पाँचवी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का दूसरा दिन

पाँचवी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का दूसरा दिन

चीनी क्रान्ति पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए 'प्रतिबद्ध' पत्रिका के सम्‍पादक सुखविन्‍दर

चीनी क्रान्ति पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए ‘प्रतिबद्ध’ पत्रिका के सम्‍पादक सुखविन्‍दर

इलाहाबाद, 11 मार्च। इलाहाबाद के विज्ञान परिषद सभागार में “समाजवादी संक्रमण की समस्याएं” विषय पर चल रही पांचवीं अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के दूसरे दिन आज तीन महत्वपूर्ण पेपर प्रस्तुत किये गये और उन पर बहस हुई।
आज के पहले सत्र में पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविन्दर ने अपना पेपर प्रस्तुत किया जिसका शीर्षक था ”चीन में समाजवादी निर्माण, महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति और माओवाद’’। इस पेपर में माओकालीन चीन में समाजवादी निर्माण के प्रयोगों का चरणबद्ध ब्यौरा प्रस्‍तुत किया गया और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के विश्व-ऐतिहासिक अवदान को रेखांकित किया गया। पेपर में चीन में 1949 में हुई नव-जनवादी क्रान्ति से लेकर 1976 में माओ-त्से–तुङ की मृत्यु तक चीनी पार्टी में विभिन्न दौरों में विभिन्न मुद्दों पर चले दो लाइनों के बीच के संघर्ष का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुृत किया गया। चीन में 1949 की नव-जनवादी क्रान्ति के बाद सामन्ती शोषण की जड़ों को उखाड़ फेंकने के बाद 1950 के मध्य में ‘महान अग्रवर्ती छलांग’ लगाकार समाजवादी निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, सहकारी खेती से सामूहिक खेती की ओर संक्रमण शुरू हुआ तथा उद्योग और व्यापार में भी समाजवादी उत्पादन संबन्धों की ओर संक्रमण शुरू हुआ। पेपर में इस पूरी प्रक्रिया के दौरान चीनी पार्टी के समक्ष उत्प‍न्न चुनौतियों और उसके द्वारा उठाये गये क़दमों एवं इस समूची प्रक्रिया में समाज व पार्टी के भीतर जारी संघर्ष की विस्तारपूर्वक पड़ताल की गयी। इसके अतिरिक्त पेपर में सोवियत संघ के समाजवादी प्रयोगों की माओ द्वारा प्रस्तुरत आलोचनात्मक विश्लेषण की भी चर्चा की गयी। साथ ही पेपर में ख्रुश्‍चेवी संशोधनवाद के दौर में चली ‘महान बहस’ के ऐतिहासिक महत्व की भी चर्चा की गई। 1960 और 1970 के दशक में माओ के नेतृत्व में चलाई गई महान सर्वहारा सांस्कृातिक क्रान्ति के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं को पेपर में विशेष महत्व दिया गया। मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा के प्रवर्तन के बाद लेनिन ने साम्राज्यवाद के दौर में इस विचारधारा में गुणात्मक इजाफ़ा किया जिसकी वजह से इसे मार्क्सवाद-लेनिनवाद कहा गया। पेपर में कहा गया कि माओ ने समाजवादी संक्रमण की दीर्घकालिक अवधि के दौरान पूंजीवाद की पुर्नस्‍थापना रोकने के लिए अधिरचना के क्षेत्र में सतत क्रान्ति का जो सिद्धान्त दिया उसके सार्वभौमिक महत्व को देखते हुए आज के दौर में मार्क्सवादी विज्ञान को मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ-त्से-तुङ विचार की बजाय मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद कहना ज्यादा सटीक होगा।

महान बहस पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करती हुई जेएनयू की छात्रा लता

महान बहस पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करती हुई जेएनयू की छात्रा लता

दूसरा पेपर अन्त‍रराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोेलन की आम दिशा विषयक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के ऐतिहासिक दस्तावेज़ के आधी सदी बाद एक विचारधारात्मक पुर्नमूल्यांकन पर केन्द्रित था। इस पेपर में खुश्र्चेवी संशोधनवाद के खि़लाफ़ चीनी पार्टी द्वारा चलाई गई ‘’महान बहस’’ के विचारधारात्म्क महत्व को रेखांकित किया गया। साथ ही भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में पिछले कुछ दशकों के दौरान उत्पादन संबन्धोंं में आये बदलाव के मद्देनज़र 1963 की ‘जनरल लाइन’ के कार्यक्रम सम्‍बन्धित सूत्रीकरण की अप्रासंगिकता की चर्चा की गयी तथा यह आश्चर्य प्रकट किया गया कि इसमें अभी भी भारत के तमाम क्रन्तिकारी संगठन कठमुल्लावादी तरीके से इस कार्यक्रम से चिपके हुए हैं और कार्यक्रम के सवाल को विचारधारा के सवाल में गडमड कर रहे हैं। इस पेपर को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली से आयीं लता ने प्रस्तुत किया।

आज प्रस्तुत तीसरे पेपर का शीर्षक था ‘’स्तालिन और सोवियत समाजवाद’’, जिसे लुधियाना से आये डा. अमृत ने प्रस्तुत

स्‍तालिन के प्रश्‍न पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए डा. अमृतपाल

स्‍तालिन के प्रश्‍न पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए डा. अमृतपाल

किया। इस पेपर में साम्राज्यावादियों, त्रात्सीकीपंथियों और ‘’मुक्त चिंतक मार्क्सवादियों’’ द्वारा स्तालिन के ऊपर लगाये जानेवाले मिथ्या आरोपों का तथ्यों और तर्कों सहित खंडन किया। पेपर में ब्रेस्त-लितोवस्‍त संधि और गृह-युद्ध के दौरान स्तालिन की भूमिका सम्‍बन्धित झूठ, ‘’लेनिन की वसीयत’’ के मिथ्या प्रचार, एक देश में समाजवाद स्थापित करने सम्‍बन्धित विवाद, कृषि में सामूहिकीकरण और कुलक वर्ग के सफ़ाये के दौरान स्तालिन के नेतृत्व में पार्टी द्वारा उठाये गये कदमों के बारे में दुष्प्रचार, 1936-38 के मुकदमें और शुद्धीकरण की मुहिम के बारे में प्रचारित झूठों, दूसरे विश्व युद्ध के पहले सोवियत-जर्मन समझौते के बारे में इतिहास के विकृतिकरण और वैज्ञानिकों पर दमन सम्‍बन्धित झूठों का पर्दाफ़ाश किया गया। पेपर में स्तालिनकालीन सोवियत संघ में विज्ञान के प्रोत्साहन से जुड़े कुछ दिलचस्प प्रसंगों का जिक्र किया गया। इसके अतिरिक्त स्तालिन द्वारा पार्टी के भीतर नौकरशाही के खिलाफ़ और जनवाद के लिए किये गये संघर्ष का सप्रमाण ब्योरा प्रस्तुत किया गया। साथ ही साथ पेपर में स्तालिन के दौर की कुछ गंभीर विचारधारात्मक ग़लतियों को भी रेखांकित किया गया।

Seminar second day - 7तीनों पेपरों को प्रस्तुत करने के बाद उन पर बहस की शुरूआत हुई। बहस में हस्तक्षेप करने वालों में मुख्य थे : बिहार के रामाशीष गुप्ता और रघुनाथ प्रसाद, औरंगाबाद से बब्बन ठोके, जयपुर से पी एल शकुन, लुधियाना से नवकरण, लालजीत व दलजीत, औरंगाबाद से दत्तू, संगरूर से संदीप, दिल्ली के सनी, मुंबई की दीप्ति और दिल्ली के तपीश और अभिनव।
आलेखों पर हुई चर्चा में भाग लेते हुए भोजपुर से आये रामाशीष गुप्ता ने कहा कि महान नेताओं से अतीत में हुई गलतियों की बात करना साहस की बात है, लेकिन हमें इन गलतियों से सीखकर आगे का रास्ता निकालना है। उन्होंने कहा कि अगर कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल को भंग न किया गया होता तो मार्क्सवाद पर हो रहे हमलों का अच्छा जवाब दिया जा सकता था। इसका जवाब देते हुए सुखविन्दर ने कहा कि कॉमिंटर्न को किसी नेता के व्यक्तिवाद के कारण नहीं बल्कि उस समय रूसी और चीनी पार्टियों सहित सभी कम्‍युनिस्ट पार्टियों की सहमति से भंग किया गया था। कॉमिंटर्न का तत्कालीन विश्‍व पार्टी का स्वरूप नई परिस्थितियों के अनुरूप नहीं था लेकिन अगर एक नये स्‍वरूप में कॉमिंटर्न होता तो निश्चय ही आधुनिक संशोधनवाद के विरूद्ध संघर्ष और मार्क्सवाद के प्रचार प्रसार के लिए बहुत अच्छा होता। ऐसे किसी मंच की आज बहुत जरूरत है। मुंबई से आई एयरपोर्ट वर्कर्स यूनियन की दीप्ति गोपीनाथ ने कहा कि स्तालिन पर साम्राज्यवादी सबसे अधिक हमले करते हैं क्योंकि वह संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्क्सवाद की विभाजक रेखा है। हमें उनकी डटकर हिफाजत करनी चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में बेल्जियम कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव लूडो मार्टेन्स की किताब ‘अनदर व्यू ऑफ स्तालिन’ का विशेष रूप से उल्लेख किया।Seminar second day - 2
अभिनव ने आरसीपी, यूएसए द्वारा प्रस्तु‍त न्यू‍ सिंथेसिस के सिद्धान्त की आलोचना करते हुए कहा कि बॉब अवाकियन मार्क्स के समय से ही मार्क्सवाद में रिडक्शेनिज्म की बात करते हैं और इस यांत्रिक भटकाव का कारण वे निषेध का निषेध के सूत्र को बताते हुए उसे खारिज करते हैं। वे साम्राज्यवाद के दौर में कमज़ोर कड़ि‍यों के टूटे बिना साम्राज्यवादी देशों में क्रान्ति की बात करते हैं हालाँकि यह वर्तमान परिस्थितियों के मूल्यांकन से मेल नहीं खाता। रूस और चीन की क्रान्तियों में राष्ट्रीयवादी भटकाव और बुद्धिजीवियों के साथ व्यवहार सम्बन्धी उनकी बात को भी माना नहीं जा सकता। उनकी बातों में प्रथम दृष्टतया जो सही है वह नया नहीं है और जो कुछ नया है वह सही नही हैं। निरपेक्ष सत्य की उनकी अवधारणा भी गैरद्वंद्वात्मक है।

आज के सत्रों की अध्यक्षता मुंबई के हर्ष ठाकोर, पटना के देवाशीष बराट और कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता कात्यायनी ने की। संगोष्ठी में पहले दिन की भांति दूसरे दिन भी रात तक बहस चली और आने वाले तीन दिनों में भी समाजवादी संक्रमण से जुड़े तमाम मुद्दों, नेपाल, वेनेजुएला, क्यूबा आदि की मौजूदा परिस्थितियों पर पेपर प्रस्तुत होंगे और बहस-मुबाहसा होगा । कल पहला सत्र नेपाली क्रान्ति पर केन्द्रित होगा।

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