तथा समाजवादी समाज के भीतर पैदा होने वाले नये बुर्जुआ तत्वों की ज़मीन को और गहराई में जाकर समझने की ज़रूरत है। 1990 का सेमिनार इस प्रक्रिया का एक प्रस्थान-बिन्दु था। इसके बाद भी अपनी अन्य ज़िम्मेदारियों, योजनाओं और व्यावहारिक कामों की सरगर्मियों के बीच इस दिशा में हम कुछ न कुछ करते रहे और अपनी समझ बढ़ाते रहे, लेकिन हम यह कतई नहीं मानते कि वह सन्तोषजनक था क्योंकि तमाम वस्तुगत समस्याओं के साथ ही हमारी योजनाओं और हमारी ताक़त के बीच हमेशा ही एक भारी अन्तर मौजूद रहता था।

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पाँचवीं अरविन्द स्मृति संगोष्ठी की रिपोर्ट
इक्कीसवीं सदी में सर्वहारा क्रान्ति के नये संस्करणों और नये समाजवादी प्रयोगों की तैयारी के लिए बीसवीं सदी में समाजवादी संक्रमण की समस्याओं पर अध्ययन-चिन्तन और बहस के ज़रिये सही नतीजों तक पहुँचना ज़रूरी है

संगोष्ठी का विषय-प्रवर्तन करते हुए अरविन्द‍ स्मृति न्यास से जुड़ी प्रसिद्ध कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता का. कात्यायनी

संगोष्ठी का विषय-प्रवर्तन करते हुए अरविन्द‍ स्मृति न्यास से जुड़ी प्रसिद्ध कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता का. कात्यायनी

पाँचवीं अरविन्द स्मृति संगोष्ठी पिछले 10-14 मार्च तक इलाहाबाद में सम्पन्न हुई। इस बार संगोष्ठी का विषय था: ‘समाजवादी संक्रमण की समस्याएँ’। संगोष्ठी में इस विषय के अलग-अलग पहलुओं को समेटते हुए कुल दस आलेख प्रस्तुत किये गये और देश के विभिन्न हिस्सों से आये सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के बीच उन पर पाँचों दिन सुबह से रात तक गम्भीर बहसें और सवाल-जवाब का सिलसिला चलता रहा। संगोष्ठी में भागीदारी के लिए नेपाल से आठ राजनीतिक कार्यकर्ताओं, संस्कृतिकर्मियों व पत्रकारों के दल ने अपने देश के अनुभवों के साथ चर्चा को और जीवन्त बनाया।
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14 मार्च 2014 - संगोष्‍ठी के अन्तिम दिन यूरोपीय वाम पर आलेख और संगोष्‍ठी में उठे प्रश्‍नों पर चर्चा

अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए मिथिलेश

अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए मिथिलेश

अरविन्‍द स्‍मृति संगोष्‍ठी के पाँचवे और अन्तिम दिन यूरोपीय ”स्‍वायत्त” वाम के विचारों और मज़दूर आन्‍दोलन पर इसके प्रभावों पर केन्द्रित मिथिलेश कुमार का आलेख ‘द प्रॉमिस दैट नेवर वाज़: ए क्रिटिक ऑफ़ पोस्‍ट-1968 यूरोपियन ”ऑटोनॉमस” लेफ़्ट’ प्रस्‍तुत हुआ और पिछले चार दिनों के दौरान विभिन्‍न आलेखों पर चर्चा के दौरान उठे मुद्दों पर बातचीत जारी रही।

वेस्‍टर्न सिडनी युनिवर्सिटी, आस्‍ट्रेलिया के शोधकर्ता मिथिलेश के आलेख में कहा गया कि आज दुनियाभर में एक उथल-पुथल का दौर है, पूँजीवाद के ख़ि‍लाफ़ आन्‍दोलन हो रहे हैं। लेकिन इतिहास का यह सबक हमें नहीं भूलना चाहिए कि जब क्रान्तिकारी राजनीति और उसे निर्देशित करने वाली ताक़तें बदलते हालात में सही कार्रवाई करने के लिए वैचारिक और राजनीतिक रूप से तैयार न हों तो इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद और ख़ासकर स्‍तालिन के निधन तथा सोवियत संघ की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस में ख्रुश्‍चेव द्वारा फैलाये गये झूठों के प्रभाव में यूरोप में वाम राजनीति की अनेक प्रवृत्तियाँ उभरीं। इनमें से अधिकांश की विवेचना और आलोचना इस संगोष्‍ठी में प्रस्‍तुत अन्‍य आलेखों में की गयी है। यह आलेख अन्‍य की संक्षिप्‍त चर्चा के साथ इटली के ‘आपेराइस्‍त’ आन्‍दोलन और इससे निकली धाराओं पर केन्द्रित रहा जिसका प्रभाव आज तेज़ी से फैल रहा है।अंतोनियो नेग्री, मारियो ट्रोंटी, बोलोन्‍या और रेनियरो पैंज़ि‍एरी जैसे लोगों की मज़दूर आन्‍दोलन के एक अच्‍छे-खासे हिस्‍से में ‘कल्‍ट’ जैसी स्थिति बन गयी है। उनकी आलोचना करने वाले बहुत से लोग भी उनकी ”मौलिकता” की बात करते हैं। आलेख में ‘ऑपेराइज़्म’ के उभार की पृष्‍ठभूमि की चर्चा करते हुए यह दिखाया गया कि किस प्रकार से इनकी ”मौलिकता” मार्क्‍सवाद की पद्धति और दर्शन से विचलन का नतीजा है।

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13 मार्च 2014 - संगोष्ठी के चौथे दिन ''उत्‍तर मार्क्‍सवाद'' और बोलिवारियन विकल्‍प पर चर्चा

शिवानी अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए

शिवानी अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए

इलाहाबाद,13 मार्च। अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के चौथे दिन आज दो महत्वपूर्ण पेपर प्रस्तुत किये गये और उन पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
आज के दिन का पहला पेपर दिल्ली की शिवानी और बेबी ने प्रस्तुत किया जिसका शीर्षक था ‘‘उत्तर-मार्क्‍सवाद के कम्युनिज्मः उग्रपरिवर्तन के नाम पर परिवर्तन की हर परियोजना को तिलांजलि देने की सैद्धान्तिकी।’’ (पेपर पढ़ने के लिए क्लिक करें) इस पेपर में कहा गया कि उत्तर-आधुनिकता, उत्तर-उपनिवेशवाद जैसी तमाम ‘’उत्तर’’ विचारसरणियों के बुरी तरह पिट जाने के बाद अब मार्क्‍सवाद पर हमला करने के लिए उत्तर-मार्क्‍सवाद के रंगबिरंगे संस्‍करण सामने आये हैं। पूंजीवाद का विरोध करने के नाम पर छद्म मार्क्‍सवादी शब्‍दाडंबर रचते हुए इन तमाम विचारों का निशाना मार्क्‍सवाद के बुनियादी उसूलों पर हमला करना ही है। आज इन हमलों को ताकत देने के लिए बुर्जुआ सांस्कृतिक और बौद्धिक उपकरणों की पूरी ताकत झोंक दी गई है ताकि पूंजीवाद के गहराते विश्‍वव्‍यापी संकट के दौर में बढ़ते आंदोलनों और विकल्‍प तलाश रही जनता को दिग्‍भ्रमित किया जा सके। यह अनायास नहीं है कि पूँजीवाद, अपने वर्चस्वकारी मैकेनिज्म के जरिये सहज गति से किस्म-किस्‍म के ‘‘रैडिकल’’ बुद्धिजीवियों को पैदा कर रहा है जो मार्क्‍सवाद की बुनियादी प्रस्थापनाओं पर चोट कर रहे है। इन विचारधाराओं की आलोचना ज़रूरी है क्‍योंकि ये कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक हिस्‍से से लेकर छात्रों, बुद्धिजीवियों आदि के बीच विभ्रम पैदा करने का प्रयास कर रहे है।

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12 मार्च 2014 - कामरेड अरविन्द के पचासवें जन्मदिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम

विहान सांस्कृतिक मंच दिल्ली की टोली

विहान सांस्कृतिक मंच दिल्ली की टोली

इलाहाबाद, 12 मार्च। “समाजवादी संक्रमण की समस्‍याएं विषयक” पाँचवी अरविन्‍द स्‍मृति संगोष्‍ठी के तीसरे दिन के सत्र का समापन कामरेड अरविन्द के पचासवें जन्मदिवस पर उनको श्रद्धांजलि देते हुए एक सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति‍ द्वारा हुआ। इस कार्यक्रम की शुरुआत में कामरेड अरविन्द को याद करते हुए सत्यम, आनन्द, अभिनव, योगेश और राजविन्दर ने उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को बड़ी आत्‍मीयता से याद किया। उन्होंने कहा कि का. अरविंद को महज़ 44 वर्ष का जीवन मिला जिसमें से 24 वर्ष उन्‍होंने सर्वहारा की मुक्ति के लिए होम कर दिये। एक ऐसे दौर में जब दुनिया भर में कम्युनिज्म के खिलाफ़ दुष्प्रचार अपने चरम पर था, कामरेड अरविन्द एक सच्चे योद्धा की भांति वर्ग संघर्ष के मोर्चे पर अंतिम सांस तक डटे रहे। वह एक सरल, सहृदय किन्तु कम्‍युनिस्‍ट उसूलों पर दृढ़ आस्‍था रखने वाले व्‍यक्ति थे। वे हम सबकी स्‍मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे और हमने उनके साथ मिलकर जो सपने देखे थे उन्‍हें पूरा करने की राह पर हमें प्रेरित करते रहेंगे।

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12 मार्च 2014 - संगोष्‍ठी के तीसरे दिन नेपाली क्रान्ति, महान बहस और माओवाद पर आलेख प्रस्‍तुत

नेपाल से आये कवि संगीत श्रोता अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए

नेपाल से आये कवि संगीत श्रोता अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए

इलाहाबाद, 12 मार्च। “समाजवादी संक्रमण की समस्‍याएं विषयक” पाँचवी अरविन्‍द स्‍मृति संगोष्‍ठी के तीसरे दिन का पहला सत्र नेपाली क्रान्ति की समस्‍याओं और वहाँ हाल के घटनाक्रम पर केंद्रित था। इस सत्र में नेपाल के क्रान्तिकारी आन्‍दोलन में आये गतिरोध, विपर्यय और विघटन के पीछे के कारणों पर गहन विचार-विमर्श और बहस मुबाहसा हुआ। आज संगोष्‍ठी में चार आलेख प्रस्‍तुत किये गये। पहले सत्र में नेपाल पर केंद्रित दो आलेख और दूसरे सत्र में महान बहस और माओवाद के प्रश्न पर दो आलेख प्रस्‍तुत हुए। दूसरे सत्र के अन्‍त में का. अरविन्‍द के पचासवें जन्‍म दिवस के अवसर पर उनकी याद में एक सांस्‍कृतिक कार्यक्रम प्रस्‍तुत किया गया।

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11 मार्च 2014 - पाँचवी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का दूसरा दिन

चीनी क्रान्ति पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए 'प्रतिबद्ध' पत्रिका के सम्‍पादक सुखविन्‍दर

चीनी क्रान्ति पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए ‘प्रतिबद्ध’ पत्रिका के सम्‍पादक सुखविन्‍दर

इलाहाबाद, 11 मार्च। इलाहाबाद के विज्ञान परिषद सभागार में “समाजवादी संक्रमण की समस्याएं” विषय पर चल रही पांचवीं अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के दूसरे दिन आज तीन महत्वपूर्ण पेपर प्रस्तुत किये गये और उन पर बहस हुई।
आज के पहले सत्र में पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविन्दर ने अपना पेपर प्रस्तुत किया जिसका शीर्षक था ”चीन में समाजवादी निर्माण, महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति और माओवाद’’। इस पेपर में माओकालीन चीन में समाजवादी निर्माण के प्रयोगों का चरणबद्ध ब्यौरा प्रस्‍तुत किया गया और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के विश्व-ऐतिहासिक अवदान को रेखांकित किया गया। पेपर में चीन में 1949 में हुई नव-जनवादी क्रान्ति से लेकर 1976 में माओ-त्से–तुङ की मृत्यु तक चीनी पार्टी में विभिन्न दौरों में विभिन्न मुद्दों पर चले दो लाइनों के बीच के संघर्ष का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुृत किया गया। चीन में 1949 की नव-जनवादी क्रान्ति के बाद सामन्ती शोषण की जड़ों को उखाड़ फेंकने के बाद 1950 के मध्य में ‘महान अग्रवर्ती छलांग’ लगाकार समाजवादी निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, सहकारी खेती से सामूहिक खेती की ओर संक्रमण शुरू हुआ तथा उद्योग और व्यापार में भी समाजवादी उत्पादन संबन्धों की ओर संक्रमण शुरू हुआ। पेपर में इस पूरी प्रक्रिया के दौरान चीनी पार्टी के समक्ष उत्प‍न्न चुनौतियों और उसके द्वारा उठाये गये क़दमों एवं इस समूची प्रक्रिया में समाज व पार्टी के भीतर जारी संघर्ष की विस्तारपूर्वक पड़ताल की गयी। इसके अतिरिक्त पेपर में सोवियत संघ के समाजवादी प्रयोगों की माओ द्वारा प्रस्तुरत आलोचनात्मक विश्लेषण की भी चर्चा की गयी। साथ ही पेपर में ख्रुश्‍चेवी संशोधनवाद के दौर में चली ‘महान बहस’ के ऐतिहासिक महत्व की भी चर्चा की गई। 1960 और 1970 के दशक में माओ के नेतृत्व में चलाई गई महान सर्वहारा सांस्कृातिक क्रान्ति के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं को पेपर में विशेष महत्व दिया गया। मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा के प्रवर्तन के बाद लेनिन ने साम्राज्यवाद के दौर में इस विचारधारा में गुणात्मक इजाफ़ा किया जिसकी वजह से इसे मार्क्सवाद-लेनिनवाद कहा गया। पेपर में कहा गया कि माओ ने समाजवादी संक्रमण की दीर्घकालिक अवधि के दौरान पूंजीवाद की पुर्नस्‍थापना रोकने के लिए अधिरचना के क्षेत्र में सतत क्रान्ति का जो सिद्धान्त दिया उसके सार्वभौमिक महत्व को देखते हुए आज के दौर में मार्क्सवादी विज्ञान को मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ-त्से-तुङ विचार की बजाय मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद कहना ज्यादा सटीक होगा।

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10 मार्च 2014 - “समाजवादी संक्रमण की समस्याएं” विषयक पाँचवीं अरविन्द स्मृति संगोष्ठी इलाहाबाद में शुरू

स्वागत वक्तव्य पेश करते हुए अरविन्द स्मृ्ति न्यास की मुख्य न्यासी मीनाक्षी

स्वागत वक्तव्य पेश करते हुए अरविन्द स्मृ्ति न्यास की मुख्य न्यासी मीनाक्षी

इलाहाबाद, 10 मार्च। विज्ञान परिषद सभागार, महर्षि दयानन्द मार्ग में “समाजवादी संक्रमण की समस्याएं” विषयक पाँच दिवसीय पाँचवी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी आज से शुरू हो गयी। इस संगोष्ठी में देशभर से आये सामाजिक कार्यकर्ताओं, संस्कृतिकर्मियों और विद्वानों के अलावा विदेशों से भी भागीदारी होगी।

संगोष्ठी का विषय-प्रवर्तन करते हुए अरविन्द‍ स्मृति न्यास से जुड़ी प्रसिद्ध कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता कात्यायनी ने कहा कि सोवियत संघ में 1956 से ज़ारी छद्म समाजवाद का 1990 के दशक के शुरूआत तक आते-आते जब औपचारिक पतन हुआ तो बुर्जुआ कलमघसीट मार्क्सवाद की “शवपेटिका अन्तिम तौर पर क़ब्र में उतार दिये जाने” और “इतिहास के अन्त” का जो उन्माद भरा शोर मचा रहे थे, हालाँकि वह अब शान्त हो चुका है, परन्तु अब “मुक्ति चिन्तन”, स्वयंस्फूर्ततावाद, गैरपार्टी क्रान्तिवाद और अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद के नानाविध भटकाव क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन के भीतर से ही पैदा हो रहे हैं। ऐसे में समाजवादी संक्रमण से जुड़ी तमाम समस्याओं – उस दौरान सर्वहारा वर्ग, उसकी हिरावल पार्टी और सर्वहारा राज्यसत्ता के बीच अर्न्तसम्बन्ध , समाजवादी समाज में उत्पादन-सम्बन्ध और उत्पादक शक्तियों के अर्न्तविरोध, वर्ग संघर्ष के स्वररूप और क्रमश: उन्नततर अवस्थाओं में संक्रमण से जुड़े सभी प्रश्नों पर अतीत के अनुभवों के सन्दर्भ में हमें बहस में उतरना होगा।

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5 मार्च 2014

पाँचवी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी 10 मार्च से इलाहाबाद में

समाजवादी संक्रमण की समस्याएँ’ विषय पर पाँच दिवसीय संगोष्ठी में देशभर से आये विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा विदेशों से भी भागीदारी होगी

इलाहाबाद, पाँच मार्च। ‘समाजवादी संक्रमण की समस्याएँ’ विषय पर 10 मार्च से इलाहाबाद में शुरू हो रही पाँच दिवसीय संगोष्ठी में आज विश्वभर में अध्ययन-मनन का विषय बने इस अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल पर गहन चर्चा होगी। संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों के प्रसिद्ध विद्वानों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ही विदेशों से भी इस विषय से जुड़े अध्येता और कार्यकर्ता भागीदारी करेंगे।

विज्ञान परिषद सभागार, महर्षि दयानन्द मार्ग में 10 से 14 मार्च तक चलने वाली संगोष्ठी के आयोजक ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ की मुख्य न्यासी मीनाक्षी ने बताया कि आज जहाँ पूँजीवादी व्यवस्था वैश्विक वित्तीय संकट में धंसती जा रही है वहीं पूरी दुनिया में लोग नये सिरे से इसके विकल्प के तौर पर समाजवाद को देख रहे हैं। दुनिया के अनेक देशों में हुए समाजवादी प्रयोगों की सफ़लताओं-विफलताओं पर विचार हो रहा है तथा इस विचारधारा के विभिन्न पहलुओं पर गहन मन्थन जारी है।

संगोष्ठी में जिन प्रमुख विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा वे हैं; समाजवादी संक्रमण की समस्याओं पर चिन्तन की ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया – मार्क्स-एंगेल्स से माओ त्से-तुङ तक। महान बहस और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का महत्व; बीसवीं सदी के महान समाजवादी प्रयोगों की सफ़लताओं और असफ़लताओं का नये सिरे से आलोचनात्मक मूल्यांकन। सोवियत संघ और चीन में समाजवादी संक्रमण के प्रयोग और उनकी समस्याएँ। पूँजीवादी पुर्नस्थापनाः विविध अवस्थितियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन; स्तालिन और उनके दौर के पुनर्मूल्यांकन का प्रश्न; सर्वहारा अधिनायकत्व की अवधारणा और इसके अमली रूप। समाजवादी संक्रमण के दौरान हिरावल पार्टी, वर्ग और राज्यसत्ता के बीच के सम्बन्ध; क्यूबा, उत्तर कोरिया, वियतनाम, “बोलिवारियन विकल्प”, यूनान में सिरिज़ा के प्रयोग और नेपाल में हुए प्रयोगों का आलोचनात्मक मूल्यांकन; समाजवादी संक्रमण के बारे में त्रात्सकीपंथी, विभिन्न अकादमिक मार्क्सवादी, नवमार्क्सवादी, और उत्तरमार्क्सवादी अवस्थितियों की  आलोचना।

संगोष्ठी में इस विषय के विभिन्न आयामों पर कई महत्वपूर्ण आलेख प्रस्तुत किये जायेंगे। सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों पर आह्वान पत्रिका के सम्पादक अभिनव सिन्हा, चीन में समाजवादी निर्माण, सांस्कृतिक क्रान्ति व माओवाद पर पंजाबी पत्रिका प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविन्दर, स्तालिन और सोवियत समाजवाद पर लुधियाना के डा. अमृतपाल, ‘उत्तर-मार्क्सवादियों’ के कम्युनिज्म पर दिल्ली विश्वविद्यालय की शिवानी एवं बेबी कुमारी, क्यूबा, वेनेजुएला आदि के परिधिगत समाजवादी प्रयोगों पर दिल्ली विश्वविद्यालय के सनी सिंह एवं अरविन्द राठी, सोवियत एवं चीनी पार्टियों के बीच चली महान बहस पर गुड़गांव के राजकुमार, माओवाद एवं माओ विचारधारा के प्रश्न पर मुंबई के हर्ष ठाकोर पेपर प्रस्तुत करेंगे।

यूरोपीय वाम के संकट पर वेस्टर्न सिडनी युनिवर्सिटी, आस्ट्रेलिया के मिथिलेश कुमार तथा समाजवादी संक्रमण एवं नेपाली क्रान्ति का सवाल विषय पर नेपाल के राजनीतिक कार्यकर्ताओं की टीम द्वारा पेपर प्रस्तुत किया जाएगा। इसके अलावा ग्रीस के एक वामपंथी क्रान्तिकारी समूह की ओर से तथा अमेरिका के कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की ओर से इंटरनेट लिंक के द्वारा अपनी प्रस्तुति दिए जाने की भी सम्भावना है।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में होने वाली चर्चा में स्थानीय बुद्धिजीवियों के अलावा उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों, दिल्ली, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, बंगाल, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात के विभिन्न ग्रुपों एवं जनसंगठनों के प्रतिनिधि, लेखक-बुद्धिजीवी एवं सामाजिक कार्यकर्ता हिस्सा लेंगे। नेपाल से संगोष्ठी के लिए विशेष रूप से आने वाले आने वाले दल में वरिष्ठ कवि और नेपाल प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव मित्रलाल पंज्ञानी, कवि और क्रिटिकल स्टडी एन्ड रिसर्च सेन्टर के संयोजक विष्णु ज्ञवाली, गण्डकी साहित्य संगम पोखरा के सचिव राजेन्द्र पौडेल, नेपाल प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय परिषद सदस्य प्रमोद धिताल, समीक्षक पुरुषोत्तम रिजाल, फि़ल्म समीक्षक और अखिल नेपाल चलचित्रकर्मी संघ के केन्द्रीय समिति सदस्य माधव ढुंगेल, पत्रकार नरेश ज्ञवाली तथा नेपाल पत्रकार महासंघ के केन्द्रीय सभासद संगीत श्रोता शामिल हैं।

‘दायित्वबोध’ पत्रिका के सम्पादक तथा प्रखर वामपन्थी क्रान्तिकारी कार्यकर्ता एवं बुद्धिजीवी दिवंगत का. अरविन्द की स्मृति में अरविन्द स्मृति न्यास की ओर से हर वर्ष सामाजिक बदलाव से जुड़े किसी अहम सवाल पर संगोष्ठी का आयोजन किया जाता है। पहली दो संगोष्ठियां दिल्ली व गोरखपुर में मज़दूर आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर हुई थीं जबकि तीसरी संगोष्ठी भारत में जनवादी अधिकार आंदोलन के सवाल पर लखनऊ में आयोजित की गई थी। चौथी संगोष्ठी जाति प्रश्न एवं मार्क्सवाद विषय पर चंडीगढ़ में आयोजित की गई थी। 12 मार्च की शाम को अरविन्द के पचासवें जन्मदिवस के अवसर पर उनकी स्मृति में एक विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाएगा।

सुश्री मीनाक्षी ने कहा कि इलाहाबाद उत्तर प्रदेश की बौद्धिक राजधानी रहा है और वामपंथी आन्दोलन से जुड़ी अनेक प्रमुख शख्सियतों और घटनाओं का भी यह स्थान रहा है। ऐसे में इलाहाबाद की धरती पर इस संगोष्ठी का एक अलग ही महत्व है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इलाहाबाद के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता तथा बुद्धिजीवी सेमिनार में होने वाले विचार-विमर्श में खुलकर हिस्सा लेंगे और विचारोत्तेजक बहस-मुबाहसे की पहले की चार संगोष्ठियों की परम्परा को यहां एक नया आयाम मिलेगा। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी प्रतिदिन दो सत्रों में सुबह 10 बजे से रात के आठ बजे तक चलेगी। सभी अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था पंजाबी भवन, महात्मा गांधी मार्ग में की गयी है।

– मीनाक्षी (प्रबन्ध न्यासी), आनन्द सिंह (सचिव)

अरविन्द स्मृति न्यास

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें:

कात्यायनी – 09936650658, सत्यम – 8853093555/9910462009,

प्रसेन (इलाहाबाद) – 8115491369/8052036902

पाँचवी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी

विषय: समाजवादी संक्रमण की समस्‍याएँ

10-14 मार्च, 2014, इलाहाबाद

साथियो!

हमारे प्रिय दिवंगत साथी अरविन्द की स्मृति में अरविन्द स्मृति न्यासकी ओर से हम 2009 से अब तक चार अरविन्द स्मृति संगोष्ठियों का आयोजन कर चुके हैं। दिल्ली व गोरखपुर में आयोजित पहली दो संगोष्ठियों का विषय मज़दूर आन्दोलन की चुनौतियों और भूमण्डलीकरण के दौर में उसके नये रूपों और रणनीतियों पर केन्द्रित था। लखनऊ में हुई तीसरी संगोष्ठी जनवादी व नागरिक अधिकार आन्दोलन की चुनौतियों पर केन्द्रित थी। वर्ष 2013 में चण्डीगढ़ में हुई चौथी संगोष्ठी में जाति प्रश्न और मार्क्‍सवादविषय पर पाँच दिनों तक गहन चर्चा हुई। हर बार हम भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन के किसी जीवन्त प्रश्न पर बहस-मुबाहसा और चर्चा आयोजित करते रहे हैं, जिसके प्रति साथी अरविन्द जीवनपर्यन्त प्रतिबद्ध रहे । चारों संगोष्ठियों में देशभर से क्रान्तिकारी मज़दूर, छात्र, युवा, स्‍त्री व जाति-विरोधी आन्दोलनों में सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व प्रबुद्ध नागरिकों की ओर से बड़े पैमाने पर भागीदारी हुई और हर बार रचनात्मक बहस-मुबाहसे के लिए संगोष्ठी के दिन कम पड़ गये।

पाँचवी अरविन्द स्मृति गोष्ठी का आयोजन उत्तर प्रदेश के प्रमुख बौद्धिक केन्द्रों में से एक इलाहाबाद में किया जा रहा है। इस बार भी हमारा प्रयास यह है कि आज के क्रान्तिकारी आन्दोलन के एक अत्यन्त जीवन्त प्रश्न पर पाँच दिनों तक, सुबह से रात तक की गहन चर्चा, चिन्तन-मनन और बहस का आयोजन किया जाय। इसी के मद्देनज़र इस बार हमने समाजवादी संक्रमण की समस्याएँविषय पर संगोष्ठी आयोजित करने का निर्णय लिया है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी, 12-16 मार्च 2013,चण्डीगढ़
(विषय: जाति प्रश्न और मार्क्सवाद)

चतुर्थ अरविन्द स्मृति संगोष्ठी (12-16 मार्च, 2013), चण्डीगढ़
‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’
जाति उन्मूलन का रास्ता मज़दूर इंक़लाब और समाजवाद से होकर जाता है, संसदवादी, अस्मितावादी या सुधारवादी राजनीति से नहीं!

मज़दूर आन्दोलन से लेकर छात्र-युवा आन्दोलनों तक में सक्रिय हर राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ़ है कि जाति का सवाल आज मज़दूरों और आम मेहनतकश जनता समेत छात्रों-युवाओं तक को संगठित करने में सबसे महत्वपूर्ण बाधाओं में से एक है। और ऐसा महज़ आज से नहीं बल्कि कई दशकों से है। देश की करीब 17 करोड़ दलित आबादी का बहुलांश मेहनतकश लोग हैं, जो कि भयंकर आर्थिक उत्पीड़न के साथ बर्बर जातिगत उत्पीड़न के भी शिकार हैं। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक तक मेहनतकश दलित आबादी के साथ आये दिन बर्बर और अमानवीय कृत्यों की ख़बरें आती रहती हैं। यह दलित मेहनतकश आबादी भारत के मज़दूर वर्ग का सबसे पीड़ित और साथ ही सबसे जुझारू हिस्सा है। यही कारण है कि इस दलित आबादी को मज़दूर वर्ग से अलग रखने के लिए जातिवादी अस्मितावादी राजनीति का जाल शासक वर्ग और उसके टट्टुओं द्वारा बिछाया गया है। चुनावी और ग़ैर-चुनावी अस्मितावादी दलित राजनीति करने वाले संगठन इस आबादी को एक राजनीतिक पार्थक्य में रखते हैं और उनके हितों के अकेले पहरेदार होने का दावा करते हैं। वहीं दूसरी ओर मज़दूर वर्ग की नुमाइन्दगी करने वाला कम्युनिस्ट आन्दोलन दलित आबादी के संघर्षों में कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ने और बेमिसाल कुर्बानियाँ देने के बावजूद, दलित प्रश्न को सही ढंग से समझने में नाकाम रहा। दलित आबादी के बीच कम्युनिज़्म को बदनाम करने में संसदवादी संशोधनवादी कम्युनिस्टों की बड़ी भूमिका रही है, जिन्होंने अपने जीवन में सवर्णवादी मूल्यों-मान्यताओं पर अमल करते हुए लाल झण्डे पर धब्बा लगाने का काम किया। क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट अपने जीवन में जाति व्यवस्था को ख़ारिज करने के बावजूद जाति की सामाजिक समस्या के ऐतिहासिक मूल और समाधान के बारे में कोई विस्तृत योजना पेश न कर सके। लेकिन इन सबके बावजूद यह आज का सच है कि सर्वहारा क्रान्ति और समाजवाद के बिना, बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर दलित आबादी की मुक्ति सम्भव नहीं है; साथ ही, यह भी उतना ही बड़ा सच है कि व्यापक मेहनतकश दलित आबादी की भागीदारी और उसकी बाकी मज़दूर आबादी के साथ फौलादी एकजुटता के बिना ऐसी कोई क्रान्ति सम्भव ही नहीं है। यह एकता कैसे कायम की जाय? अस्मितावादी राजनीति का मुकाबला कैसे किया जाय? अम्बेडकर के योगदानों की आलोचनात्मक समीक्षा किस रूप में की जाय? क्या अम्बेडकर के पास जाति उन्मूलन का कोई रास्ता था? दलित मुक्ति की क्रान्तिकारी समाजवादी परियोजना का ख़ाका कैसे तैयार किया जाय? फौरी कार्यभारों के तौर पर क्रान्तिकारी मज़दूर आन्दोलन को इस प्रश्न पर कौन-से कदम उठाने चाहिए? ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिनका जवाब देना आज क्रान्तिकारियों के सामने एक अहम चुनौती है। और इसी चुनौती का जवाब देने के लिए एक व्यापक बहस-मुबाहसे के लिए चतुर्थ अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का विषय ‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ रखा गया। इस संगोष्ठी की रिपोर्ट हम आपके बीच पेश कर रहे हैं।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जाति प्रश्‍न और उसका समाधान : एक मार्क्‍सवादी दृष्टिकोण

जाति प्रश्‍न और उसका समाधान : एक मार्क्‍सवादी दृष्टिकोण

शोध टीम, अरविन्द मार्क्‍सवादी अध्ययन संस्थान
‘जाति प्रश्‍न और मार्क्‍सवाद’ विषय पर चतुर्थ अरविन्द स्मृति संगोष्ठी (12-16 मार्च, चण्डीगढ़) में प्रस्तुत आधार आलेख

भारतीय समाज को शोषणमुक्त बनाने की कोई भी क्रान्तिकारी परियोजना जाति प्रश्‍न को छोड़कर नहीं बनायी जा सकती। इस धारणा को सिरे से ख़ारिज करने के पर्याप्त आधार हैं कि पहले सामाजिक-राजनीतिक धरातल पर कुछ सुनिश्चित सचेतन प्रयासों से जाति-व्यवस्था को समाप्त किया जाना चाहिए, इसके बाद ही जनता के विभिन्न वर्गों की क्रान्तिकारी लामबन्दी सम्भव हो सकती है। इसके विपरीत, यह धारणा भी उतनी ही ग़लत है कि वर्गों की क्रान्तिकारी लामबन्दी और सर्वहारा क्रान्ति की प्रक्रिया जाति-व्यवस्था को स्वतः समाप्त कर देगी, अतः यह प्रश्‍न अलग से कोई अहम मुद्दा बनता ही नहीं है। हमारी यह स्पष्ट धारणा है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी की प्रक्रिया जाति-आधारित उत्पीड़न के विविध रूपों और उनकी कारक-वाहक संस्थाओं को स्पष्ट निशाना बनाये बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती, इसके बिना जातियों में बँटी हुई और सामाजिक पार्थक्य की शिकार व्यापक मेहनतकश जनता के विभिन्न वर्गों की चेतना का क्रान्तिकारीकरण और लामबन्दी सम्भव नहीं। साथ ही, क्रान्ति के हरावलों को जाति-उन्मूलन की एक ऐतिहासिक-वैज्ञानिक, तर्कसंगत परियोजना प्रस्तुत करनी होगी, जो भले ही दीर्घकालिक (स्वाभाविक है कि ऐसी ही होगी) हो, पर जिसके कुछ ठोस तात्कालिक कार्यभार भी हों। हाँ, इतना तय है कि जाति-व्यवस्था के अन्तिम तौर पर, समूल नाश के लिए, सर्वहारा राज्य की स्थापना के बाद भी, उत्पादन-सम्बन्धों के समाजवादी रूपान्तरण और समाजवादी सामाजिक-राजनीतिक-शैक्षिक-सांस्कृतिक ढाँचे के क्रमशः उन्नततर होते जाने की सुदीर्घ प्रक्रिया के साथ-साथ विचार और संस्कृति के धरातल पर भी सतत क्रान्ति की प्रक्रिया चलानी होगी। इस आलेख में हम आगे अपनी इस प्रस्थापना की विस्तार से चर्चा करेंगे और इस सन्दर्भ में, हमारे हिसाब से, जो ग़लत, अधूरी, अस्पष्ट और भ्रामक प्रस्थापनाएँ प्रचलित हैं, उनका खण्डन भी करेंगे। (…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अम्बेडकरवाद और दलित मुक्ति

अम्बेडकरवाद और दलित मुक्ति

– सुखविन्दर

भारत के लोगों का जातियों में बँटवारा इसे पूरी दुनिया में एक विलक्षण समाज बनाता है। यह बँटवारा सदियों से अपने रूप बदलते हुए आज भी बरकरार है। आज भी यहाँ करोड़ों लोगों को जाति आधारित उत्पीड़न, ज़ुल्म, अपमान झेलना पड़ रहा है। वर्गीय विभाजन के साथ-साथ भारतीय समाज का जनजातीय-ग़ैरजनजातीय (Tribal-NonTribal), अलग-अलग राष्ट्रीयताओं तथा जातियों में बँटवारा भारतीय समाज को एक बेहद जटिल समाज बनाता है। 1990 के दशक के शुरू में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ भारत के लोग 3539 जातियों में बँटे हुए थे (सुवीरा जैसवाल, Caste, p. 15, Delhi, 2005)। यह बँटवारा ख़ासकर जाति आधारित बँटवारा भारत की मेहनतकश जनता की मुक्ति की राह को बेहद चुनौतीपूर्ण बना देता है। शासक वर्ग हमेशा इन बँटवारों को मेहनतकश जनता की वर्गीय एकता को तोड़ने, उनकी वर्गीय चेतना को भोथरा बनाने तथा उन्हें आपस में लड़ाने के लिए एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं और आज भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।
वर्ग विभाजन के अलावा भारतीय समाज का जातियों में बँटवारा (इसके साथ ही राष्ट्रीयताओं, जनजातीय-ग़ैरजनजातीय आदि में) आज के भारत का वस्तुगत यथार्थ है जिससे इनकार करके भारत में श्रमिक वर्गों की मुक्ति की कोई भी परियोजना तैयार नहीं की जा सकती। इस यथार्थ को बदलने की दिशा में पहला क़दम इस वस्तुगत यथार्थ को स्वीकार करना है।
आज़ादी के बाद हुए पूँजीवादी विकास की बदौलत यहाँ की जातीय संरचना में बहुत बड़े बदलाव आये हैं। जाति की विशेषताओं में से जातीय पदसोपानक्रम, जाति आधारित श्रम विभाजन काफ़ी हद तक टूटा है। लेकिन सजातीय विवाह की विशेषता अभी भी बड़े पैमाने पर बरक़रार है। लेकिन इन तमाम बदलावों के बावजूद भारत की दलित आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी ग्रामीण तथा शहरी सर्वहारा आबादी ही है, जोकि निकृष्टतम कोटि के आर्थिक-राजनीतिक शोषण-उत्पीड़न के साथ-साथ जातिगत उत्पीड़न-अपमान भी झेल रही है। इन जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न-अपमान का ख़ात्मा भारत की भावी क्रान्ति के सबसे अहम प्रश्नों में से एक है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जाति व्यवस्था-सम्बन्धी इतिहास-लेखनः कुछ आलोचनात्मक प्रेक्षण

जाति व्यवस्था-सम्बन्धी इतिहास-लेखनः कुछ आलोचनात्मक प्रेक्षण

– अभिनव सिन्हा

जाति व्यवस्था पर लिखे जाने वाले तमाम लेखों, शोध-निबन्धों व अन्य प्रकार की रचनाओं की शुरुआत लगभग सभी मामलों में कुछ अत्यधिक प्रयोग का शिकार हो चुके वाक्यों या वाक्यांशों से होती है, और चूँकि पर्याप्त घिस जाने के बाद भी ये जुमले एक हद तक एक सच्चाई का बयान करते हैं, इसलिए मैं भी ऐसे ही कुछ वाक्यों से शुरुआत करूँगा।
जाति/वर्ण भारतीय सामाजिक जीवन का एक प्रमुख यथार्थ है। भारतीय समाज का अध्ययन करने वाला कोई भी इतिहासकार, समाजशास्त्री, नृविज्ञानी और यहाँ तक कि राजनीतिक अर्थशास्त्री भी, इस सच्चाई की उपेक्षा नहीं कर सकता है। निश्चित तौर पर, यह बात सही है कि भारतीय जनमानस पर जातिगत मानसिकता का प्रभाव गहराई तक है। लेकिन जाति व्यवस्था और जातिगत मानसिकता की बात पर ज़ोर डालते हुए कई बार सामान्य लोगों से लेकर अकादमिकों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक में इस पहलू को भारतीय समाज और जीवन का एकमात्र सर्वप्रमुख पहलू करार देने का रुझान होता है। ऐसा करके व्यवहारतः वह जाति व्यवस्था और जातिगत मानसिकता की समस्या को वस्तुतः समाधान के एजेण्डे पर नहीं रखते, बल्कि उसे एक ऐसा अतियथार्थ बना देते हैं, जिसके पार जाना सम्भव नहीं है। वास्तव में, इस प्रकार के निष्कर्षों में जो चीज़ निहित होती है, वह है जाति व्यवस्था के प्रति एक अनैतिहासिक नज़रिया। जाति व्यवस्था एक प्रकार से अनादि और अनन्त बना दी जाती है; एक ऐसा यथार्थ जो शाश्वत और सनातन है। निस्सन्देह, आम तौर पर इस प्रकार के बयान देने वाले लोगों का यह मक़सद नहीं होता है। लेकिन वस्तुगत तौर पर इस प्रकार की बातों का नतीजा कुछ ऐसा ही निकलता है। जाति व्यवस्था के प्रति एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण न अपनाना एक प्रकार का पराजय-बोध पैदा करता है, जो कि जाति व्यवस्था को अपराजेय बनाकर प्रस्तुत करता है। अन्य सभी संघर्षों, “पहचानों” और वर्ग-संघर्ष को ख़ारिज करते हुए यह नज़रिया जाति व्यवस्था को भारतीय जीवन और जनता का एक अभिन्न अंग बना देता है, उसकी जैविक विशिष्टता में तब्दील कर देता है और इसे भारतीय जनमानस की परिभाषा देने का पैमाना बना दिया जाता है। हाल ही में, भारतीय जनता के मानस में मौजूद ऐसी आदिम और सर्वसत्तावादी चेतना (!) के कारण कुछ बुद्धिजीवियों ने भारतीय जनता को ही मूल तौर पर एक ‘सर्वसत्तावादी समुदाय’ करार दिया! उनके मुताबिक भारत में आधुनिकता की परियोजना के पूरा न होने कारण समाज में ‘नीचे से’ (यानी कि जनता के बीच) तमाम सर्वसत्तावादी रुझान मौजूद हैं जो जातिवाद, खाप पंचायतों, साम्प्रदायिकता, आदि के रूप में अपने आपको प्रकट करते हैं! इसलिए इन बुद्धिजीवियों के अनुसार अभी भारत में पहले आधुनिकता की परियोजना को पूरा किया जाना चाहिए, और जब तक कि आधुनिकता की परियोजना को एक मुकम्मिल मुक़ाम तक नहीं पहुँचा दिया जाता, तब तक पूरे सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के क्रान्तिकारी परिवर्तन की परियोजना को, कमोबेश, स्थगित कर दिया जाना चाहिए! इस प्रकार की बात कहने वाले ये अकेले लोग नहीं हैं, और भी तमाम बुद्धिजीवियों ने ऐसी और इससे मिलती-जुलती बातें कहीं हैं। ऐसी बातों में एक पूर्वधारणा काम कर रही होती है। यह पूर्वधारणा यह है कि पूँजीवाद को जनवादी और आधुनिकता की परियोजना से सम्बन्धित कार्यभारों को पूरा करना चाहिए, और अगर वह नहीं करता तो प्रगतिशील ताक़तों का प्रमुख काम यह बन जाता है, कि पहले उन कार्यभारों को पूरा करें, और जब कि पूँजीवादी जनवाद और आधुनिकता को पूर्णता तक नहीं पहुँचा दिया जाय, तब तक सर्वहारा कार्यभारों को स्थगित किया जा सकता है। जहाँ एक ओर यह बात सच है कि पूँजीवाद को अधिक से अधिक जनवादी बनाने की हर लड़ाई में कोई भी क्रान्तिकारी हर-हमेशा भागीदारी करेगा, वहीं यह भी सच है कि ऐसा वह ठीक इसीलिए करेगा कि सर्वहारा वर्ग संघर्ष के लिए ज़्यादा मुफीद ज़मीन तैयार की जा सके, और इस प्रक्रिया के पूरे होने तक वह शुद्ध और ठोस रूप से सर्वहारा कार्यभारों को स्थगित नहीं कर देता है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जाति, वर्ग और अस्मितावादी राजनीति

जाति, वर्ग और अस्मितावादी राजनीति

शिवानी

 

जिसे अस्मितावादी राजनीति या पहचान की राजनीति (आइडेण्टिटी पॉलिटिक्स) कहा जाता है, उसकी शुरुआत बड़े पैमाने पर 1980 के दशक में देखी जा सकती है। इसके केन्द्र में जैसा कि इसके नाम से ही साफ है, अस्मिता या पहचान की अवधारणा है। समाजशास्त्रीय या सामाजिक नृतत्वशास्त्रीय (सोशल एन्थ्रोपोलॉजिकल) अर्थों में अस्मिताआचरण-सम्बन्धी एवं वैयक्तिक विशेषताओं का वह समुच्चय है जो किसी भी व्यक्ति को एक समूह के सदस्य के रूप में पहचान देता है। यह पहचान जाति, लिंग, धार्मिक सम्प्रदाय, नस्ल आदि वस्तुगत सामाजिक श्रेणियों द्वारा निर्धारित होती है और आम तौर पर सापेक्षिक रूप से स्थिर, स्थैतिक और स्वाभाविक रूप से प्रदत्त मानी ज़ाती है। अस्मितावादी राजनीति का प्रस्थान बिन्दु अस्मिता की यही परिभाषा है। लेकिन यह एक सामूहिक परिघटना के तौर पर किसी एक अस्मिता की बात नहीं करती है; बल्कि कई सारी विखण्डित अस्मिताओं पर ज़ोर देती है। अस्मिताओं का विखण्डीकरण न सिर्फ मनुष्य के व्यक्तित्व के धरातल पर होता है, बल्कि सम्पूर्ण समाज के धरातल पर भी किया जाता है। एक वर्ग समाज में किसी भी मनुष्य की बहुआयामी अस्मिताएँ होती हैं। हर मनुष्य की कोई जाति, भाषा, क्षेत्र, राष्ट्रीयता की अस्मिताएँ होती हैं। अस्मितावादी राजनीति इन सभी पहचानों को उभारती है और इनका सारभूतीकरण (एसेंशियलाइज़ेन) करती है। एक पहचान (जिसे शुद्ध अर्थों में पहचान कहा भी नहीं जा सकता है) जिसका यह राजनीति ज़िक्र तक नहीं करती है, वह है वर्ग पहचान। वर्ग अस्मिता प्राकृतिक रूप, नस्लीय, क्षेत्रीय, या भाषाई रूप से प्रदत्त नहीं होती। वर्ग अस्मिता समाज की बुनियादी गतिविधि यानी कि उत्पादक गतिविधि में निर्मित होती है, जिसमें लगे लोग आपस में अपनी इच्छा से स्वतन्त्र कुछ निश्चित सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं। लेकिन अस्मितावादी राजनीति इस पहचान पर कभी बल नहीं देती। आपको ऐसे स्वयंसेवी संगठन मिल जायेंगे जो जेण्डर, जाति, क्षेत्रीय या भाषाई पहचान के आधार पर बने हों। लेकिन आपको कोई ऐसा एन.जी.ओ. बिरले ही मिलेगा जो मज़दूर एन.जी.ओ. हो!

आदिम समुदायगत अस्मिता को अतिरेखांकित और वर्ग अस्मिता को नज़रअन्दाज़ करने के पीछे का मकसद क्या है? इसे समझने के लिए सबसे पहले अस्मितावादी राजनीति के उदय की वैश्विक भौतिक पृष्ठभूमि को समझना ज़रूरी है। साथ ही, ‘नये सामाजिक आन्दोलन’, विश्व सामाजिक मंच जैसे मंचों और ग़ैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) के उद्भव की परिघटना को अस्मितावादी राजनीति के परिप्रेक्ष्य में सन्दर्भित करना होगा।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

आनंद तेलतुंबडे को जवाबः स्व-उद्घोषित शिक्षकों और उपदेशकों के नाम

आनंद तेलतुंबडे ने हमारे बारे में अपना फैसला सुना दिया है। उन्होंने हमें ‘‘जड़ बुद्धि’’ के साथ ‘‘आत्म-मुग्ध मार्क्सवादी’’ कहा है। अब हम क्या कह सकते हैं? जैसा कि वह खुद स्वीकार करते हैं कि कुछ घण्टों के लिए ही वह संगोष्ठी में रुके थे और इस थोड़े-से समय में ही वह हमारे बारे में एक सुनिश्चित अवधारणा तक पहुँचने में सक्षम रहे और अन्ततः अपना फैसला सुना दिया। हालाँकि, उनसे इस छोटी-सी मुलाकात के दौरान हम भी श्रीमान तेलतुम्बडे के बारे में कुछ राय बनाने में सक्षम रहे। हम कुछ उदाहरणों से शुरू करेंगे और फिर श्रीमान तेलतुम्बडे के लेख का पैरा-दर-पैरा जवाब देंगे।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

खुद पर फिदा मार्क्सवादियों और छद्म अंबेडकरियों के नाम:

बाबासाहेब अंबेडकर के जीवन पर एक सरसरी नजर भी यह संकेत देती है कि उन्होंने हर चरण में नाकामियों का सामना किया. उन्होंने जिन चीजों की उम्मीद की थी, वे साकार नहीं हुईं. दलितों के जिस राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए उन्होंने इतनी मशक्कत की थी, वह अभिशाप साबित हुई. वे खुद आरक्षित सीटों पर राजनीतिक रूप से बौने कद के उम्मीदवारों के मुकाबले भी कभी जीत नहीं सके. उन्होंने दलितों के लिए उच्च शिक्षा पर जोर दिया और कॉलेज खोले, लेकिन जल्दी ही इस पर अफसोस जाहिर किया कि पढ़े-लिखे लोगों ने उन्हें धोखा दिया है. उन्होंने जाति के उन्मूलन का मंत्र दिया लेकिन आधुनिक भारत में जातियों को मिलती संवैधानिक वैधता ही उनके हाथ लगी. हम ऐसे अनचाहे अंजामों को गिनाते रह सकते हैं, जो उन्हें पूरी जिंदगी अपनी कोशिशों के नतीजे में हासिल होते रहे. अगर कोई दलितों की मौजूदा दशा पर नजर डाले, तो हमें इससे मिलती-जुलती तस्वीर दिखेगी. जबकि कुछ मुट्ठी भर दलितों ने महत्पवूर्ण तरक्की की है, दलितों की व्यापक बहुसंख्या गैर-दलितों की तुलना में ठहराव का शिकार है या यहां तक नीचे ही गिरी है. व्यापक रूप से कहें तो अछूतपन, हालांकि संविधान में इस पर पाबंदी है, हालिया सर्वेक्षणों द्वारा मिले संकेतों के मुताबिक खुलेआम व्यवहार में लाया जा रहा है. जातियां एक आधुनिक संस्थान के रूप में आक्रामक बनी हुई हैं. यहां तक कि दलित भी, और अजीब विडंबना है कि अंबेडकरी होने का दावा करने वाले दलित भी, जातीय पहचानों पर गर्व से इतराते हैं. उत्पीड़न की घटनाओं के आधार पर मापें तो, जिसे मैं जातिवाद का सबसे बेहतर प्रतिनिधि मानता हूं, तो जातियां यकीनन और भी संगीन हुई हैं. अंबेडकर ने दलितों के लिए जो संस्थान खोले, जैसे कि पीपुल्स एडुकेशनल सोसाइटी, बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया, समता सैनिक दल, उन सबमें बेतरतीबी पसरी हुई है. अंबेडकरी राजनीति के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना ही बेहतर.(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

चतुर्थ अरविन्द स्मृति संगोष्ठी

जाति प्रश्‍न और मार्क्‍सवाद

(1216 मार्च, 2013)
चण्डीगढ़

प्रिय साथी,

अपने प्रिय दिवंगत कॉमरेड अरविन्द की स्मृति में इस बार चतुर्थ अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का आयोजन हम चण्डीगढ़ में कर रहे हैं।

जाति प्रश्‍न, विशेषकर दलित प्रश्‍न आज भी भारतीय समाज का एक ऐसा जीवन्त-ज्वलन्त प्रश्‍न है, जिसे हल करने की प्रक्रिया के बिना व्यापक मेहनतकश अवाम की वर्गीय एकजुटता और उनकी मुक्ति-परियोजना की सफलता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए, जो मार्क्‍सवाद को सच्चे अर्थों में आज भी (अकादमिक विमर्श की जुगाली या महज़ वोट बैंक की राजनीति का एक औज़ार मानने के बजाय) क्रान्तिकारी व्यवहार का मार्गदर्शक मानते हैं, उनके लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वे मार्क्‍सवादी नज़रिये से जाति प्रश्‍न के हर पहलू की सांगोपांग समझदारी बनाने की कोशिश करें, शोध-अध्ययन और वाद-विवाद करें।

इस प्रश्‍न पर एक लम्बे समय से संगोष्ठियाँ-परिचर्चाएँ होती रही हैं। लेकिन प्रायः कुछ अवस्थिति पत्रों और संक्षिप्त बहसों में इस गम्भीर ऐतिहासिक प्रश्‍न के हर पहलू को ‘इति सिद्धम’ शैली में निर्णायक ढंग से निपटा दिया जाता रहा है। गम्भीर शोध और पूर्वाग्रह-मुक्त लम्बी बहसों का अभाव रहा है। एक ओर यान्त्रिक वर्ग अपचयनवादी (क्लास रिडक्शनिस्ट) तरीके से जाति प्रश्‍न को देखने या ख़ारिज करने का नज़रिया मौजूद रहा है, तो दूसरी ओर मार्क्‍सवाद और अम्बेडकरवाद-नवअम्बेडकरवाद के बीच तालमेल कराने और असुविधजनक प्रश्‍नों से कतरा जाने की अवसरवादी प्रवृत्ति मौजूद रही है। अमेरिकी समाजशास्त्रीय स्कूल के विद्वान जाति प्रश्‍न का अध्ययन करते हुए मार्क्‍सवादी वर्ग-विश्‍लेषण की प्रणाली को लम्बे समय से ख़ारिज करते रहे हैं। उनकी सन्तुलित मार्क्‍सवादी समालोचना प्रस्तुत करने की आज भी ज़रूरत है। हाल के दशकों में ‘सबऑल्‍टर्न स्टडीज़’ और ‘आइडेण्टिटी पॉलिटिक्‍स’ सहित विभिन्‍न ”उत्तर-” विचारधाराओं के द्वारा जाति और जेण्डर के प्रश्‍न को समझने का अकादमिक चलन ख़ूब फैशन में रहा है। इन विचार-सरणियों की विभिन्‍न मार्क्‍सवादी अवस्थितियों से प्रचुर समालोचनाएँ प्रस्तुत की गयी हैं, पर जाति प्रश्‍न की विविध उत्तर-आधुनिक, सबऑल्‍टर्न व्याख्याओं की विसंगतियों पर काफ़ी-कुछ लिखने की ज़रूरत है और इन स्कूलों द्वारा प्रस्तुत मार्क्‍सवाद की आलोचना की सन्तुलित आलोचना का काम भी काफ़ी हद तक छूटा हुआ है। ऐसे मार्क्‍सवादी अकादमीशियनों की कमी नहीं है जो सबऑल्‍टर्न स्टडीज़ और ‘आइडेण्टिटी पॉलिटिक्‍स’ की पद्धति की मार्क्‍सवादी पद्धति के साथ खिचड़ी पकाकर ”वर्ग अपचयनवादी दोषों” को दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं। अतः इस विषय पर विस्तृत बहस-मुबाहसे की और अधिक ज़रूरत है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

तीसरी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी, 22-24 जुलाई 2011,लखनऊ
(विषय: भारत में जनवादी अधिकार आन्‍दोलन)

‘मज़दूर बिगुल’ अखबार में छपी तीसरी अरविन्‍द स्‍मृति संगोष्‍ठी की रिपोर्ट

Report-of-Third-Arvind-Memorial-Seminar

जनवादी अधिकार आन्दोलन के संगठनकर्ताओं और कार्यकर्ताओं के विचारार्थ कुछ बातें

जनवादी अधिकार आन्दोलन के संगठनकर्ताओं और कार्यकर्ताओं के विचारार्थ कुछ बातें

— कात्यायनी

गिनती के नज़रिये से अगर देखें तो कोई पर्यवेक्षक इस बात पर सन्तोष ज़ाहिर कर सकता है कि इस समय पूरे देश में नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकारों को लेकर आवाज़ उठाने वाले छोटे-बड़े संगठनों की संख्या दो दर्जन से भी कुछ अधिक ही है। यह भी सही है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली पुलिस दमन और राजनीतिक बंदियों के उत्पीड़न की घटनाओं, साम्प्रदायिक दंगों एवं नरसंहारों में हिन्दुत्ववादी ताकतों और शासन-प्रशासन की भूमिका, जाति एवं जेण्डर आधारित उत्पीड़न, बँधुआ मज़दूरी, बाल श्रम, मज़दूरों को उनके विधिसम्मत अधिकार नहीं मिलने जैसी घटनाओं, तथा कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत की जनता पर आधी सदी से भी अधिक समय से जारी अर्द्धफासिस्ट किस्म के परोक्ष सैनिक शासन पर आये दिन प्रकाशित होने वाली रिपोर्टों और लेखों तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय में प्रस्तुत याचिकाओं की संख्या आज अच्छी-खासी दीखती है। लेकिन इन गिनतियों से अलग हटकर जब हम इस बैलेन्स शीट की जाँच करते हैं कि पिछले करीब 30–35 वर्षों के दौरान जनवादी अधिकार आन्दोलन ने हमारे देश में सत्ता, समाज और संस्कृति के ताने-बाने को किस हद तक प्रभावित किया है, व्यापक जनसमुदाय की जनवादी चेतना को उन्नत बनाकर उसने किस हद तक उन्हें अपने जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए जागरूक एवं सक्रिय बनाया है तथा किस हद तक अपना व्यापक सामाजिक आधार तैयार करके उसने एक जनान्दोलन की शक्ल अख़्तियार की है; तो हमें थोड़ी मायूसी का सामना करना पड़ता है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

भार‍तीय संविधान और भारतीय लोकतंत्र: किस हद त‍क जनवादी?

भार‍तीय संविधान और भारतीय लोकतंत्र: किस हद त‍क जनवादी?

– आनन्‍द सिंह

जब भी कभी नागरिकों के जनवादी अधिकारों की हिफ़ाजत करने में भारतीय लोकतंत्र की विफ़लताओं पर चर्चा होती है तो प्राय: यह तर्क सुनने में आता है कि भारतीय संविधान में कोई कमी नहीं है, कमी तो संविधान को लागू करने वालों में है। इस तर्क के पक्ष में संविधान सभा के समापन भाषण में संविधान के प्रारूप निर्माण समिति के अध्‍यक्ष डा. भीमराव अंबेडकर का यह क‍थन प्राय: उद्धृत किया जाता है: ….संविधान चाहे जितना अच्‍छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है यदि उसका अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। एक संविधान चाहे जितना बुरा हो, वह अच्‍छा साबित हो सकता है यदि उस‍का पालन करने वाले लोग अच्‍छे हों। …1

इस प्रकार का तर्क करने वाले लोग भारतीय लोकतंत्र की तमाम विफ़ल‍ताओं का ठीकरा संविधान को लागू करने वाली पीढ़ी के सिर पर फोड़ते हैं और संविधान को पाक-साफ़ बताकर उसे प्रश्‍नेतर बना देते हैं। परन्‍तु ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि संविधान को लागू करने वाली पीढ़ी दरअसल उसी सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना का उत्‍पाद होती है जिसको बनाने में संविधान की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जनवादी अधिकार आन्‍दोलन के सामाजिक-सांस्‍कृतिक कार्यभार

जनवादी अधिकार आन्‍दोलन के सामाजिक-सांस्‍कृतिक कार्यभार


– जयपुष्‍प

राज्‍यसत्ता द्वारा जनवादी अधिकारों के दमन के ख़िलाफ़ संघर्ष करना जनवादी अधिकार आन्‍दोलन का एक अहम और फौरी कार्यभार है। नवउदारवादी आर्थिक नीतियां अपनी स्‍वत:स्‍फूर्त गति से राज्‍य के चरित्र को जैसे-जैसे अधिक से अधिक निरंकुश, दमनकारी और सर्वसत्तावादी बनाती जा रही हैं वैसे-वैसे तमाम काले क़ानूनों के द्वारा जनता की नागरिक स्‍वतन्‍त्रता और जनवादी अधिकारों पर हमले और सघन और आक्रामक होते जा रहे हैं। राजकीय मशीनरी द्वारा जनवादी अधिकारों का दमन और उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना हम सबकी साझी चिन्ता और सरोकार का विषय है। लेकिन यहां मैं भारत के जनवादी अधिकार आन्‍दोलन के समक्ष उपस्थित समस्‍याओं और चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित सभी जनवादी अधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और प्रबुद्ध नागरिकों का ध्‍यान एक अन्‍य बुनियादी पहलू की तरफ आकृष्‍ट करना चाहता हूं।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जनवादी अधिकारों के लिए आन्दोलन और मज़दूर वर्ग

जनवादी अधिकारों के लिए आन्दोलन और मज़दूर वर्ग


प्रसेन सिंह

साम्राज्यवाद के वर्तमान दौर में, भारत जैसे पिछड़े पूँजीवादी देश में, समाजवाद के लक्ष्य को लेकर नये सिरे से संघर्ष छेड़ने की तैयारी करते हुए, जनवाद या जनवादी अधिकारों की लड़ाई के बारे में आम तौर पर मज़दूर वर्ग के आन्दोलन का नज़रिया क्या होना चाहिए, इसके बारे में हम संक्षेप में कुछ बातें रखना चाहेंगे।

जब राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों का दौर था तो कारख़ानों में विदेशी पूँजीपतियों के साथ-साथ देशी पूँजीपतियों से भी लड़ते हुए मज़दूर वर्ग औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक जनान्दोलनों में भागीदारी कर रहा था। गाँवों में जो मज़दूर थे, वे बँधुआ मज़दूरी और बेगारी से मुक्ति की जनवादी लड़ाई लड़ रहे थे और सामन्ती भूस्वामियों के ख़िलाफ़ तमाम काश्तकारों के साथ उनका साझा मोर्चा बनता था।

1947 में औपनिवेशिक शासन की विदाई हुई, 1950 में एक बुर्जुआ जनवादी गणराज्य का संविधान लागू हुआ पर बुर्जुआ जनवाद का यह प्रोजेक्ट न केवल अधूरा था, बल्कि विकृत भी था। न केवल सामन्ती अवशेष लम्बे समय तक बने रहे, बल्कि पूँजीवाद ने पुराने मध्ययुगीन मूल्यों-संस्थाओं को भी काफ़ी हद तक थोड़ा हेर-फेर करके बनाये रखा। संविधान का अस्थि-पंजर 1935 के औपनिवेशिक क़ानून से बना था तथा क़ानून-व्यवस्था, न्यायपालिका, पुलिस-व्यवस्था और नौकरशाही का ढाँचा भी मूलतः पहले जैसा ही था। राष्ट्रीय आन्दोलन एक जनान्दोलन था, लेकिन जनक्रान्ति नहीं था क्योंकि उसके बुर्जुआ नेतृत्व ने जनान्दोलनों का दबाव बनाकर सत्तासीन होने तक की यात्रा तो तय की थी, लेकिन जनपहलकदमी को हर समय उसने पीछे धकेला और हर निर्णायक बिन्दु पर जनाकांक्षाओं के साथ विश्वासघात किया। फलतः राष्ट्रीय आन्दोलन एक आंशिक, क्रमिक और ‘पैस्सिव’ राजनीतिक क्रान्ति के रूप में सत्ता हस्तान्तरण का निमित्त तो बना, लेकिन सामाजिक जीवन में जनवादी मूल्यों-संस्थाओं की तथा जनता में जनवादी चेतना की कमी एक गम्भीर समस्या बनी रही। बुर्जुआ जनवाद का प्रोजेक्ट इन अर्थों में अधूरा और विकृत तो था ही कि इसने न तो साम्राज्यवादी विश्व से निर्णायक विच्छेद किया, न ही भूमि-सम्बन्धों का क्रान्तिकारी ढंग से पूँजीवादीकरण किया। साथ ही, यह इन अर्थों में भी अधूरा और विकृत था कि समाज में भी जनवादी चेतना की कमी थी तथा नौकरशाही, पुलिस, आम क़ानूनों और श्रम क़ानूनों का चरित्र भी रस्मी या नाममात्र का ही जनवादी था। यूँ तो बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति करने वाले अमेरिका और यूरोप के पूँजीपति वर्ग ने भी सत्तारूढ़ होने के बाद प्रबोधनकालीन बुर्जुआ दार्शनिकों के जनवादी आदर्शों को पूँजी के हित में तोड़-मरोड़कर रस्मी और संकुचित बना दिया था, पर भारतीय शासकों ने यह काम सौ गुना अधिक बेशर्म और विश्वासघाती ढंग से किया। पिछले साठ वर्षों के दौरान पूँजीवाद का जो क्रमिक विकास हुआ है, उसकी स्वतंत्र स्वयंस्फूर्त परिणति के तौर पर कुछ जनवादी संस्थाएँ और आकांक्षाएँ ज़रूर पैदा हुई हैं लेकिन दूसरी विरोधी गति शासक वर्गों और उनके वैश्विक सीनियर पार्टनर्स द्वारा जनवादी अधिकारों और आकांक्षाओं के निरन्तर दमन की रही है। उद्योगों के विस्तार ने जनवादी संस्थाएँ-आकांक्षाएँ पैदा की हैं, पर अनुत्पादक परजीवी वित्तीय तंत्र की सर्वग्रासी जकड़बन्दी ने सर्वसत्तावाद और निरंकुश स्वेच्छाचारिता का आधार मज़बूत बनाया है। नवउदारवाद के विगत दो दशकों के दौरान यह दूसरी गति ज़्यादा प्रबल हुई है। ऐसे समय में हम मज़दूर वर्ग के जनवादी अधिकारों की लड़ाई के बारे में या जनवादी अधिकारों की लड़ाई में मज़दूर वर्ग की भूमिका के बारे में सोच-विचार रहे हैं।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

तृतीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी

‘भारत में जनवादी अधिकार आन्‍दोलन: दिशा, समस्‍याएँ और चुनौतियाँ’

22-23-24 जुलाई
लखनऊ (उ.प्र.)

तीसरी अरविन्‍द स्‍मृति संगोष्‍ठी 22-23-24 जुलाई को लखनऊ (उ.प्र.) में आयोजित है। इस वर्ष संगोष्‍ठी का विषय है ‘भारत में जनवादी अधिकार आन्‍दोलन: दिशा, समस्‍याएँ और चुनौतियाँ’। संगोष्‍ठी भारत में जनवादी अधिकार और नागरिक स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलन की दशा-दिशा, समस्‍याओं, चुनौतियों और सम्‍भावनाओं पर केन्द्रित होगी।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

दूसरी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी, 26-28 जुलाई 2010, गोरखपुर
(विषय: इक्कीसवीं सदी में भारत का मज़दूर आन्दोलन)

भूमण्डलीकरण के दौर में मजदूर वर्ग के आन्दोलन और प्रतिरोध के नये रूप और रणनीतियाँ

भूमण्डलीकरण के दौर में मजदूर वर्ग के आन्दोलन और प्रतिरोध के नये रूप और रणनीतियाँ

द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में प्रस्‍तुत आधार आलेख

अभिनव सिन्‍हा

1. प्रस्तावना

भारतीय और साथ ही अन्तरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन आज एक गम्भीर संकट का शिकार है। यह अब किसी विवाद का विषय नहीं है कि सोवियत संघ में 1953 में और विशेषकर चीन में 1976 में मजदूर सत्ताओं के पतन के बाद से, पूँजी की शक्ति श्रम की शक्ति पर हावी रही है। यह एक दीगर बात है कि 1970 के दशक से ही स्वयं पूँजीवाद भी अपने संकट से कभी उबर नहीं पाया है। 1973 के आर्थिक संकट के बाद से विश्व पूँजीवाद ने किसी विचारणीय तेजी का दौर नहीं देखा है। लेकिन 1980 के दशक में अपनायी गयी भूमण्डलीकरण की नीतियों, सूचना-प्रौद्योगिकी व संचार क्रान्ति और पहले से बिखरे और एक हद तक निराशा के शिकार मजदूर वर्ग पर विचारधारात्मक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हमलों की बदौलत विश्व पूँजीवादी व्यवस्था ने अपनी जर्जर हालत के बावजूद 1970 के दशक के बाद से मजदूर वर्ग की तरफ से किसी भी अर्थपूर्ण प्रतिरोध को टालने और संगठित ही न होने देने में सफलता हासिल की है। भूमण्डलीकरण के इस दौर में भारत और कमोबेश पूरे विश्व में मजदूर वर्ग का आन्दोलन आज संकटग्रस्त है।

यहाँ हम एक सम्भावित भ्रम का पहले ही निवारण कर देना चाहेंगे। जब हम मजदूर वर्ग के आन्दोलन के संकटग्रस्त होने की बात करते हैं तो मजदूर वर्ग की विचारधारा, विज्ञान और विश्व-दृष्टिकोण के संकटग्रस्त होने की बात कतई नहीं कर रहे होते हैं। पूँजीवादी चिन्तकों, विचारकों और अर्थशास्त्रियों की ओर से मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद-माओवाद पर 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही जो भी हमले किये गये हैं, उनमें एक भी नयी बात नहीं है। उनमें से अधिकांश ऐसे थे जिनका जवाब मार्क्‍स-एंगेल्स के काल में दिया जा चुका था और जो बचे-खुचे थे, उनका जवाब लेनिन ने दे दिया था। अपनी मरणासन्न और रोगशैया-ग्रस्त अवस्था में 1960 के दशक से (गौरतलब है कि यही विश्व पूँजीवाद की आखिरी तेजी के दौर के समापन का वक्त था) विश्व पूँजीवाद ने कुछ विचार-सरणियों को जन्म दिया जिन्हें उत्तरआधुनिकतावाद, उत्तर-औपनिवेशिक सिध्दान्त, उत्तर संरचनावाद, आदि के नाम से पुकारा गया। दुनिया भर के मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी क्रान्तिकारी और अन्य मार्क्‍सवादी बुध्दिजीवी इस पूरे सिध्दान्त की धज्जियाँ उड़ा चुके हैं और यह दिखला चुके हैं कि इनमें कुछ भी नया नहीं है। यह नीत्शे, स्पेंगलर के मानवतावाद-विरोध, अराजकतावाद, काण्टीय अज्ञेयवाद, रूसी सर्वखण्डनवाद, उत्तर-औद्योगिक समाज के सिध्दान्तों, और कम्प्यूटर युग की मानवद्वेषी एब्सर्डिटी का कुरूपतम सम्भव मिश्रण है, और कुछ भी नहीं। यहाँ हमारा मकसद इन विचार-सरणियों के आलोचनात्मक विवेचन में जाना नहीं है, और यह अपने आप में एक ऐसा विषय है जो अलग से समर्पित चर्चा की माँग करता है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

भारत का मजदूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आन्दोलन : अतीत के सबक, वर्तमान समय की सम्भावनाएँ तथा चुनौतियाँ

भारत का मजदूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आन्दोलन : अतीत के सबक, वर्तमान समय की सम्भावनाएँ तथा चुनौतियाँ

द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में प्रस्‍तुत आलेख

सुखविन्दर
सम्पादक, ‘प्रतिबद्ध’, लुधियाना

”इतिहास अपने लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में मनुष्य की गतिविधि के सिवा कुछ नहीं है।”

– कार्ल मार्क्‍स, पवित्र परिवार

 

द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में उपस्थित साथियो,

जब मनुष्य अपने लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में प्रयत्न करता है तो इस प्रक्रिया में अतीत के प्रयोगों की शिक्षा की रोशनी में आगे बढ़ते हुए कई भूलें करता है, कभी सफल होता है तो कभी असफल। और अपने इन प्रयासों की नकारात्मक तथा सकारात्मक शिक्षाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है।

भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास लगभग नब्बे साल पुराना है। भारतीय मजदूर वर्ग इसके करीब चार दशक पहले से ही पूँजीवादी शोषण के विरुध्द संगठित संघर्षों की शुरुआत कर चुका था। मजदूर वर्ग के संघर्षों के जुझारूपन और कम्युनिस्टों की कुर्बानी, वीरता और त्याग पर शायद ही कोई सवाल उठा सकता है। लेकिन व्यापक सर्वहारा आबादी को नये सिरे से आर्थिक-राजनीतिक संघर्षों के लिए संगठित करने तथा उनके बीच मजदूर क्रान्ति के ऐतिहासिक मिशन का प्रचार करने की समस्याओं से जूझते हुए जब हम इतिहास का पुनरावलोकन करते हैं तो मजदूर आन्दोलन में कम्युनिस्ट पार्टी के काम को लेकर बहुत सारे प्रश्नचिह्न उठ खड़े होते हें।

यह लेनिनवाद की बुनियादी सर्वमान्य प्रस्थापना है कि उजरती ग़ुलामी के विरुध्द स्वत: उठ खड़ा होने वाला मजदूर आन्दोलन अपने आप, अपनी स्वतन्त्र गति से, समाजवाद के लिए संघर्ष नहीं बन जाता। इस सोच को लेनिन ने अर्थवादी, स्वत:स्फूर्ततावादी और संघाधिपत्यवादी सोच बताया था। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि (1) आर्थिक संघर्ष स्वयंस्फूर्त गति से राजनीतिक संघर्ष नहीं बना जाता, (2) कम्युनिस्टों को आर्थिक संघर्ष के साथ-साथ राजनीतिक माँगों के संघर्ष को आगे बढ़ाना और उन्नततर धरातल पर ले जाना होता है तथा साथ-साथ मजदूर वर्ग के बीच राजनीतिक शिक्षा एवं प्रचार की कार्रवाई चलानी होती है (यानी मजदूर आन्दोलन में वैज्ञानिक समाजवाद का विचार स्वत: नहीं पैदा हो जाता, बल्कि बाहर से डालना पड़ता है, (3) वर्ग संघर्ष की प्राथमिक पाठशाला के रूप में ट्रेड यूनियनों का महत्व अनिवार्य है, लेकिन एक राजनीतिक अखबार व अन्य माध्यमों से उन्नत चेतना वाले मजदूर तत्वों को मार्क्‍सवादी विचारधारा तक लाना और पार्टी-निर्माण को अंजाम देना सर्वहारा क्रान्ति की दिशा में आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

विश्व पूँजीवाद की संरचना एवं कार्यप्रणाली में बदलाव तथा भारत का मजदूर आन्दोलन : क्रान्तिकारी पुनरुत्थान की चुनौतियाँ

विश्व पूँजीवाद की संरचना एवं कार्यप्रणाली में बदलाव तथा भारत का मजदूर आन्दोलन : क्रान्तिकारी पुनरुत्थान की चुनौतियाँ

द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में प्रस्‍तुत आलेख


तपीश मेन्दौला
बिगुल मजदूर दस्ता

आज जिसे पूँजी का भूमण्डलीकरण कहा जा रहा है, वह मूलत: साम्राज्यवाद का ही एक नया दौर है। पूँजी की बुनियादी गति के नियम वही हैं, लेकिन उसकी कार्य-प्रणाली में कई अहम और बुनियादी बदलाव आये हैं। कार्य-प्रणाली का यही बदलाव हमें बाध्‍य कर रहा है कि हम मजदूर आन्दोलन की नयी रणनीति और नये रणकौशलों के बारे में गम्भीरता से सोचें-विचारें।

स्वतन्त्र प्रतियोगिता वाले पूँजीवाद के युग में ही मार्क्‍स ने ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र‘ में नये-नये बाजारों की तलाश के लिए पूँजी के वैश्विक विस्तार की स्वाभाविक अन्तर्निहित प्रकृति की चर्चा की थी : ”अपने माल के लिए बराबर फैलते हुए बाजार की जरूरत के कारण बुर्जुआ वर्ग दुनिया के कोने-कोने की खाक छानता है। वह हर जगह घुसने को, हर जगह पैर जमाने को, हर जगह सम्पर्क कायम करने को बाध्‍य होता है।” घोषणापत्र में ही मार्क्‍स ने स्पष्ट कर दिया था कि कच्चे माल और सस्ती श्रमशक्ति की तलाश और अपने उत्पादित माल के लिए लगातार नये बाजार की तलाश के लिए राष्ट्रीय सीमाओं को लाँघकर विश्व बाजार का निर्माण पूँजी की अन्तर्निहित प्रवृति होती है। पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय प्रवाह की लगातार तेज होती गति ने ही पूँजीवाद को साम्राज्यवाद की अवस्था तक पहुँचाया जो विश्व बाजार के निर्माण और उस पर वित्तीय पूँजी की प्रभुत्व का युग था। लेनिन ने इस युग की अभिलाक्षणिक विशिष्टताओं को इस प्रकार सूत्रबद्ध किया : 1. माल के निर्यात के साथ-साथ पूँजी का निर्यात होना और इस प्रवृत्ति का अधिक महत्वपूर्ण बन जाना, 2. उत्पादन और वितरण का विशाल ट्रस्टों और कार्टेलों में केन्द्रीकृत हो जाना, 3. बैंकिंग और औद्योगिक पूँजी का आपस में घुल-मिल जाना, 4. पूँजीवादी शक्तियों द्वारा पूरी दुनिया को अपने-अपने प्रभाव-क्षेत्रों में बाँट लेना, 5. इस विभाजन के पूरा हो जाने के बाद, दुनिया के बाजार के फिर से बँटवारे के लिए अन्तर-साम्राज्यवादी संघर्ष।

आज जिसे भूमण्डलीकरण कहा जा रहा है, वह साम्राज्यवाद के आगे की कोई नयी पूँजीवादी अवस्था नहीं बल्कि साम्राज्यवाद का ही एक नया दौर है। साम्राज्यवाद की बुनियादी अभिलाक्षणिक विशिष्टताएँ आज भी यथावत् मौजूद हैं। इतिहास को अनुभववादी नजरिये से देखने वालों को वर्तमान और भविष्य चाहे जितना भी अन्‍धकारमय नजर आये, वैज्ञानिक नजरिया यही बताता है कि यह युग साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रान्तियों का ही युग है। विश्व पूँजीवाद का दीर्घकालिक और असाध्‍य ढाँचागत संकट इस सच्चाई का सबसे बड़ा प्रमाण है कि पूँजीवाद अमर नहीं है, न ही यह मानव इतिहास की आखिरी मंजिल है। बीसवीं शताब्दी की मजदूर क्रान्तियों की हार भी कोई अन्तिम चीज नहीं है। यह मजदूर क्रान्तियों के पहले चक्र का अन्त है, जिसके सार-संकलन के आधार पर इक्कीसवीं शताब्दी की नयी मजदूर क्रान्तियों के सूत्रपात से लेकर विजय तक ऐतिहासिक महाभियान आगे डग भरेगा।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मजदूर आन्दोलन की नयी दिशा : सम्भावनाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ

मजदूर आन्दोलन की नयी दिशा : सम्भावनाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ

द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में प्रस्‍तुत आलेख

शेख अंसार
जनरल सेक्रेटरी, प्रगतिशील इंजीनियरिंग श्रमिक संघ, छत्तीसगढ़
उपाध्‍यक्ष, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा

इतिहास इस बात का गवाह है कि मजदूर आन्दोलन दुनिया में कहीं भी, ठहराव को तोड़कर लम्बी छलाँग ले पाने में और नयी ऊँचाइयों को छू पाने में तभी सफल हुआ है, जब उसने अपने अन्दर की विजातीय प्रवृत्तियों से, तमाम गैरसर्वहारा लाइनों से निर्मम, समझौताहीन संघर्ष किया है। जब ठहराव का दौर होता है और भटकावों का बोलबाला होता है तो मजदूर आन्दोलन के भीतर हावी कठमुल्लावाद, बौध्दिक अवसरवाद, अर्थवाद-संसदवाद, स्वयंस्फूर्ततावाद तथा ”वामपन्थी” और दक्षिणपन्थी भटकावों की रंग-बिरंगी अभिव्यक्तियों के खिलाफ केवल वही लोग मोर्चा ले पाते हैं, जिनमें तोहमतों-गालियों-छींटाकशियों की परवाह किये बिना धारा के विरुध्द तैरने का सच्चा लेनिनवादी साहस हो।

हम इस पर खुलकर और लम्बी बहस के लिए तैयार हैं, लेकिन हमें यह बात निर्विवाद लगती है कि पूरी दुनिया की और भारत की बदली हुई आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियों में क्रान्तिकारी मजदूर आन्दोलन का नयी जमीन पर, नये नक्शे के हिसाब से पुनर्निर्माण करना होगा। कहने की जरूरत नहीं कि उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के सभी मजदूर आन्दोलनों और सर्वहारा क्रान्तियों की विरासत हमारी धरोहर है, उनके बिना हम यहाँ नहीं होते और वर्तमान तथा भविष्य के बारे में विचार-विश्लेषण भी नहीं कर पाते। लेकिन अतीत के इन संघर्षों के दोहराव मात्र से नया भविष्य नहीं रचा जा सकता। परम्परा के पक्ष पर आज परिवर्तन के पक्ष की प्रधानता कायम हो चुकी है। परम्परा से काफी कुछ लेना और सीखना है, लेकिन विश्व पूँजीवाद की संरचना तथा पूँजीवादी उत्पादन एवं विनिमय की प्रक्रिया में आये बदलावों को वैज्ञानिक भौतिकवादी पद्धति से समझकर मजदूर आन्दोलन की नयी रणनीति और नयी राह विकसित करनी ही होगी। नयी परिस्थितियों को समझकर नयी राह विकसित करने में, मजदूर आन्दोलन के अन्दर मौजूद भटकाव सबसे अधिक बाधा पैदा करते हैं। कठमुल्लावादी अड़ जाते हैं कि यदि हम साम्राज्यवादी दुनिया में जी रहे हैं तो यह हूबहू वैसी ही है, जैसी लेनिन ने बतायी थी या 1963 में चीन की पार्टी ने बतायी थी। दूसरी ओर बौध्दिक अवसरवादी हैं जो साम्राज्यवाद के वर्तमान दौर का अथवा अतीत के समाजवादी प्रयोगों का बुध्दिविलासी विश्लेषण करते-करते ”मुक्त चिन्तक” बन जाते हैं और सिध्दान्त के विकास के दावे करते हुए अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद की गन्दगी में मुँह के बल जा गिरते हैं।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी

विषय: इक्कीसवीं सदी में भारत का मज़दूर आन्दोलन: निरन्तरता और परिवर्तन, दिशा और सम्भावनाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ

(26 जुलाई-28 जुलाई, 2010)
गोरखपुर (उ.प्र.)

 

प्रिय साथी,

हमारे अनन्य सहयोध्दा का. अरविन्द के असामयिक निधान (24 जुलाई 2008) को दो वर्ष होने को आ रहे हैं। उनके न होने को वे तमाम लोग आज भी स्वीकार नहीं कर पाते, जिन्होंने उनके साथ काम किया है। उनकी कमी लम्बे समय तक पूरी नहीं की जा सकती, पर उनके सपने हमारे सपनों में जीवित रहेंगे और हमारे संकल्पों को मज़बूत बनाते रहेंगे।

का. अरविन्द की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर गत वर्ष 24 जुलाई को नयी दिल्ली में प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसका विषय था: ‘भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम क़ानून और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोधा के नये रूप।’ अब इसी विषय को विस्तार देते हुए इस वर्ष ‘द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी’ का विषय निर्धारित किया गया है: ‘इक्कीसवीं सदी में भारत का मज़दूर आन्दोलन : निरन्तरता और परिवर्तन, दिशा और सम्भावनाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ।’

विषय की व्यापकता को देखते हुए इस वर्ष संगोष्ठी तीन दिनों की रखी गयी है। पहले दिन के पहले सत्र में ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ और उसके तत्वावधान में संचालित होने वाले ‘अरविन्द मार्क्‍सवादी अध्ययन संस्थान’ की स्थापना की औपचारिक घोषणा की जायेगी तथा इनके उद्देश्य और कार्यभारों पर सभी आमन्त्रित साथियों के साथ अनौपचारिक अन्तरंग बातचीत की जायेगी। इस स्मृति न्यास और मार्क्‍सवादी अध्ययन संस्थान की स्थापना का निर्णय गोरखपुर में का. अरविन्द के निधन के बाद 27 जुलाई, 2008 को आयोजित शोक सभा में लिया गया था। अब आप सभी साथियों के सहयोग से इसे अमली जामा पहनाया जा रहा है।

26 जुलाई के दूसरे सत्र से लेकर 28 जुलाई के दूसरे सत्र तक संगोष्ठी के लिए निर्धारित विषय पर आलेख पढ़े जायेंगे और उन पर विचार-विमर्श चलेगा।(…पूरा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

पहली अरविन्द स्मृति संगोष्ठी, 24 जुलाई 2009, दिल्‍ली
(विषय: भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप)

पहली अरविन्द स्मृति संगोष्ठी (24 जुलाई, 2009), दिल्‍ली
‘भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप’
‘विश्‍व पूंजीवाद की संरचना एवं कार्यप्रणाली तथा उत्‍पादन-प्रक्रिया में बदलाव मजदूर-प्रतिरोध के नये रूपों को जन्‍म देगा’

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पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविन्‍दर संगोष्‍ठी में अपनी बात रखते हुए।

संगोष्ठी के विषय का संक्षिप्त परिचय देते हुए संचालक सत्यम ने बताया कि पिछली सदी के लगभग अन्तिम दो दशकों के दौरान वित्‍तीय पूँजी के वैश्विक नियंत्रण एवं वर्चस्व के नये रूप सामने आये हैं, पूँजी की कार्यप्रणाली में व्यापक और सूक्ष्म बदलाव आये हैं और अतिलाभ निचोड़ने की नयी प्रविधियाँ विकसित हुई हैं। अतिलाभ निचोड़ने की प्रक्रिया से एकत्र पूँजी के अम्बार ने विगत लम्बे समय से जारी पूँजीवाद के ढाँचागत संकट और दीर्घकालिक मन्दी को नयी सदी में एक ऐसे विस्फोटक मुकाम तक पहुँचा दिया है, जिसका साक्षी इतिहास पहले कभी नहीं हुआ था। इस स्थिति ने, समाजवाद के बीसवीं शताब्दी के प्रयोगों की पराजय के बाद पूँजीवाद की अजेयता और अमरत्व का जो मिथक गढ़ा जा रहा था, उसे चकनाचूर कर दिया है। लेकिन पूँजी का भूमण्डलीय तंत्र स्वत: नहीं टूटेगा, यह श्रम की शक्तियों के सुनियोजित प्रयासों से ही टूटेगा। आज का विचारणीय प्रश्न यह है कि मज़दूर वर्ग, अपने ऐतिहासिक मिशन के लिए आगे बढ़ पाना तो दूर, अपनी फौरी और आंशिक हितों एवं माँगों की लड़ाई को भी संगठित नहीं कर पा रहा है। छिटपुट मुठभेड़ों, स्वत:स्फूर्त आन्दोलनों और आत्मरक्षात्मक संघर्षों से आगे बढ़कर वह ज्यादा कुछ भी नहीं कर पा रहा है। इसलिए, आज की बुनियादी चुनौती यह है कि भूमण्डलीकरण के दौर में पूरे विश्व पूँजीवादी तंत्र के ढाँचे और क्रियाविधि में आये बुनियादी बदलावों को देखते हुए मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के रूपों और रणनीतियों में बदलाव के प्रश्न पर गहराई और व्यापकता के साथ विचार किया जाये। इस सन्दर्भ में हमें बड़े-बड़े कारख़ानों में मज़दूर-आबादी के संकेन्द्रण के बजाय छोटे-छोटे कारख़ानों-आबादियों में मज़दूर आबादी को बिखेर देने वाली नयी विकेन्द्रित उत्पादन प्रक्रिया पर, मज़दूर आबादी के अनौपचारिकीकरण के विविध रूपों पर तथा श्रम कानूनों और उनको लागू करने वाले तंत्र की बढ़ती निष्प्रभाविता पर गहराई से विचार करना होगा। हमें बहुसंख्यक ठेका, दिहाड़ी व अनियमित मज़दूरों से परम्परागत ट्रेड यूनियनों की दूरी और नियमित मज़दूरों की एक अत्यन्त छोटी आबादी तक उनके सिकुड़ जाने की स्थिति पर सोचते हुए बहुसंख्यक असंगठित मज़दूरों को संगठित करने के नये रूपों पर विचार करना होगा। साथ ही, हमें उत्‍तर-औपनिवेशिक समाजों में पूँजीवादी विकास की आम प्रवृत्ति पर सोचते हुए इन देशों में सर्वहाराकरण और बढ़ती ग्रामीण सर्वहारा आबादी की भूमिका का भी पुनर्मूल्यांकन करना होगा। हमारे विचार-विमर्श का एक पहलू यदि मज़दूर आन्दोलन के आर्थिक और फौरी संघर्षों के स्वरूप से जुड़ा है तो दूसरा पहलू उसके पूँजीवाद-विरोधी ऐतिहासिक मिशन को पूरा करने वाले दूरगामी राजनीतिक संघर्ष की नयी रणनीति के सन्धान से जुड़ा है। यह संगोष्ठी इस विषय पर सार्थक संवाद की एक शुरुआत भर है।(…पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)