स्तालिन और सोवियत समाजवाद

स्तालिन और सोवियत समाजवाद

डॉ. अमृत

स्‍तालिन के प्रश्‍न पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए डा. अमृतपाल

स्‍तालिन के प्रश्‍न पर अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए डा. अमृतपाल

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब ‘इतिहास के अन्त’ का अन्त हो चुका है, तार्किक चयन करने वाले उदार जनवादी नागरिक के ‘अन्तिम मनुष्य’ होने की बकवासें भी बन्द हो चुकी हैं। पूँजीवादी व्यवस्था संकट का शिकार है, अरब जगत और यूरोपीय देशों में लोग सड़कों पर हैं और उत्तरी अफ्रीका व मध्य-पूर्व साम्राज्यवादी दख़लअन्दाज़ी और जंग का अखाड़ा बने हुए हैं। साधारण जनता, विद्यार्थी और बुद्धिजीवी पूँजीवादी व्यवस्था से मोहभंग की स्थिति में हैं और पूँजीवादी व्यवस्था का विकल्प तालाश रहे हैं लेकिन जनवाद की तमाम प्रकार की लफ्फाज़ी के बावजूद विकल्प कोई नहीं मिल रहा, क्योंकि पूँजीवादी व्यवस्था का विकल्प आज भी समाजवाद ही है, पूँजीपतियों की सत्ता का विकल्प आज भी मज़दूर वर्ग की सत्ता है। दूसरी तरफ़ विश्वभर के पूँजीपतियों को आज फिर कम्युनिज़्म का भूत पहले किसी भी समय से कहीं अधिक सता रहा है। मज़दूर वर्ग की विचारधारा और क्रान्ति के विज्ञान मार्क्सवाद पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं; मार्क्सवाद, बीसवीं सदी की क्रान्तियों और समाजवाद के प्रयोगों और कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेताओं पर पहले से कहीं अधिक कीचड़ उछाला जा रहा है। क्योंकि बुर्जुआजी मार्क्सवाद को एक विज्ञान के रूप में नकारने में पूरी तरह से नाकाम हो चुकी है, इसलिए अब उसके बाद कीचड़ उछालने, भ्रम फैलाने और ग़लत जानकारियाँ प्रचारित करने के सिवा अन्य कोई तरीका बचा भी नहीं है; यह काम वह अपने विशाल मीडिया तंत्र की सहायता से बड़े पैमाने पर कर रही है।

कीचड़ उछालने और भ्रम पैदा करने के पूरे कारोबार में दो प्रकार के लोग हैं – पहले प्रकार के लोग तो मार्क्सवाद और मज़दूर-वर्गीय आन्दोलन के ऐलानिया शत्रु हैं, जबकि दूसरे प्रकार के लोग “मार्क्सवादी” हैं। इन “मार्क्सवादियों” में से कई बुर्जुआ प्रचार के असर में आए हुए साधारण लोग हैं, कई “अनुभववादी” क़िस्म के क्रान्तिकारी हैं जो मार्क्सवाद, मज़दूर-वर्गीय आन्दोलन का इतिहास और बीसवीं सदी की क्रान्तियों के समाजवादी प्रयोगों के अध्ययन के “मुश्किल” काम में हाथ डालने से डरते हैं या ग़ैर-ज़रूरी समझते हैं। कई अन्य हैं जो अपनी अधकचरी मार्क्सवादी समझ से विश्लेषण करते हैं और नतीजे के तौर पर ग़लत विश्लेषण करके भ्रम फैलाते हैं। कुछ अन्य “क्रान्तिकारियों” व “आवारा-चिन्तकों” को मार्क्सवाद में इज़ाफ़ा करने की जल्दी है, इस जल्दी में वे मार्क्सवाद की बुनियादी प्रस्थापनाओं को तिलांजलि दे रहे हैं और नये-नये सिद्धान्त पेश कर रहे हैं। ऐलानिया दुश्मनों और “मार्क्सवाद” के लबादे में छिपे हुए कुत्साप्रचार के कारण बहुत सारे ईमानदार क्रान्तिकारियों और साधारण क़तारों व जनता में भी भ्रामक स्थिति बनी हुई है। इसलिए कम्युनिस्ट आन्दोलन के आगे के विकास के लिए बीसवीं सदी की क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों की सफ़लताओं और असफ़लताओं का विश्लेषण करते हुए न सिर्फ़ कुत्साप्रचार का पुख्ता जवाब देना, बल्कि सही नतीजे निकालना और हासिल किए गए सबकों को आत्मसात करना एक महत्वपूर्ण शर्त है।

सोवियत समाजवाद के प्रयोग के साथ स्तालिन का प्रश्न अटूट रूप से जुड़ा हुआ है क्योंकि लेनिन की मृत्यु के बाद उन्होंने सोवियत यूनियन का नेतृत्व किया और पहले समाजवादी राज्य का कार्यभार हाथों में लिया। दूसरा, बुर्जुआ बौद्धिक हलक़े और प्रचार मशीनरी स्तालिन पर कीचड़ उछालने के जरिए वास्तव में मार्क्सवाद और कम्युनिज़्म पर हमला करते हैं। स्तालिन के दौर की, गलतियों-कमजोरियों से सबक़ हासिल करना मज़दूर-क्रान्तियों के नए संस्करणों के लिए न सिर्फ़ क्रान्ति के बाद ही, बल्कि क्रान्ति से पहले पार्टी खड़ी करने और सही विचारधारात्मक, कार्यक्रम और सांगठनिक लाइन अख्तियार करने के लिए भी लाज़िमी है। इस पेपर में स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत पार्टी द्वारा ली गईं राजनीतिक अवस्थितियों के बारे में भी चर्चा करेंगे और स्तालिन के ख़िलाफ़ जिन मुद्दों पर कुत्साप्रचार किया जाता है, उनपर भी चर्चा करेंगे; साथ ही अन्तिम हिस्से में हम स्तालिन के समय की प्राप्तियों पर निगाह डालेंगे, और गलतियों की संक्षेप चर्चा भी करेंगे जिनका स्रोत काफ़ी हद तक तो वस्तुगत परिस्थितियों जैसे उस समय तक की मार्क्सवाद की समझ, पहले कोई अनुभव न होना, प्रतिकूल परिस्थितियाँ और कुछ मनोगत कारण जैसे विचारधारात्मक और दार्शनिक गड़बड़ियाँ थीं।

सबसे पहले हम अक्टूबर क्रान्ति से लेकर लेनिन की मौत तक के समय के दौरान स्तालिन पर बुर्जुआ प्रचार मशीनरी, त्रॉत्सकीवादियों और हर तरह के भगोड़े-संशोधनवादियों द्वारा थोपे जाने वाले इल्जामों पर एक नज़र डालते हैं। वैसे इन इल्जामों में कोई ख़ास दम नहीं है और न ही ये मुद्दे बहुत अधिक अहमियत वाले हैं, लेकिन फिर भी जितने बड़े स्तर पर इन्हें आधार बनाकर त्रॉत्सकी व उसके पैरोकारों द्वारा, ख्रुश्चेवी संशोधनवादियों द्वारा, बुर्जुआ मीडिया व बौद्धिक चाकरों द्वारा अन्य हर प्रकार के क्रान्ति से भगोड़ों, मोहभंग या निराशा की हालत में जीने वाले बुद्धिजीवियों व व्यक्तियों द्वारा स्तालिन के ख़िलाफ़ और इस के ज़रिए रूसी क्रान्ति, समाजवाद और मार्क्सवाद पर कीचड़ उछाला जाता है, उसे देखते हुए इस कुत्साप्रचार के बारे में विस्तार में जाकर बात कर लेना ग़लत नहीं होगा। इस प्रचार के दो मुख्य बिन्दु हैं – स्तालिन की अक्टूबर क्रान्ति व गृहयुद्ध में बड़ी भूमिका नहीं थी, मुख्य भूमिका लेनिन व त्रॉत्सकी की थी, स्तालिन साज़िशों के जरिए पार्टी महासचिव बने और सबसे ऊपर लेनिन की तथाकथित “वसीयत”। एक-एक करके देखते हैं।

अक्टूबर क्रान्ति, ब्रेस्त-लितोवस्क संधि और घरेलू युद्ध में स्तालिन की भूमिका

अक्सर यह प्रचारित किया जाता है कि स्तालिन की क्रान्ति में कुछ ख़ास भूमिका नहीं थी और वह साज़िशी और तिकड़मबाज़ी ढंगों से पार्टी की नेतृत्वकारी क़तारों में जा पहुँचे और त्रॉत्सकी के मुताबिक़ “स्तालिन … पार्टी में एक मिसाली औसत था।” 1 अक्टूबर क्रान्ति के समय केन्द्रीय समिति के सदस्यों के बारे में त्रॉत्सकी ने यह लिखा है:

“लेनिन सभी के लिए नेता थे लेकिन जैसा कि तथ्य बताते हैं उन्होंने चार महीनों से पार्टी के कामों में सीधा हिस्सा नहीं लिया था (!!) … पुराने बोल्शेविक केन्द्र में सबसे अहम नेता जिनोवियेव और कामेनेव थे लेकिन क्रान्ति का विरोध करके उन्होंने ख़ुद को कार्यकर्ताओं की हैसियत से दूर कर लिया था … स्वेर्दलोव नए थे और वे बाद में जाकर विकसित हुए … जरेजिन्सकी अभी नए ही पार्टी में भर्ती हुए और उन्होंने कोई सैद्धान्तिक काम की प्रतिभा नहीं दिखाई थी … बुखारिन प्रतिभाशाली पर ग़ैर-भरोसेमन्द सिद्धान्तकार माने जाते थे … राइकोव व नोगिन बग़ावत के विरोधी थे … लोमोव, बाबोनोव व मिलिऊतिन को फ़ैसले लेने में शायद ही कोई गिनती में रखता हो … जॉफ्फे व ऊरोत्स्की (दोनों त्रॉत्सकीपंथी – लेखक) त्रॉत्सकी के साथ नज़दीकी रूप में जुड़े हुए थे और मिलकर काम कर रहे थे।”2

यानी स्तालिन क्रान्ति के दौरान कहीं भी नहीं थे। लगभग इसी तरह का राग हर तरह के बुर्जुआ लेखन में अलापा जाता है और सबके स्रोत आम तौर पर त्रॉत्सकी और ख्रुश्चेव होते हैं। क्या स्तालिन सचमुच में क्रान्ति के समय कहीं नहीं थे? मार्च–दिसम्बर, 1917 के बीच स्तालिन के 84 लेख बोल्शेविक अख़बारों, पत्रिकाओं में छपे। बोल्शेविक अख़बारों के सम्पादन का काम स्तालिन के पास था, पार्टी की जुलाई, 1917 की कांग्रेस में केन्द्रीय कमेटी की ओर से रिपोर्ट स्तालिन ने पढ़ी क्योंकि लेनिन भूमिगत थे। पार्टी के क्रान्ति को संगठित करने के केन्द्र के वह सदस्य थे। क्रान्ति के लिए बग़ावत करने के लेनिन के प्रस्ताव की हिमायत करने वाले त्रॉत्सकी के साथ-साथ स्तालिन भी मुख्य सदस्यों में से थे। क्रान्ति के तुरन्त बाद वह राष्ट्रीयताओं के मसलों से सम्बन्धित बहुत ही अहम विभाग के कमिसार थे जिसपर वह 1923 तक बने रहे जब तक इसे ख़त्म नहीं कर दिया गया। लेकिन त्रॉत्सकी अक्टूबर क्रान्ति के बारे में तथ्यों की हास्यास्पद स्तर तक तोड़-फोड़ करता है। एक बात और, त्रॉत्सकी की क्रान्ति में भूमिका को स्तालिन ने जरा भी नहीं नकारा, हाँ यह ज़रूर कहा कि विभिन्न ज़िम्मेदार पदों पर रहते हुए पार्टी की नीति को ही लागू कर रहे थे जैसा कि उस समय बाक़ी सभी कर रहे थे, यह कहना कि त्रॉत्सकी की क्रान्ति में कोई “ख़ास” भूमिका रही है, यह ग़लत पेशकारी है। क्रान्ति में अगर किसी की ख़ास भूमिका रही है, वह सिर्फ़ लेनिन थे।3 इस में, शायद ही किसी को कोई शक हो।

ब्रेस्त लितोवस्क संधि – क्रान्ति के बाद त्रॉत्सकी को विदेशी मामलों का कमिसार बनाया गया था। जैसा कि सभी को पता है कि लेनिन युद्ध में शान्ति-संधि करके घरेलू मोर्चे पर ध्यान केन्द्रित करने के पक्षधर थे, इसलिए उनका ज़ोर किसी भी तरह जंग से बाहर निकलने पर था। लेकिन शान्ति-संधि करने पर पार्टी में तीखे मतभेद थे। लेनिन, स्तालिन और स्वेर्दलोव किसी भी क़ीमत पर जर्मनी के साथ शान्ति-संधि करने के पक्ष में थे क्योंकि उनके मुताबिक़ नवोदित सोवियत राज्य दो मोर्चों, विदेशी और घरेलू, पर एक साथ नहीं लड़ सकता था। लेनिन का कहना था कि बाहरी मोर्चे पर शान्ति स्थापित करके घरेलू मोर्चे पर निपटा जाए, जो क्षेत्र शान्ति-संधि के दौरान जर्मनों के लिए छोड़ने पड़ेंगे वे वापिस लिए जा सकते हैं अगर सोवियत राज्य टिक जाता है। जबकि बुखारिन, रादेक आदि “वामपंथी कम्युनिस्टों” का कहना था कि क्रान्तिकारी जंग लड़ी जाए। त्रॉत्सकी ने यहाँ भी अपनी “बौद्धिकता” दिखाई। उसके मुताबिक़ हमें युद्ध भी नहीं लड़ना और शान्ति-संधि भी नहीं करनी (न युद्ध, न शान्ति), बस सेना को बिखेर दिया जाए।

दिसम्बर, 1917 के पहले सप्ताह में जर्मनी और रूस में युद्धबन्दी हो गई और शान्ति-वार्ता शुरू हुई। यह शान्ति-वार्ता कई सप्ताह तक चली, जिस दौरान लेनिन केन्द्रीय कमेटी को शान्ति-संधि के लिए लगातार मनाते रहे लेकिन वह लगातार अल्पमत में थे। उधर, जर्मनी की शर्तें दिन-ब-दिन तीखी होती जा रही थीं। जर्मनी ने 9 फरवरी, 1918 को यूक्रेन के साथ अलग से संधि कर ली, तो त्रॉत्सकी जो कि रूस की तरफ़ से शान्ति-वार्ता का अध्यक्ष था, ने एकतरफ़ा तौर पर बिना शान्ति-संधि किए, बिना पार्टी की राए लिए वार्ता ख़त्म कर दी और रूस के युद्ध में से निकलने का ऐलान कर दिया। उसके मुताबिक़ सोवियत सरकार का रुख़ जर्मन सर्वहारा को विद्रोह करने के लिए उत्साहित करेगा और जर्मनी में क्रान्ति हो जाने पर ही रूस में मज़दूर राज्य टिक सकेगा (Permanent Revolution!), लेकिन व्यवहार में इसका नतीजा यह था कि जर्मनी के सैनिकों ने सिर्फ़ रेलगाड़ी में बैठकर मास्को की ओर रवाना होना था और उन्होंने जीत जाना था क्योंकि उन्हें रोकने के लिए कोई सैना नहीं थी। सचमुच जर्मनों ने लगभग यही किया और उन्होंने चार दिनों में 100 मील भीतर तक मार्च कर दिया और मास्को पर कब्ज़ा कर लेने के नज़दीक पहुँच गए। आख़िरकार 3 मार्च, 1918 को पहले से भी अधिक अपमानजनक संधि करके उन्हें रोका गया, नहीं तो सोवियत रूस को बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती थी। इसके बाद त्रॉत्सकी को विदेशी मामलों से सम्बन्धित कमिसार के तौर पर इस्तीफा देना पड़ा।

ब्रेस्त-लितोवस्क संधि शान्ति-वार्ता के दौरान भी स्तालिन की भूमिका क्रान्ति के लिए अहम थी, लेनिन का डटकर साथ देने वाले वह और स्वेर्दलोव थे। लेकिन अभी भी त्रॉत्सकीवादी और बुर्जुआ मीडिया यह कहते हुए नहीं थकते कि स्तालिन क्रान्ति की दूसरी-तीसरी क़तार के नेता थे!!

क्रान्ति के बाद जब गृहयुद्ध में अक्सर युद्ध जनकमिसार होने के कारण लाल सेना खड़ी करने और गृहयुद्ध में जीत हासिल करने में त्रॉत्सकी की ही भूमिका बताई जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि त्रॉत्सकी की इस दौरान अहम भूमिका रही है, लेकिन इसका मतलब बिल्कुल भी यह नहीं है कि स्तालिन की गृहयुद्ध में कोई भूमिका ही नहीं थी, या त्रॉत्सकी ही एकमात्र “जनरल” था। बल्कि मामला कुछ उल्टा था, स्तालिन को गृहयुद्ध में हर अहम मोर्चे पर भेजा गया और लाल सेना ने उनके नेतृत्व में हर मोर्चे पर जीत हासिल की, यह मोर्चा चाहे दक्षिण रूस का हो, जारतीसिन का हो या पूर्व में पेरम, या फिर यूक्रेन या फिर मास्को का हो। अकेले स्तालिन ही नहीं, वोरोशिलोव व अन्य कितने ही कम्युनिस्ट थे जिन्होंने लाल सेना की जीत में अहम योगदान दिया। हम सिर्फ़ एक उदाहरण देंगे – लाल सेना जब अधिकतर मोर्चों पर हार रही थी और सोवियत गणराज्य के लिए अनाज की पूर्ति बनाए रखना ज़िन्दगी-मौत का प्रश्न बन गया था तो ऐसे समय में स्तालिन को वोल्गा किनारे बसे शहर जारतीसिन के मोर्चे पर केन्द्रीय कमेटी के विशेष निर्देशों के तहत भेजा गया। स्तालिन ने न सिर्फ़ अनाज की पूर्ति बहाल करवाई, बल्कि लाल सेना को विजय के रास्ते पर आगे बढ़या। भले ही त्रॉत्सकीपंथी इस सच्चाई को नकारते हैं, लेकिन उस समय केन्द्रीय कमेटी में लेनिन और स्तालिन में हुई वार्तालाप, सन्देश और निर्देश इस बात की स्पष्ट गवाही देते हैं। वास्तव में अगर 1918–20 के दौर का स्तालिन का लेखन देखा जाए तो यह विभिन्न मोर्चों पर तारों, रिपोर्टों, सन्देशों के साथ भरा पड़ा है।

जब दक्षिण रूस में लाल सेना बुरी तरह मार खा रही थी और पूरा मोर्चा बिखरा पड़ा था तो 29 मई, 1918 को जनकमिसार की काउंसिल ने स्तालिन को दक्षिण रूस में खाद्य मसलों का जनरल डायरेक्टर बनाकर भेजा।

स्तालिन “साज़िश करके पार्टी के महासचिव बने!”

यह इल्जाम-तराशी सबसे पहले ख़ुद त्रॉत्सकी और फिर त्रॉत्सकीपंथियों ने शुरू की और उसके बाद बुर्जुआ मीडिया ने त्रॉत्सकीपंथियों के इस कुत्साप्रचार को पूरे पृथ्वी-ग्रह पर प्रचारित करने में कोई क़सर बाक़ी न छोड़ी। भगोड़े और संशोधनवादी अपने कुत्साप्रचार के ज़रिए कैसे बुर्जुआजी की मदद करते हैं, यह उसका एक अच्छा उदाहरण है। इसके बारे में सितम्बर, 1919 को काउत्स्की के बारे में लेनिन का लेख “भगोड़ों को बुर्जुआजी कैसे इस्तेमाल करती है” विशेष तौर पर पढ़ने योग्य है। क्या स्तालिन सचमुच ही साज़िश करके पार्टी के महासचिव बने जैसा कि त्रॉत्सकीपंथी कहते हैं? इस झूठ को नंगा करने के लिए केवल तथ्य देने की ज़रूरत है। स्तालिन महासचिव कब बनते हैं? 23 अप्रैल, 1922 को, और स्तालिन को महासचिव बनाने का सुझाव किसने रखा था, ख़ुद लेनिन ने।4 इस तारीख़ के बाद लेनिन ने जो ख़त स्तालिन को लिखे हैं, उनमें अक्सर वह “प्रति, स्तालिन महासचिव, केन्द्रीय कमेटी” लिखते हैं। इसका मतलब साफ़ है कि लेनिन को अच्छी तरह पता था कि स्तालिन किस पद पर काम कर रहे हैं!

अक्सर त्रॉत्सकीपंथी कहते हैं कि स्तालिन दोयम दर्जे का नेता था, मुख्य नेता तो लेनिन व त्रॉत्सकी थे। क्या ऐसा था? तथ्य यहाँ पर भी कोई रहम नहीं दिखाते। जैसाकि हमने पहले भी ज़िक्र किया है, स्तालिन ने जुलाई, 1917 की पार्टी कांग्रेस में केन्द्रीय कमेटी की रिपोर्ट पेश की थी, क्योंकि लेनिन उस समय भूमिगत थे। स्तालिन 1922 में पार्टी के एकमात्र व्यक्ति थे जो पोलित ब्यूरो, सांगठनिक ब्यूरो और पार्टी सचिवालय – सभी के सदस्य थे। मार्च–अप्रैल, 1922 की ग्यारहवीं पार्टी कांग्रेस के समय स्तालिन को राष्ट्रीयताओं के मामलों के जनकमिसार के साथ-साथ मज़दूर और किसान जाँच-पड़ताल महक़मे का कमिसार भी नियुक्त करने का फ़ैसला हुआ तो प्रीओब्राजेंस्की ने एतराज उठाया, जिसका जवाब लेनिन ने दिया:

“हमें एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसके पास किसी भी राष्ट्र का व्यक्ति बेझिझक जा सके और अपनी पूरी बात कह सके … मुझे नहीं लगता कि कामरेड प्रीओब्राजेंस्की इस काम के लिए कामरेड स्तालिन से अधिक योग्य व्यक्ति प्रस्तावित कर सकते हैं। ऐसा ही मज़दूर और किसान जाँच-पड़ताल के सम्बन्ध में है। यह एक विशाल काम है, पड़तालों के काम को सँभालने के लिए एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसकी साधारण जनता में प्रतिष्ठा हो, नहीं तो हम छोटी-छोटी साजिशों में डूब जाएँगे और वह हम पर भारी पड़ेंगी।”5

इस तरह स्पष्ट है कि इस कुत्साप्रचार में ज़रा भी सच्चाई नहीं है, और अगर सच्चाई है तो लेनिन ख़ुद इस साजिश में शामिल थे!!

“लेनिन की वसीयत”

सबसे पहले हम लेनिन की वसीयत के बारे में कुछ तथ्यों को देखते हैं, क्योंकि तथ्य ही वे चीज़ हैं जिनसें त्रॉत्सकी व त्रॉत्सकीपंथी और बुर्जुआ प्रचारक भागना चाहते हैं। “लेनिन की वसीयत” नाम मैक्स ईस्टमैन ने गढ़ा था, जिसने अपनी किताब “सिन्स लेनिन डाइड” (1925) में ये शब्द इस्तेमाल किए और लिखा कि लेनिन के लिखे अन्तिम दस्तावेज़ जिनमें राष्ट्रीय प्रश्न पर नोट्स, लेनिन की “वसीयत” और अन्य दस्तावेज़ हैं, साधारण जनता और पार्टी सदस्यों से छिपाए गए हैं। त्रॉत्सकी ने उस समय इन इल्जामों का जवाब दिया:

“अपनी किताब में कई जगहों पर ईस्टमैन कहता है कि लेनिन के अपने अन्तिम दिनों के बहुत ही अहम दस्तावेज़ केन्द्रीय कमेटी ने पार्टी से छिपाए हैं … इसे हमारी पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के ख़िलाफ़ कुत्साप्रचार के बिना कोई नाम नहीं दिया जा सकता। ईस्टमैन के लिखने से लगता है कि वलादीमीर इलिच (लेनिन – लेखक) इन दस्तावेजों को छपवाना चाहते थे … तथ्य यह है कि यह बुनियादी तौर पर झूठ है … इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि ये पत्र और सुझाव पार्टी की 12वीं और 13वीं कांग्रेस के अवसर पर डेलीगेटों के ध्यान में लाए गए थे … अगर ये छापे नहीं गए तो इसका कारण यह था कि इनके लेखक ने छपवाने के लिए नहीं लिखे थे। व्लादीमीर इलिच ने कोई “वसीयत” नहीं लिखी, और पार्टी के प्रति उनके नज़रिए का चरित्र, साथ ही पार्टी का ख़ुद का चरित्र ही ऐसी किसी वसीयत की सम्भावना को रद्द करता है। बाहर शरण लेकर बैठे लोगों, विदेशी बुर्जुआजी और मेंशेविक प्रेस द्वारा जिसे “वसीयत” कहा जाता है (मानने लायक होने से बाहरी हद तक तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है), वह असल में लेनिन का ख़त है जिसमें सांगठनिक मसलों पर सुझाव हैं। 13वीं कांग्रेस ने ख़त पर नजदीक से नज़रसानी की, जैसा कि बाक़ियों को भी देखा गया, और समय के हालातों और परिस्थितियों के मुताबिक़ नतीजे निकाले। “वसीयत” के छिपाने या उलंघन करने का सारा शोर-शराबा एक बदनीयत आविष्कार है और व्लादीमीर इलिच की वास्तविक इच्छाओं और उनके द्वारा खड़ी की गई पार्टी के हितों के ख़िलाफ़ साधा हुआ है।”6

यही त्रॉत्सकी, जो वसीयत को “एक बदनीयत आविष्कार”, “कुत्साप्रचार”, “बुनियादी तौर पर झूठ”, “व्लादीमीर इलिच की वास्तविक इच्छाओं और उनके द्वारा खड़ी की गई पार्टी के हितों के पूरी तरह ख़िलाफ़ साधा हुआ” कह रहा था, 1934 में ख़ुद ही वही सब कुछ कर रहा था, जिसके लिए उसने कभी ईस्टमैन, प्रवासियों, बुर्जुआ प्रेस और मेंशेविकों की निन्दा की थी। लेकिन इसे समझना कोई मुश्किल नहीं है। 1925 में ईस्टमैन, प्रवासियों, बुर्जुआ प्रेस और मेंशेविकों के पास बोल्शेविक पार्टी के ख़िलाफ़ कहने के लिए कुछ नहीं था, सिवाए “एक बदनियत आविष्कार”, “कुत्साप्रचार”, “बुनियादी तौर पर झूठ” के; यही परिस्थिति 1930 के दशक में पार्टी और स्तालिन के ख़िलाफ़ अपने ज़िहाद में त्रॉत्सकी की थी। एक और हैरान होने वाली बात यह है कि जिस दस्तावेज़ को त्रॉत्सकी “मानने लायक होने से बाहरी हद तक तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया” कह रहा था, उसे ही वह एक सही दस्तावेज़ मान रहा था! ईस्टमैन और त्रॉत्सकी के गढ़े शब्द “वसीयत” को 20वीं कांग्रेस के अपने “इतिहासिक” भाषण के लिए ख्रुश्चेव ने उधार ले लिया।

अब देखते हैं कि इस “वसीयत” में क्या लिखा है? (यहाँ हम उस पूरे हिस्से का हवाला दे रहे हैं जो सबसे अधिक ज़िक्र में आता है):

“मैं स्थिरता (यानी केन्द्रीय कमेटी में स्थिरता – लेखक) को नज़दीक भविष्य में फूट से रोकने की गारण्टी के तौर पर देखता हूँ, और मैं व्यक्तिगत गुणों के बारे में विचार रखना चाहता हूँ।

मेरे विचारानुसार इस नज़रिये से स्थिरता के प्रश्न से जुड़े महत्वपूर्ण कारक केन्द्रीय कमेटी के सदस्य स्तालिन एवं त्रॉत्सकी हैं। मेरे विचार में उनके बीच के सम्बन्ध फूट के ख़तरे का बड़ा हिस्सा हैं, जिससे कि बचा जा सकता है, और यह मक़सद, मेरी राय में, अन्य बातों के अलावा, केन्द्रीय कमेटी के सदस्यों की संख्या 50 से बढ़ाकर 100 कर देने से पूरा हो सकता है।

कामरेड स्तालिन के हाथों में, महासचिव बन जाने के कारण, असीम ताक़त आ गई है, और मुझे इस बात का पक्का यक़ीन नहीं है कि वह हर समय इस ताक़त को र्प्याप्त सावधानी से इस्तेमाल कर सकेंगे। कामरेड त्रॉत्सकी, दूसरी तरफ़, सिर्फ़ असाधारण योग्यता ही नहीं रखते, जैसा कि संचार के जनकमिसारियत के प्रश्न पर उनके केन्द्रीय कमेटी के ख़िलाफ़ संघर्ष ने पहले ही सिद्ध कर दिया है। वह व्यक्तिगत रूप में केन्द्रीय कमेटी के शायद सबसे योग्य व्यक्ति हैं, लेकिन उन्होंने ख़ुद को ज़रूरत से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर देखने और काम के शुद्ध प्रशासकीय पक्ष पर ज़रूरत से अधिक ज़ोर देने की अभिव्यक्ति की है।

मौजूदा केन्द्रीय कमेटी के दो उत्कृष्ट नेताओं के यह गुण अनचाहे में ही फूट की तरफ़ ले जा सकते हैं, और अगर पार्टी इसे रोकने के लिए क़दम नहीं उठाती, तो फूट अचानक ही आ सकती है।

… मैं याद कर सकता हूँ कि जिनोवियेव और कामेनेव के साथ जुड़ी अक्टूबर की घटना, बिना शक, कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, परन्तु इसके लिए उन पर उतना ही व्यक्तिगत इल्जाम लगाया जा सकता है, जितना कि अ-बोल्शेविकवाद का त्रॉत्सकी पर।

केन्द्रीय कमेटी के नौजवान सदस्यों में, मैं बुखारिन और प्याताकोव के बारे में कुछ शब्द कहना चाहूँगा। वह, मेरी राय में, सबसे योग्य (नये में से) व्यक्ति हैं, और उनके बारे में यह बात दिमाग में होनी लाज़िमी है: बुखारिन न सिर्फ़ पार्टी के सबसे क़ीमती और बड़े सिद्धान्तकार हैं; वह सही ही पार्टी में लोकप्रिय हैं, परन्तु उनके सैद्धान्तिक नज़रिए को बहुत मुश्किल से ही सच्चे मार्क्सवादी के तौर पर लिया जा सकता है, क्योंकि उसमें कुछ अकादमिक जैसा है (उन्होंने कभी द्वन्द्ववाद का अध्ययन नहीं किया, और, मेरे विचार में वह इसे पूरी तरह से समझते भी नहीं हैं)।

दिसम्बर 25: जहाँ तक प्याताकोव का प्रश्न है, बिना शक वह मज़बूत इच्छा और असाधारण योग्यता रखते हैं, लेकिन जहाँ गम्भीर राजनीतिक मसले के तौर पर काम लिया जाना चाहिए, वहाँ भी वह प्रशासन और काम के प्रशासकीय पक्ष पर ज़ोर देते हैं।

ये दोनों टिप्पणियाँ, बिना शक, सिर्फ़ मौजूदा स्थिति के लिए ही हैं, यह मानते हुए कि दोनों अग्रणी और प्रतिबद्ध पार्टी कार्यकर्ता हैं जिन्हें अपना ज्ञान बढ़ाने और अपना एकांगीपन ठीक करने के लिए अवसर प्राप्त नहीं हुआ।

लेनिन

25 दिसम्बर, 1922”7

इस पूरे हवाले से स्पष्ट है कि लेनिन ने सिर्फ़ स्तालिन में कमियाँ देखीं यह पूरी तरह गलत है, और तो और स्तालिन का लेनिन सबसे पहले ज़िक्र करते हैं जबकि त्रॉत्सकीपंथियों का कहना है कि स्तालिन साधारण दूसरी-तीसरी कतार का नेता था। बुर्जुआ मीडिया और भाड़े के टट्टू बाक़ी हिस्से को गोल करें यह तो समझ में आता है, लेकिन त्रॉत्सकी ऐसा क्यों करता है, वह तो ख़ुद को मार्क्सवादी-लेनिनवादी कहलाता है। यहाँ यह भी हैरानी की बात है कि बुर्जुआ प्रचार मशीनरी “बोल्शेविक क्रान्ति” के “पितामाह” त्रॉत्सकी के बारे में लेनिन का मूल्यांकन बिल्कुल पेश नहीं करती और उस पर कोई दोष नहीं लगाती जबकि “पितामाह” होने के कारण वह तो सबसे बड़ा निशाना होना चाहिए। बुर्जुआ मीडिया “दोयम दर्जे के नेता” स्तालिन को ही निशाना बनाता है। स्पष्ट है, बुर्जुआजी को पता है कि दुश्मन कौन है, मित्र कौन!! यहाँ एक बार फिर लेनिन का लेख “भगोड़ों को बुर्जुआजी कैसे इस्तेमाल करती है” याद आता है।

एक और बात, लेनिन ख़ुद यह लिखते हैं कि “ये दोनों टिप्पणियाँ, बिना शक, सिर्फ़ मौजूदा स्थिति के लिए ही हैं, यह मानते हुए कि दोनों अग्रणी और प्रतिबद्ध पार्टी कार्यकर्ता हैं जिन्हें अपना ज्ञान बढ़ाने और अपना एकांगीपन ठीक करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ”, परन्तु कुत्साप्रचारक इस मूल्यांकन को पत्थर पर लकीर बना रहे हैं। कुत्साप्रचारकों का यह एक अजीब तर्क है कि लेनिन ने स्तालिन के बारे में जो एक बार लिख दिया (और यह भी सच है कि लेनिन ने अपने जीवन काल में स्तालिन के बारे में नकारात्मक टिप्पणी सिर्फ़ यही एक बार ही की है), वह मिटने योग्य नहीं है, वह अन्तिम सच है और लेनिन द्वारा स्तालिन का अन्तिम मूल्यांकन है; हैरानी की बात यह है कि वह यही तर्कशास्त्र त्रॉत्सकी और अन्य बोल्शेविक नेताओं के बारे में बात करते हुए बिल्कुल ही भूल जाते हैं। लेनिन ने त्रॉत्सकी के बारे में क्या लिखा, (हो सकता है किसी को एतराज़ हो लेकिन लेनिन ने त्रॉत्सकी के लिए बदमाश, धोखेबाज़, नक़ाबपोश जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए हैं)8 और वसीयत में त्रॉत्सकी के बारे में जो लिखा वह अलग है और विदेशी व्यापार पर एकाधिकार के मसले पर त्रॉत्सकी की अवस्थिति के बारे में अपनी राय लिखते समय लेनिन ने त्रॉत्सकी के बारे में जो लिखा, वह इससे भी अलग है।

ऊपर आए उद्धरण के नीचे, लेनिन की ओर से 4 जनवरी, 1923 को एक और पैरा जोड़ा गया:

“स्तालिन ज़्यादा ही रुखे हैं और यह अवगुण, चाहे हमारे बीच, हमारे कम्युनिस्टों के बीच व्यवहार के लिए तो पूरी तरह सहनीय है, एक महासचिव में असहनीय हो जाता है। इसलिए कामरेडों को स्तालिन को इस पद से हटाने और उनकी जगह पर कोई अन्य व्यक्ति नियुक्त करने का कोई तरीक़ा ढूँढने का सुझाव देता हूँ, जो कामरेड स्तालिन से सिर्फ़ इस मामले में भिन्न हो कि वह अधिक सहनशील, अधिक वफादार, अधिक विनम्र, अधिक दूसरे कामरेडों की सुनने वाला, कम मनमौजी (capricious) आदि हो …”

लेनिन के इस ख़त को त्रॉत्सकी “निश्चित ही, उनके लिखने का मक़सद मेरे लिए राह स्पष्ट करना था” 9 समझता है। लेनिन ने “वसीयत” में ही त्रॉत्सकी को नौकरशाह, ग़ैर-बोल्शेविकवाद का शिकार, पार्टी से टकराव में रहने वाला और ख़ुद को बढ़ा-चढ़ाकर देखने वाला कहा है, फिर भी त्रॉत्सकी समझता है कि स्तालिन के अन्य गुणों के अलावा, वह स्तालिन से अधिक सहनशील, अधिक वफादार, अधिक विनम्र, अधिक दूसरे कामरेडों की सुनने वाला, कम मनमौजी (capricious) आदि है। दूसरी बात, स्तालिन के प्रति लेनिन का रुख कुछ दिनों में ही सख़्त क्यों होता है। इसके पीछे शायद जार्जिया में हुई घटनाएँ और उन घटनाओं के सम्बन्ध में स्तालिन की भूमिका के बारे में लेनिन को हुई रिपोर्टिंग की बड़ी भूमिका है। इस मामले में स्तालिन को लेनिन के समक्ष अपना पक्ष रखने का कोई अवसर नहीं मिला क्योंकि 22–23 दिसम्बर, 1922 की रात को लेनिन को पड़े अधरंग के दूसरे दौरे के बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और उनके साथ कोई राजनीतिक बातचीत करने से डॉक्टरों ने पूरी तरह मनाही कर दी।

स्तालिन द्वारा पार्टी और सोवियत यूनियन का नेतृत्व सँभालते वक्त परिस्थितियाँ

स्तालिन अप्रैल, 1922 में पार्टी के महासचिव बनते हैं, लेकिन पार्टी का नेतृत्व अभी लेनिन ही कर रहे थे। मई, 1922 में लेनिन को अधरंग का पहला दौरा पड़ता है जिससे वह उबर तो जाते हैं लेकिन पहले की तरह पार्टी को नेतृत्व देने में सक्षम नहीं रहते। दिसम्बर, 1922 और फिर मार्च, 1923 में दो और अधरंग के दौरे पड़ने के बाद लेनिन शारीरिक तौर पर अक्षम हो जाते हैं और पार्टी का नेतृत्व स्तालिन के नेतृत्व वाले पोलित ब्यूरो व केन्द्रीय कमेटी के पास आ जाता है। वर्षों से सैद्धान्तिक और रोज़मर्रा के कामों में लेनिन के नेतृत्व में चलने वाली पार्टी बहुत जल्दी ही एक महान क्रान्तिकारी से वंचित हो जाती है; लेनिन के नेतृत्व के बिना पार्टी को सँभालना और चलाना उस समय एक बड़ी चुनौती थी।

अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर नज़र डाली जाए तो नवजात सोवियत यूनियन के लिए दुनियाभर में एक उम्मीद की किरण, एक समर्थक राज्यसत्ता भी नहीं थी; बल्कि जहाँ-जहाँ भी कम्युनिस्ट आन्दोलन उभरा था, वह पहले मज़दूर राज्य से प्रेरणा और मदद की उम्मीद में था। समूचे यूरोप में क्रान्ति की लहर उतार पर थी। जर्मनी में क्रान्ति हार चुकी थी, क्रान्तिकारी पार्टी फिर से संगठित होने की कोशिश में थी और दूसरी तरफ़ पूँजी की दक्षिणपंथी प्रतिक्रान्तिकारी शक्तियाँ ज़ोर पकड़ रही थीं। इटली में फासीवादी पार्टी सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के करीब थी, जहाँ 1925 में मुसोलिनी बाकायदा सत्ता पर क़ब्ज़ा करने में कामयाब हो गया था। पोलैंड में दक्षिणपंथी प्रतिक्रान्तिकारी हुकूमत सत्ता में आ रही थी। पूरे यूरोप में कम्युनिस्ट होना अपराध बन चुका था। कुछ बड़े देशों जैसे फ्रांस, इंगलैण्ड व इटली को छोड़कर अधिकतर देशों ने तो अभी बोल्शेविक सरकार को मान्यता भी नहीं दी थी। गृहयुद्ध और विदेशी दख़लअन्दाज़ी हालाँकि 1920–21 में हरा दी गई थी, लेकिन पूर्व में जापानी और अमेरिकी दख़लअन्दाज़ी 1922 तक चलती रही थी। किसान बग़ावतें और बोल्शेविक विरोधी गुटों द्वारा विद्रोह 1924 तक होते रहे थे। इस तरह चाहे मुख्यतः हमले या बग़ावत के ख़तरे से सोवियत यूनियन काफ़ी हद तक सुरक्षित था, लेकिन यह ख़तरा अभी पूरी तरह से टला नहीं था। पार्टी में फूट या मज़दूर-किसानों के संयुक्त मोर्चे में थोड़ी सी भी दरार इस ख़तरे को दुबारा से उभार सकती थी और समूचे देश के लिए नए गृहयुद्ध और हार का ख़तरा खड़ा कर सकती थी।

दूसरी तरफ़, पार्टी के सामने देश के आर्थिक निर्माण का काम खड़ा था और ऊपर से महत्वपूर्ण राजनीतिक-विचारधारात्मक प्रश्नों पर पार्टी के भीतर ज़बरदस्त मतभेद थे। 1917 की क्रान्ति तक भले ही लेनिन मार्क्सवाद की पारम्परिक समझ से आगे बढ़कर एक देश में समाजवाद का निर्माण सम्भव होने की समझ तक पहुँच चुके थे, लेकिन फिर भी पार्टी के भीतर आम तौर पर यही उम्मीद थी कि जर्मनी या जर्मनी के साथ-साथ कुछ अन्य यूरोपीय देशों में भी क्रान्ति हो जाएगी और समाजवाद के निर्माण के वक्त सोवियत यूनियन अकेला नहीं होगा। लेकिन घटनाओं का रुख स्पष्ट बता रहा था कि इस राह पर आगे बढ़ने के लिए सोवियत यूनियन का कोई साथी नहीं होगा। इस परिस्थिति में यह प्रश्न कि क्या एक देश में समाजवाद सम्भव है या नहीं, लेनिन की मौत से पहले पार्टी के भीतर पूरी तरह हल प्रश्न नहीं था। जब यही प्रश्न अभी पूरी तरह हल नहीं था, तो समाजवाद का निर्माण किस तरह से होगा, राह क्या होगी, उसमें मतभेद होने वाजिब ही थे और मतभेद बहुत तीखे थे। औद्योगिकीकरण, कृषि का विकास, किसान प्रश्न – सब अभी मतभेदों के बिन्दु थे। नई आर्थिक नीति कब तक जारी रहनी थी और इसकी जगह कौन सी नीति लेगी, यह प्रश्न अभी पूरी तरह से खुले प्रश्न थे।

दूसरी तरफ़, सोवियत यूनियन की आर्थिक परिस्थिति भले ही नई आर्थिक नीति के आने से कुछ-कुछ ठीक होने लगी थी, लेकिन अभी भी उत्पादन का स्तर पहले विश्वयुद्ध से पहले के स्तर से नीचे ही था। भुखमरी हालाँकि क़ाबू में कर ली गई थी, लेकिन विशाल किसान जनता अभी भी ग़रीबी, लूट-खसोट की पुरानी परिस्थितियों में ही थी और उनकी ज़िन्दगी में क्रान्ति आने से बहुत थोड़ा बदलाव आया था। 1923 के वर्ष में एक बार फिर कृषि उत्पादन कम हो जाने के कारण आर्थिक संकट ने सोवियत यूनियन को घेर लिया था और क़ीमतें तेज़ी से बढ़ रही थीं। अक्टूबर, 1925 में आकर इस रुझान में ठहराव आया और फसल अच्छी होने के कारण आम परिस्थिति थोड़ी सुधरी। नई आर्थिक नीति ने जहाँ उत्पादन को कुछ हद तक पैरों पर खड़ा किया था, वहाँ उसने ग्रामीण क्षेत्रों में एक नया वर्ग, कुलक किसानों का वर्ग पैदा कर दिया था, जो किस हद तक समाजवाद विरोधी था, यह पूरी तरह उस समय जाकर सामने आता है जब कृषि का सामूहिकीकरण शुरू होता है। व्यापार में एक नई क़िस्म के धनिक ‘नेपमैन’ पैदा हो रहे थे और उद्योग भी समूचे रूप में मज़दूर वर्ग के क़ब्ज़े में नहीं था।

तबाही सिर्फ़ मशीनरी, कारख़ानों और कृषि के साधनों की ही नहीं हुई थी, मानवीय साधनों की बहुत बड़ी तबाही भी व्यापक तबाही का एक हिस्सा थी। 1917 में सोवियत गणराज्य में तीस लाख से थोड़ा कम कारख़ाना मज़दूर थे जिनमें से आठ लाख गृहयुद्ध में लड़े और एक लाख अस्सी हज़ार तो युद्ध में ही मारे गए, बहुत बड़ी संख्या अपंग हो गई। कारख़ाना मज़दूरों का 10–15 प्रतिशत हिस्सा भुखमरी और बीमारियों के कारण मारा गया। इसके नतीजे के तौर पर, 1920 तक कारख़ाना मज़दूर वर्ग में सत्रह लाख मज़दूर बचे थे।10 कारख़ानों की तबाही इतनी व्यापक थी कि अक्टूबर, 1921 में लेनिन को यह लिखना पड़ा, “सर्वहारा वर्ग के रूप में बिखर गया है, यानी अपने वर्गीय आधार से उखड़ गया है, और सर्वहारा के रूप में अपना अस्तित्व खो चुका है … क्योंकि बड़े पैमाने के पूँजीवादी उद्योग का विनाश हो चुका है, क्योंकि कारख़ाने ठप्प पड़े हैं, इसलिए सर्वहारा अदृश्य हो गया है। आँकड़ों में चाहे कभी-कभार इसे अन्कित किया जाता है, परन्तु आर्थिक रूप में एकजुट नहीं रह गया है।” 11 कृषि क्षेत्र की तबाही का मंजर इससे भिन्न नहीं था।

स्तालिन के समक्ष एक तरफ़ पार्टी के भीतर राजनीतिक मतभेदों को सुलझाते हुए ठोस नीति अपनाने और आर्थिक निर्माण का बड़ा कार्यभार था, लेकिन साथ ही पार्टी को एकजुट बनाए रखने और समूची जनता का समाजवाद के सपने में भरोसा बनाए रखने और युद्धों की थकाई जनता के भीतर देश के निर्माण की सृजनात्मक शक्ति जगाने का कार्यभार था। इसके साथ ही अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन को भौतिक मदद के साथ-साथ विचारधारात्मक नेतृत्व और प्रेरणा देने का कार्यभार था। और यह सब कार्यभार उस समय पूरे करने थे जब समूची दुनिया ने सोवियत यूनियन का बहिष्कार किया हुआ था। विदेशी सहायता मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। पहले विश्वयुद्ध में हारे और तबाह हुए देशों जैसे ऑस्ट्रिया, जर्मनी को पूँजीवादी जगत से पुनर्निर्माण के लिए क़र्ज़ मिल सकते थे और मिल भी रहे थे, लेकिन सोवियत यूनियन के सामने ऐसी कोई सम्भावना नहीं थी। 1922–23 में जनेवा और लन्दन में लम्बे समय के लिए क़र्ज़ लेने की कोशिश की गई, लेकिन कुछ ख़ास हासिल नहीं हुआ।12 विदेशी उद्यमों को “रियायतें” देकर कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने की कोशिश की गई, लेकिन कुछ ख़ास फायदा न हुआ; पहले वर्ष के दौरान 1 करोड़ रूबल का विदेशी निवेश हुआ।12 कोई सहायता राशी भी नहीं मिल रही थी; 1921–22 में जब अकाल की स्थिति थी, उस समय भी अकाल-पीड़ितों को राहत देने के लिए मुश्किल से 2 करोड़ की सहायता राशी जमा हुई।12 इन तरीक़ों से जो पूँजी इकट्ठा हुई, वह अकेले परिवहन के ढाँचे को फिर से काम लायक बनाने के भी लिए काफ़ी नहीं थी। विदेशों से चीज़ें आयात करने के लिए सोने के भण्डारों को भी दाँव पर लगाया गया, लेकिन कुछ समय के बाद यह भी ख़त्म होने लगे।12 इस तरह पुनर्निर्माण के काम और उसके बाद औद्योगिकीकरण से कृषि का विकास सोवियत यूनियन को अपने दम पर करना पड़ना था। इन अन्तरराष्ट्रीय और घरेलू परिस्थितियों में स्तालिन ने पार्टी का नेतृत्व सँभाला।

अब हम “एक देश में समाजवाद का निर्माण” के मुद्दे पर आगे बढ़ते हैं, जो स्तालिन के समय हल तो हो गया लेकिन सिर्फ़ कई बोल्शेविक नेताओं के तीखे विरोध और फिर पार्टी से बाहर निकाल देने के बाद ही।

एक देश में समाजवाद

अक्सर यह कहा जाता है कि “एक देश में समाजवाद” सम्भव होने की बात स्तालिन की गढ़ी हुई थी। लेकिन वास्तव में लेनिन ने पूँजीवाद के भीतर असमान विकास का सिद्धान्त विकसित करते हुए यह दिखाया कि न सिर्फ़ समाजवादी क्रान्ति ही एक देश में सम्भव है, बल्कि अकेले देश में ही समाजवादी निर्माण की तरफ़ बढ़ा भी जा सकता है:

असमान आर्थिक व राजनीतिक विकास पूँजीवाद का अटल नियम है। इसलिए पहले कुछ देशों या एक पूँजीवादी देश में भी समाजवाद की जीत सम्भव है। उस देश का विजयी सर्वहारा पूँजीपतियों को ख़त्म कर देने और समाजवाद का निर्माण कर लेने के बाद बाक़ी दुनिया, पूँजीवादी दुनिया के ख़िलाफ़ डट जाएगा, जिसके दौरान वह दूसरे देशों के उत्पीड़ित वर्गों को अपने उद्देश्य के साथ जोड़ लेगा, उन देशों में भी पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ बग़ावतें खड़ी करेगा और ज़रूरत पड़ने पर लुटेरे वर्गों और उनकी राज्यसत्ताओं के विरुद्ध हथियारबन्द सेना का भी इस्तेमाल करेगा।13

लेकिन लेनिन की इस अवस्थिति का उस समय भी त्रॉत्सकी ने विरोध किया था और गृहयुद्ध के ख़त्म होने के बाद जब समाजवाद के निर्माण का प्रश्न व्यावहारिक रूप में सामने आ गया तो वह एक बार फिर विरोध करने लगा था। संयुक्त राज्य यूरोप के नारे के पक्ष में 1915 में लिखे अपने लेख में वह कहता है – “राष्ट्रीय हदों के भीतर समाजवादी क्रान्ति की सम्भावनाओं को मानना उसी राष्ट्रीय संकीर्णता का शिकार होना होगा जो कि सामाजिक-देशभक्ति का सारतत्व है।”14 1924 की बहस के दौरान वह पहला तर्क तो यह गढ़ता है कि लेनिन ने एक देश में समाजवाद की बात ऐसे ही चलते-चलते कह दी थी।15 लेकिन यह तर्क चल नहीं सकता था, इसलिए उसे नया तर्क गढ़ना पड़ा कि लेनिन ने समाजवादी निर्माण की नहीं बल्कि सर्वहारा के क़ब्ज़े में आ चुके कारख़ानों में उत्पादन शुरू करने की बात की थी।16 इसके साथ ही त्रॉत्सकी के नेतृत्व वाले “वाम” धड़े का यह तर्क था कि क्योंकि यूरोपीय देशों में क्रान्ति और विजयी मज़दूर सत्ता के बिना रूस में समाजवाद का निर्माण सम्भव नहीं है, इसलिए सोवियत यूनियन को कुछ आर्थिक सुधार करने से आगे नहीं बढ़ना चाहिए। लेनिन के न होने पर यह प्रश्न पार्टी के लिए कितना पेचिदा था, इसका पता यहाँ से चलता है कि 1924 के शुरू तक स्तालिन भी इस प्रश्न पर पूरी तरह स्पष्ट दिखाई नहीं देते:

“समाजवाद का मुख्य कार्यभार – समाजवादी उत्पादन को संगठित करना – अभी भी पूरा करना है। बहुत सारे विकसित देशों के सर्वहारा की कोशिशों के बिना क्या यह कार्यभार पूरा किया जा सकता है, क्या समाजवाद की अन्तिम जीत एक देश में सम्भव है। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। बुर्जुआजी का तख़्तापलट करने के लिए किसी एक देश में सर्वहारा के प्रयास काफ़ी हैं; यह हमारी क्रान्ति ने सिद्ध कर दिया है। समाजवाद की अन्तिम जीत के लिए, समाजवादी उत्पादन को संगठित करने के लिए किसी एक देश के प्रयास नाकाफ़ी हैं। ख़ासकर रूस जैसे कृषि आधारित देश के प्रयास। इसके लिए तो बहुत सारे विकसित देशों के सर्वहारा के प्रयासों की ज़रूरत है।”17

लेकिन इसके बाद उन्होंने इस मसले पर भिन्न पहुँच अपनाई और दिसम्बर 1924 तक वह इस मसले पर स्पष्ट नज़रिया अख़्तियार करते रहे और वह अपनी पुस्तिका ‘अक्टूबर क्रान्ति और रूसी कम्युनिस्टों के दाँव-पेंच’ में “समाजवाद की अन्तिम विजय” और “एक देश में समाजवाद का निर्माण सम्भव” होने को दो अलग-अलग मसलों के रूप में लेते रहे हैं, और एक देश में समाजवाद के निर्माण की सम्भावना को पूरी तरह सिद्ध करते हैं। इसके बाद अप्रैल, 1925 की 14वीं कॉन्फ्रेन्स व प्लेनम और फिर दिसम्बर, 1925 की पार्टी की 14वीं कांग्रेस में जिनोवियेव-कामेनेव के “नए विरोधी गुट” के तर्कों को खदेड़ते हुए (त्रॉत्सकीपंथियों का विरोध पार्टी कांग्रेस से पहले ही ख़त्म हो चुका था और त्रॉत्सकी इस एक साल के लिए चुप रहा) अपने इस नज़रिये के पक्ष में भारी बहुमत में पार्टी के भीतर हिमायत जुटाने में कामयाब रहते हैं। इसके साथ ही उद्योग के, ख़ासकर भारी उद्योग के विकास के लिए प्रस्ताव भी इसी कांग्रेस में पास किया गया। इस तरह स्तालिन ने “एक देश में समाजवाद” का सिद्धान्त मौलिक रूप में नहीं भी पेश किया था, लेकिन फिर भी इसके साथ स्तालिन का नाम जुड़ गया क्योंकि बोल्शेविक पार्टी के वही मुख्य नेता थे जिन्होंने लेनिन के इस थीसिस को अच्छी तरह समझा, विकसित किया और इसे व्यवहार के स्तर पर लागू किया और इसके साथ ही इसकी “वामपंथियों” और “दक्षिणपंथियों” के ख़िलाफ़ संघर्ष में पूरी दृढ़ता से रखवाली की और त्रॉत्सकीपंथियों, जिनोवियेव-कामेनेव गुट और बुखारिनपंथियों के विरोध को सिद्धान्त के स्तर पर भी और व्यवहार के स्तर पर भी हराया।

14वीं पार्टी कांग्रेस में जिनोवियेव-कामेनेव के ‘नए विरोधी गुट’ ने समाजवाद के निर्माण के लिए आगे बढ़ने के प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिये थे, लेकिन कांग्रेस के बाद उन्होंने फिर पहले वाली रट लगा ली। अब उनके साथ त्रॉत्सकी भी आ मिला और उनके गुट ने पार्टी अनुशासन का और कांग्रेस के आदेशों का खुलेआम उल्लघंन करना शुरू कर दिया। लेकिन स्तालिन के लिए अब यह मामला स्पष्ट था, उनका कहना था कि हमारे सामने तीन रास्ते हैं – पहला, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना और विश्व क्रान्ति का इन्तज़ार करना; दूसरा, कुछ समाजवादी क़दम उठाते हुए विश्व क्रान्ति का इन्तज़ार करना; और तीसरा, इस निश्चय के साथ कि एक देश में समाजवाद का निर्माण सम्भव है, समाजवाद के निर्माण में जुट जाना। स्तालिन ने लेनिनवादी नज़रिया अपनाते हुए साफ़ दिखाया कि तीसरा रास्ता ही सही अवस्थिति है और एक देश में समाजवाद के निर्माण से सम्बन्धित बहस को “साहित्यिक बहस” कहकर ख़ारिज कर दिया। जब सिद्धान्त के स्तर पर “एक देश में समाजवाद” के विरोधियों को हराने में स्तालिन कामयाब हो गए तो पार्टी ने समाजवाद के निर्माण का रास्ता पकड़ा और पहली पंचवर्षीय योजना बनाकर इस ऐतिहासिक काम में जुट गई। यहाँ आकर स्तालिन से जुड़ा दूसरा विवाद शुरू होता है जिसके केन्द्र में कृषि में सामूहिकीकरण का लागू होना है। यहाँ आकर ही समाजवादी निर्माण के “दक्षिणपंथी” विरोध की स्पष्ट अभिव्यक्ति शुरू हुई।

कृषि में सामूहिकीकरण और कुलक वर्ग का सफाया

1927 तक आकर उत्पादन का स्तर विश्व युद्ध के पहले के स्तर से थोड़ा ऊपर पहुँच चुका था और आर्थिक पुनर्निर्माण का काम कर लिया गया था। इस समय तक, रेलवे, बड़े कारख़ाने और तबाह हुए कारख़ाने राज्य के क़ब्ज़े में थे, लेकिन छोटा उद्योग निजी हाथों में था। थोक व्यापार राज्य के क़ब्ज़े में था, लेकिन परचून व्यापार में निजी हिस्सा अभी भी आधे से अधिक था। कृषि उत्पादन का सिर्फ़ छोटा सा हिस्सा समाजवादी था, बाक़ी निजी हाथों में था। निजी कृषि में कुलक एक बड़ी ताक़त बन चुके थे और अनाज की जमाखोरी करके राज्य को ब्लैकमेल करने की हद तक पहुँच चुके थे जिसका हम आगे ज़िक्र करेंगे। स्वास्थ्य, शिक्षा ख़ासकर तकनीकी क्षेत्र में बहुत पिछड़ी हुई स्थिति थी, हालाँकि हालत सुधर रही थी और इन क्षेत्रों में ज़ारशाही के मुक़ाबले कई गुणा ज़्यादा ख़र्च किया जा रहा था। दिसम्बर, 1927 की 15वीं पार्टी कांग्रेस में कृषि के सामूहिकीकरण और देश के औद्योगिकीकरण के लिए पहली पंचवर्षीय योजना तैयार और परवान की गई, लेकिन इसे व्यवहार में उतारना इतनी आसानी से नहीं हो सका था।

“1926–27 में पार्टी के ख़िलाफ़ संघर्ष में त्रॉत्सकी के साथ जिनोवियेव और कामेनेव मिल गए। उन्होंने मिलकर ‘यूनाइटेड ऑपोज़िशन’ कायम कर ली। इसने कुलक वर्ग के उभार का खण्डन किया, “नौकरशाही” की आलोचना की और पार्टी के भीतर गुटबन्दी की। जब ओसोव्स्की ने “विरोधी पार्टी” बनाने के हक़ का पक्ष लिया तो त्रात्स्की और जिनोवियेव ने उसको पोलित ब्यूरो से निकालने के ख़िलाफ़ वोट दिया। जिनोवियेव ने त्रॉत्सकी के सिद्धान्त ‘एक देश में समाजवाद का निर्माण असम्भव’ को अपना लिया जिसका दो वर्ष पहले तीखा विरोध कर रहा था।”18

“त्रॉत्सकी ने फ्रांसीसी क्रान्ति में दक्षिण जेकोबिनों द्वारा वामपंथी जेकोबिनों को सफाया करने के तर्ज़ पर ‘सोवियत थर्मीडोर’ का आविष्कार कर लिया।

“त्रॉत्सकी ने कहा कि पहले विश्वयुद्ध की शुरुआत के मौके पर जब जर्मन फौज पेरिस से 80 किलोमीटर दूर थी, तो बिना कोई रियायत दिए असरदायी रक्षा संगठित करने के लिए क्लेमेनस्यू ने पेनलेवी की कमज़ोर सरकार का तख़्तापलट कर दिया था। त्रॉत्सकी का अर्थ था कि अगर साम्राज्यवादी हमला होता है तो वह क्लेमेनस्यू की तरह तख़्तापलट को अन्जाम देगा।”19

इस तरह यह सरेआम साम्राज्यवादियों को हमला करने के लिए उकसाना था, लेकिन इसके बावजूद त्रॉत्सकी और जिनोवियेव-कामेनेव गुट की पार्टी के भीतर आम बहस करवाने की माँग मान ली गई। अक्टूबर, 1927 में पार्टी के भीतर समाजवाद के रास्ते पर आगे बढा़ जाए कि नहीं, पर बहस हुई और पार्टी सदस्यों को मतदान के लिए कहा गया। इस चुनाव में ‘यूनाइटेड ऑपोज़िशन’ को सिर्फ 6000 मत मिले, जबकि 14वीं कांग्रेस के फै़सलों के पक्ष में 7,25,000 मत पड़े।20 इसके बावजूद ‘यूनाइटेड ऑपोज़िशन’ ने अपना विरोध वापस नहीं लिया, नतीजतन नवम्बर, 1927 में त्रॉत्सकी, त्रॉत्सकीवादियों, जिनोवियेव, कामेनेव को पार्टी से निकाल दिया गया।

“लेकिन, जून, 1928 में जिनोवियेववादियों द्वारा ग़लती मान लेने पर जिनोवियेव, कामेनेव और एवोद्किमोव सहित बहुत सारे अन्य नेताओं को पार्टी में वापस ले लिया गया।”21

“प्रियोब्राजिंस्की और रादेक सहित बड़ी संख्या में त्रॉत्सकीवादियों को भी पार्टी में वापस ले लिया गया।”22

लेकिन त्रॉत्सकी ने अपना विरोध जारी रखा और पार्टी अवस्थितियों को मानने से पूरी तरह इंकार कर दिया। नतीजतन सोवियत यूनियन से देशनिकाला दे दिया गया। त्रॉत्सकी अपनी अवस्थिति पर डटा हुआ था, इसका पता उसके उस समय के लेखन से लग जाता है:

“… एक देश में समाजवाद का सिद्धान्त एक प्रतिक्रान्तिकारी सिद्धान्त है क्योंकि यह न सिर्फ़ उत्पादक शक्तियों के विकास के बुनियादी उसूल से मेल नहीं खाता है, बल्कि इस विकास के भौतिक नतीजों के भी विरुद्ध जाता है। उत्पादक शक्तियाँ राष्ट्रीय हदों के भीतर बँधकर नहीं रह सकतीं। इससे न सिर्फ़ विदेशी व्यापार, व्यक्तियों और पूँजी का आयात, क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा, बस्तीवादी नीति और पिछला साम्राज्यवादी युद्ध पैदा होते हैं, बल्कि एक आत्मनिर्भर समाजवादी समाज का अस्तित्व असम्भव होने का नतीजा भी निकलता है। पूँजीवादी देशों की उत्पादक शक्तियाँ बहुत समय पहले ही राष्ट्रीय हदें तोड़ चुकी हैं। लेकिन समाजवादी समाज का निर्माण सबसे विकसित पूँजीवादी उत्पादक शक्तियों पर ही किया जा सकता है … समाजवाद को सिर्फ़ पूँजीवाद से बहुत अधिक विकसित उत्पादक शाक्तियाँ लेनी होंगी, लेकिन तुरन्त ही उन्हें और ऊँचे विकास की ओर ले जाना होगा और एक ऐसे स्तर पर पहुँचा देना होगा जो पूँजीवाद के अन्तर्गत असम्भव है। प्रश्न खड़ा होता है कि समाजवाद उत्पादक शक्तियों को दुबारा एक देश में कैसे क़ैद कर सकता है जो कि पूँजीवाद के दौरान राष्ट्रीय हदों को ज़ोर से तोड़कर आगे निकल गई थीं? या फिर हमें “बेलगाम” उत्पादक शक्तियों के विचार को छोड़ देना चाहिए जिनके लिए राष्ट्रीय हदें और इसके लिए एक देश में समाजवाद का सिद्धान्त बहुत तंग है और हमें ख़ुद को, रोक कर रखी और घरेलू बना ली गईं उत्पादक शक्तियों तक सीमित कर लेना चाहिए यानी कि आर्थिक पिछड़ेपन की तकनीक तक…

“इस तरह की (पिछड़ी हुईं – अनु.) उत्पादक शक्तियों के विरासत में मिलने के कारण रूसी सर्वहारा आयात व निर्यात के लिए मजबूर है।”23

और 1929 में,

“बिल्कुल यहाँ आकर दो पूरी तरह भिन्न अवस्थितियाँ हमारे सामने आती हैं: स्थाई क्रान्ति का अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी सिद्धान्त और दूसरा एक देश में समाजवाद का राष्ट्रीय-सुधारवादी सिद्धान्त। न सिर्फ़ पिछड़ा चीन ही, बल्कि आम तौर पर कोई भी देश अपनी राष्ट्रीय हदों में रहकर समाजवाद का निर्माण नहीं कर सकता: बहुत अधिक विकसित उत्पादक शक्तियाँ, जो राष्ट्रीय हदों के भीतर नहीं रहतीं, ऐसा नहीं होने देतीं, और वे शक्तियाँ जो राष्ट्रीयकरण करने लायक स्तर तक विकसित नहीं हुईं भी ऐसा नहीं होने देतीं। … दोनों ही मामलों में इन अन्तरविरोधों को हल कर पाना अन्तरराष्ट्रीय क्रान्ति के जरिए ही सम्भव है। यह अवस्थिति चीन की समाजवादी तब्दीली के लिए “पक्के” होने या न होने के प्रश्न के लिए कोई स्कोप ही नहीं छोड़ती।”24

“मार्क्सवाद अपना शुरुआती बिन्दु विश्व अर्थव्यवस्था को बनाता है, जो कि राष्ट्रीय हिस्सों का कुल-जोड़ नहीं होता बल्कि एक विशाल और आाज़ाद यथार्थ है जो श्रम के अन्तरराष्ट्रीय विभाजन और विश्व बाज़ार द्वारा तय किया जाता है, और जिसने हमारे समय में राष्ट्रीय बाज़ारों पर पूरी तरह दबदबा कायम कर रखा है।”25

कृषि का विकास सोवियत यूनियन के विशाल क्षेत्र से अनाज की कमी को पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए भी लाज़िमी था जिसने बदले में औद्योगिकीकरण को भी तेज़ी और मज़बूती देनी थी। उसी समय रूसी तकनीक बहुत पिछड़ी हुई थी और कृषि या तो छोटे फार्मों में बँटी हुई थी या फिर धनी किसानों के पास थी। इसे ध्यान में रखते हुए स्तालिन ने कहा कि पूँजीवादी देशों में औद्योगिकीकरण, मुख्य तौर पर, दूसरे देशों, उपनिवेशों या हारे हुए देशों की लूट करके या फिर बड़े और अधिक या कम गुलाम बनाने वाले क़र्ज़ों की मदद से आगे बढ़या जाता है, लेकिन सोवियत यूनियन के लिए ये दोनों रास्ते बन्द हैं। ऐसे में सोवियत यूनियन का मुख्य सहारा मज़दूरों और किसानों की ताक़त थी। सोवियत यूनियन के हालात इस तरह के थे कि उद्योग में निवेश के लिए शुरुआती पूँजी निवेश कृषि में से ही आ सकता था, किसानी पर कुछ समय के लिए अधिक बोझ आना ही था। इस मुश्किल से स्तालिन परिचित थे:

“पूँजीवादी देशों में औद्योगिकीकरण, मुख्य रूप में, दूसरे देशों, उपनिवेशों या हारे हुए देशों की लूट करके, या फिर बड़े और अधिक या कम गुलाम बनाने वाले क़र्ज़ों की मदद से आगे बढ़या जाता है।

आप जानते हैं कि सैकड़ों वर्षों के लिए ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों और विश्व के सभी हिस्सों से पूँजी इकट्ठा की और इस तरह अपने उद्योग में अधिक निवेश करने के क़ाबिल हुआ। यह इतेफाकन इसकी भी व्याख्या करता है कि क्यों एक समय में ब्रिटेन विश्व की वर्कशॉप बन गया था।

आप जानते हैं कि जर्मनी ने अपना उद्योग, अन्य बातों के साथ-साथ, उन 50000 लाख फ्रांक से विकसित किया जो उसने फ्रांस से फ्रांस-प्रशिया युद्ध के जुर्माने के तौर पर वसूल किए।

एक पक्ष जिसमें हमारा देश बाक़ी पूँजीवादी देशों से भिन्न है, यह है कि हम किसी तरह की उपनिवेशवादी लूट या आम तौर पर दूसरे देशों के प्राकृतिक साधनों की लूट नहीं कर सकते और न ही हमें ऐसा करना चाहिए। इस तरह, हमारे लिए यह रास्ता बन्द है।

लेकिन, दूसरी तरफ़ हमारे देश ने न तो विदेशों से गुलाम बनाने वाले क़र्ज़ लिए हैं और न ही लेगा। इस लिए यह रास्ता भी बन्द है।

फिर कौन सा रास्ता रह जाता है? एक ही राह, और वह है अन्दरूनी संग्रहीकरण की सहायता से उद्योगों को विकसित करना, देश का औद्योगिकीकरण करना…

लेकिन इस संग्रहीकरण के मुख्य स्रोत कौन से हैं? जैसा कि मैंने कहा है, ऐसे दो स्रोत हैं: पहला मज़दूर वर्ग जो मूल्य पैदा करता है और हमारे उद्योग को आगे बढ़ता है; और दूसरा है किसानी।

किसानी के मामले में स्थिति कुछ इस प्रकार से है। पहले तो यह कि यह न सिर्फ़ राज्य को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर अदा करती है, बल्कि औद्योगिक उत्पादन की चीज़ों के लिए भी ऊँची अदायगी करती है और दूसरा, इसे कृषि के उत्पादों के लिए अधिक या कम थोड़ी अदायगी होती है।

किसानी पर लगाया गया यह अतिरिक्त कर उद्योग को उत्साहित करने के लिए है जो पूरे देश की सेवा करता है, जिसमें किसानी भी शामिल है।”26

शुरुआत में कृषि में सामूहिकीकरण का काम मशीनरी की कमी में होना था। इस दौर में श्रम की सामूहिकता श्रम की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण होनी थी। इसलिए उत्पादन बढ़ाने के लिए श्रम की सामूहिकता लाज़िमी थी और ऐसे में कृषि में सामूहिकीकरण किया जाता और मज़दूर वर्ग और किसानी के साझा मोर्चे को मज़बूत किया जाता है। इस तरह कृषि क्षेत्र में उस समय हालात कुछ इस तरह के थे – भले ही ‘ज़मीन हलवाहक की’ के नारे के नीचे बोल्शेविकों ने ग़रीब किसानों को बड़ी जागीरों पर क़ब्ज़ा करने दिया था और जिसके नतीजे के तौर पर बड़ी संख्या में किसानों के पास ज़मीनों की मालिकी आ गई थी लेकिन ‘नई आर्थिक नीति’ के तहत पूँजीवादी विकास को जो छूटें दी गईं, उनके नतीजे के तौर पर कृषि क्षेत्र में पूँजीपति किसानों जिन्हें रूस में कुलक कहा जाता था, का शक्तिशाली वर्ग पैदा हो गया। ग़रीब किसान अपनी ज़मीन खो रहे थे जबकि कुलक अपनी मालिकी हर वर्ष बढ़ाते जा रहे थे। ग़रीब किसान कुलकों के पास मज़दूरी करने लगे थे:

“1927 में, मुक्त बाज़ार के सहज विकास के कारण 7 प्रतिशत यानी 27 लाख किसान आबादी फिर से भूमिहीन हो गई थी। … 35 प्रतिशत किसान आबादी ग़रीबी के दलदल में धकेली गई जिसके पास न ही खेती के लिए घोड़ा था और न ही छकड़ा।

“50 प्रतिशत के लगभग मँझोले किसान थे, लेकिन वह भी पुराने ढंगों से खेती कर रहे थे। 1929 में यूक्रेन में 60 प्रतिशत किसानों के पास कोई भी मशीनरी नहीं थी; उत्तरी काकेशस में यह 71 प्रतिशत, निचले वोल्गा क्षेत्र में 87.5 प्रतिशत और केन्द्रीय काली-मिट्टी वाले क्षेत्र में 92.5 प्रतिशत था। यही मुख्य अनाज पैदा करने वाले क्षेत्र थे।

“समूचे रूप में, 5–7 प्रतिशत हिस्सा उन किसानों का था जो अमीर हो रहे थे; ये कुलक थे।”27

बाज़ार में पहुँचने वाले अनाज का अनुपात क्रान्ति के बाद बदल चुका था। विश्व युद्ध से पहले बड़े भूमिपतियों और धनी किसानों द्वारा मुख्य रूप से अनाज बेचा जाता था क्योंकि किसानी की बड़ी आबादी भूमिहीन थी या बेहद ग़रीब थी। लेकिन 1926 के हालात यह थे – बाज़ार में आए कुल अनाज का 74 प्रतिशत हिस्सा ग़रीब व छोटे किसानों का था, लेकिन तथ्य यह है कि उनका उत्पादन कुल उत्पादन का सिर्फ़ 11 प्रतिशत था। समाजवादी सामूहिक खेतों का हिस्सा 6 प्रतिशत था और बाक़ी कुलकों का था।28 लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि मौसम की मार या किसी अन्य कारण से फसल की पैदावार थोड़ी सी भी कम होने पर ग़रीब और छोटे किसानों की ओर से बाज़ार में आने वाले तीन-चौथाई अनाज में बड़ी कमी हो सकती थी। बिल्कुल यही हो भी रहा था। 1924–25 के दो सालों में यही हुआ, फिर 1927 में यही हुआ। कुलक सरकारी क़ीमत पर अनाज बेचने से मना कर देते थे जिसके कारण बाज़ार में अनाज की क़ीमतें बढ़ रही थीं, नतीजतन शहरों में भुखमरी का ख़तरा बना हुआ था। ऊपर से, भूमिहीन हो रहे और ग़रीबी की तरफ़ धकेले जा रहे किसान शहरों की ओर रुख कर रहे थे जिसके कारण हालात और भी बदतर हो रहे थे। कुलकों से ज़बरन अनाज उगाहने से किसानों के साथ मज़दूर वर्ग का साझा मोर्चा ख़तरे में पड़ सकता था। इस स्थिति से निकलने का एक ही रास्ता हो सकता था – उत्पादन बढ़ाया जाए (जो शुरू में सामूहिकता के जरिए और फिर मशीनीकरण के जरिए किया जाना था), भूमिहीन-गरीब किसानों के साथ साझा मोर्चा मज़बूत किया जाए और मध्यवर्गीय किसानों को अधिक से अधिक हद तक मज़दूर वर्ग की तरफ़ जीता जाए, और कुलकों का एक वर्ग के रूप में सफाया किया जाए, थोड़े़ शब्दों में, यह कि गाँवों में समाजवादी उत्पादन सम्बन्ध कायम करने की ओर बढ़ा जाए। सामूहिकीकरण ने ग़रीब किसानों और मध्यवर्गीय किसानों को सहकारिताओं में संगठित करना था, जिसके कारण कुलकों को मज़दूर मिलने बन्द हो जाने थे और ग़रीब किसानों की लूट भी ख़त्म हो जानी थी और साथ ही ग़रीब किसानों और ग्रामीण मज़दूर वर्ग को एक ताक़त के तौर पर संगठित कर देना था जिसका निशाना कुलक वर्ग को बनना था।

समूची परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही दिसम्बर, 1927 में पार्टी की 15वीं कांग्रेस के दौरान पारित हुए प्रस्तावों में कृषि में सामूहिकीकरण के दौरान पार्टी की आम नीति सामने रखी गई:

“रास्ता क्या है? छोटे और बिखरे हुए खेतों को पड़ाव-दर-पड़ाव कृषि मशीनरी, ट्रेक्टर और वैज्ञानिक तकनीकें इस्तेमाल करते हुए साझा, सहकारी और सामूहिक काश्त के आधार पर बड़े खेतों में बदला जाए, लेकिन जाहिरा तौर पर ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं, बल्कि समझाते हुए और उदाहरण प्रस्तुत करते हुए किया जाए।”

इस नीति के व्यवहार में लाए जाने पर कुलकों ने इसका विरोध करना ही था, इससे स्तालिन अच्छी तरह परिचित थे, इसलिए उन्होंने कहा:

“… मौजूदा परिस्थितियों में मज़दूरों और किसानों का साझा मोर्चा तभी कायम रह सकता है जब लेनिन के जाने-पहचाने नारे के मुताबिक़ चला जाता है: ग़रीब किसानों पर निर्भरता बनाओ, मँझोले किसानों के साथ मज़बूत एकता कायम करो, और कुलकों के ख़िलाफ़ संघर्ष को कभी ढीला न पड़ने दो। सिर्फ़ इसी नारे को लागू करके ही किसानी के बड़े जनसमूहों को समाजवादी निर्माण के दायरे में लाया जा सकता है।”

बिल्कुल यहीं पर बुखारिन की सामाजिक-जनवादी नीति पार्टी नीति से टकराव में थी। उत्पादन बढ़ाने के लिए, बुखारिन का मुख्य ज़ोर सामूहिकीकरण के स्थान पर निजी कृषि को और छूट देने पर था।

“समाज में जारी संघर्ष पार्टी के भीतर भी आ चुका था। बुखारिन … बाज़ार के सम्बन्धों को विकसित होने देने के रास्ते के जरिए समाजवाद की तरफ़ बढ़ने पर ज़ोर दे रहा था। 1925 में, वह किसानों को “ख़ुद को धनवान बनाओ” का नारा दे रहा था, और यह मान रहा था कि हमें धीमे-धीमे आगे बढ़ना चाहिए। स्तालिन ने 2 जून, 1925 को एक पत्र के जरिए बुखारिन को लिखा कि ख़ुद को धनवान बनाओ का नारा हमारा नारा नहीं है … हमारा नारा समाजवादी संग्रहीकरण है।”29 इस तरह उसके मुताबिक़ – “फिलहाल उद्योग को तेजी से विकसित करना, सामूहिक खेत व राजकीय खेत खड़े करना प्रमुख कार्य नहीं है, बल्कि बाज़ार की बुनियादी ताक़तों को ‘मुक्त’ करना, बाज़ार को ‘आज़ाद’ कराना और ग्रामीण क्षेत्रों में पूँजीवादी तत्वों सहित व्यक्तिगत खेतों की ‘राह से रुकावटें हटाना’ है। उसके मुताबिक़ कुलकों को “शान्तिपूवर्क ढंग से समाजवाद में विकसित होने” दिया जाना चाहिए। लेकिन क्योंकि कुलक समाजवाद में विकसित नहीं हो सकते, और बाज़ार ‘आज़ाद’ करने का अर्थ कुलकों को शक्तिशाली बनाना और मज़दूर वर्ग को कमजोर करना था। जब उसकी अवस्थिति सैद्धान्तिक स्तर पर हार गई तो वह सामूहिकीकरण के अमल में रुकावटें खड़ी करने लगा। जब स्तालिन ने कुलकों का एक वर्ग के तौर पर सफाये का आह्वान किया तो इस गुट ने अपना विरोध और भी तीखा कर दिया। वह समाजवाद के निर्माण के समय वर्ग संघर्ष से इनकार करते थे और सोचते थे कि पूँजीवादी तत्व या तो बिना कोई शोर किए ख़त्म हो जाएँगे, या फिर समाजवाद में विकसित हो जाएँगे। लेकिन इतिहास में ऐसे चमत्कार नहीं होते। हालाँकि बुखारिन, राइकोव और अन्य लोगों के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी गुट पहले ही औद्योगिकीकरण और सामूहिकीकरण की नीति का विरोध कर रहा था लेकिन ‘यूनाइटिड ऑपोज़िशन’ के विरोध के ज्यादा तीखे होने के चलते छिपा रहा और तब ही पूरी तरह से ख़ुद को प्रकट किया जब कुलकों पर वास्तविक हमलों का समय आ गया। इस अवस्थिति का तत्व कुलकों के हितों की रक्षा करना और औद्योगिकीकरण की रफ़्तार को धीमा करना था। ‘यूनाइटिड ऑपोज़िशन’ की निर्णायक हार हो जाने के बाद बुखारिनपंथियों की सामाजिक-जनवादी दक्षिणपंथी लाइन ने संघर्ष शुरू कर दिया जो कि 15वीं कांग्रेस के बाद विशेष तौर पर तीखा हो गया। लेकिन यह अवस्थिति बहुत ज्यादा देर तक टिक न पायी। जब सैद्धान्तिक स्तर पर दक्षिणपंथी लाइन हारने लगी तो दक्षिणपंथियों और “वामपन्थियों” का साझा मोर्चा बनना शुरू हो गया।

“इस संघर्ष के दौरान, ‘यूनाइटिड ऑपोज़िशन’ के सदस्यों ने बुखारिन के साथ सिद्धान्तहीन गठजोड़ बनाया ताकि स्तालिन और मार्क्सवादी-लेनिनवादी नेतृत्व को उल्टाया जा सके। जब सामूहिकीकरण से पहले तीखी बहस चल रही थी तो 11 जुलाई, 1928 को बुखारिन ने गुप्त तौर पर कामेनेव से मीटिंग की। उसने साफ़ कहा कि वह ‘कामेनेव व जिनोवियेव के लिए स्तालिन को त्याग सकता है’ और ‘स्तालिन को हटाने के लिए एक ब्लॉक’ की उम्मीद रख रहा था।30

“सितम्बर, 1928 में कामेनेव ने त्रॉत्सकीपंथियों के साथ सम्पर्क किया, उन्हें पार्टी में शामिल होने के लिए कहा और ‘संकट के पक जाने तक’ इंतजार करने के लिए कहा।”31

लेकिन बुखारिन की पराजयवादी नीति को लोगों में कोई हिमायत नहीं मिली और पहली पँचवर्षीय योजना और सामूहिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई। सामूहिकीकरण की प्रक्रिया दो आन्दोलनों में चलती है – पहला आन्दोलन 1929–30 के दौरान और दूसरा आन्दोलन 1931–32 के दौरान चलता है। सामूहिकीकरण की पूरी प्रक्रिया को समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि अक्सर इस प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी न होने से ईमानदार क्रान्तिकारी और आम लोग बुर्जुआ प्रचार और त्रॉत्सकीपंथियों और अन्य भगोड़ों, संशोधनवादियों के कुत्साप्रचार का शिकार होकर यह समझने लगते हैं कि सामूहिकीकरण पूरी तरह बोल्शेविकों, ख़ासकर स्तालिन द्वारा लोगों पर थोपा गया जिसके भयंकर नतीजे निकले, अकाल पड़ गए और स्तालिन ने रूस बर्बाद कर दिया, 75 लाख लोग स्तालिन के “कुकर्मों” के कारण मौत के मुँह में जा गिरे, या फिर स्तालिन ने कई स्थानों पर जैसे यूक्रेन में, सोझ-समझकर लोग मारे!

पहला आन्दोलन – सामूहिकीकरण का फ़ैसला लेने वाली पार्टी की ओर से जो फ़ैसले लिए गए, उनके मुताबिक़ पहली पंचवर्षीय योजना के मुताबिक़ पूरी कृषि के पाँचवें हिस्से से भी कम हिस्से को सामूहिकीकरण के अन्तर्गत लाया जाना था।

“अप्रैल, 1929 में पहली पंचवर्षीय योजना के लिए 1932–33 तक 10 प्रतिशत कृषि को सामूहिकीकरण के अन्तर्गत लाने की योजना बनाई गई। इस स्तर पर कोलखोजी व सोवखोजी मिलकर अनाज के कुल उत्पादन का 15.5 प्रतिशत हिस्सा पैदा करने योग्य होने थे। अनाज के इतने उत्पादन पर नियंत्रण होने पर कुलकों के ख़िलाफ़ सफाये की मुहिम छेड़नी सम्भव होनी थी।”32

“… 30 मिलीयन हेक्टेयर से ऊपर जमीन में सामूहिक खेती के आधार पर बुवाई हो चुकी है, जो पहले ही 1932–33 तक के 24 मिलीयन हेक्टेयर के लक्ष्य को पार कर चुकी है।”33

“पहली पंचवर्षीय योजना में 1933 तक 20 प्रतिशत खेतों को सामूहिकीकरण के अन्तर्गत लाने का मक़सद था।”34

लेकिन जो कुछ हुआ, उसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।

“1 मार्च, 1930 तक 57.2 प्रतिशत परिवार कोलखोजी में शामिल हो चुके थे।”35 कुछ क्षेत्रों में यह प्रतिशत 80 प्रतिशत को पार कर चुकी थी। इस अकल्पनीय सामूहिकीकरण के लिए केन्द्रीय योजना में कृषि के लिए मशीनरी और अन्य सामान का इंतज़ाम करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी, और न ही इतने बड़े पैमाने पर सामूहिकीकरण के फैलाव को सँभालने, दिशा देने और संगठित करने के लिए पार्टी के पास कार्यकर्ता शक्ति थी। इसके चलते अराजकता फैलनी शुरू हो गई। इस अराजकता के कई पक्ष हैं – कुलकों के प्रति सरकारी नीति की उल्लंघना करके बड़ी संख्या में उन्हें ग़रीब किसानों और मज़दूरों के संगठित समूहों ने देशनिकाला देना शुरू कर दिया, लगभग 3,33,000 कुलक परिवारों की सम्पत्तियाँ ज़ब्त करके बेदखल कर दिया गया। दूसरी तरफ़, सामूहिक खेतों का प्रबन्ध करने के लिए शिक्षित लोग नहीं थे, इसलिए सामूहिक खेतों में अलग से अराजकता थी। इसके अलावा, लोगों को सामूहिक खेतों में शामिल करने के लिए सरकारी नीति को समझे बिना स्थानीय नेताओं ने अपने नारे देने शुरू कर दिए, जैसे, जो साझे खेत में शामिल होगा उसे ट्रेक्टर मिलेंगे। कई जगहों पर कुछ अति-उत्साहित “वामपंथियों” ने, कुछ करियरवादियों ने और कुछ साज़िशियों ने जो सामूहिकीकरण को इतना फैला देना चाहते थे कि वह फ्लॉप हो जाए, लोगों को ज़बरदस्ती, बिना शिक्षित किए सामूहिक खेतों में इकट्ठा करना शुरू कर दिया। कई अन्य जगहों पर सामूहिकीकरण के अर्थ ही नहीं समझे गए जिसके मुताबिक़ सिर्फ उत्पादन के साधन ही साझा किए जाने थे। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि काफ़ी जोर ज़बरदस्ती होने के बावजूद, सामूहिकीकरण एक जनान्दोलन बन चुका था, सदियों से उत्पीड़ित गाँवों की जनता उठ खड़ी हुई थी और वह अपने साथ हुए हर अन्याय का बदला लेना चाहती थी। पार्टी ने तुरन्त स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए।

– नवम्बर, 1929 में “25,000” औद्योगिक मज़दूरों को किसानों और खेत मज़दूरों का नेतृत्व करने के लिए तुरत-फुरत तैयार किया गया।

– 1930 के पहले महीनों में एक लाख लोगों का एक और जत्था जिसमें लाल सेना के सिपाही शामिल हैं, गाँवों की ओर भेजा गया।

– फरवरी, 1930 में शहरी सोवियतों के 7,200 सदस्यों को गाँवों में भेजा गया।36

– मशीनरी की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय योजना के अन्तर्गत लगाए जाने वाले स्तालिनग्राद के कारख़ानों के अलावा दो और कारख़ाने लगाने का तुरत-फुरत प्रबन्ध किया गया। खारकोव के कारख़ाने का निर्माण तो किसी दन्त-कथा से कम नहीं।37

इसके साथ-साथ पार्टी की ओर से दिशा-निर्देश जारी होते रहे:

“क) मौजूदा समय में सामूहिक-खेत बनाने के आन्दोलन का मुख्य पहलू कृषि के आरतेल बनाना है।

“ख) इसे ध्यान में रखते हुए ज़रूरी है कि कृषि आरतेलों के लिए मॉडल नियम तय किए जाएँ…

“ग) सामूहिक खेत बनाने के आन्दोलन को ऊपर से ‘फरमान’ जारी करने और ‘सामूहिकीकरण के साथ’ खेलने की हमारे व्यावहारिक काम में बिल्कुल आज्ञा नहीं है।”38

2 मार्च, 1930 को प्रावदा में स्तालिन का मशहूर लेख ‘सफ़लता के नशे में चूर’ छपता है:

“… विभिन्न क्षेत्रों में परिस्थितियों के बहुत अलग-अलग होने को ध्यान में रखते हुए यह लाज़िमी समझा जाए कि सामूहिक खेत बनाने के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती का जरा-सा भी इस्तेमाल न हो। यह मूर्खतापूर्ण और प्रतिक्रान्तिकारी है। सामूहिक खेतों का आन्दोलन जनता के समर्थन पर टिका होना चाहिए।

“कृषि आरतेल … मुख्य रूप है…

“कृषि आरतेल में, उत्पादन के बुनियादी साधन, मुख्य तौर पर अनाज की खेती के लिए जरूरी – श्रम, जमीन का इस्तेमाल, मशीनें और अन्य और, जुताई करने वाले पशु और खेतों की इमारतों – का भी समाजीकरण होता है। आरतेल में, घरेलू प्लॉट, छोटे बगीचे, सब्जियों की क्यारियाँ, रिहायशी घर, दूधारू पशु, अन्य छोटे जानवर, पॉल्ट्री आदि का समाजीकरण नहीं किया जाता।

“जो भी व्यक्ति किसी आन्दोलन का नेतृत्व करना चाहता है और विशाल जनता से सम्पर्क बनाए रखना चाहता है, उसे दो मोर्चों पर लड़ना पड़ता है – उनके साथ भी जो पीछे रह रहे होते हैं और उनके साथ भी जो आगे-आगे भाग रहे होते हैं।”39

इसके बाद, दो लेख और जारी हुए। 15 मार्च, 1930 को केन्द्रीय कमेटी का मशहूर फ़ैसला “सामूहिक-खेत आन्दोलन में पार्टी-नीति की तोड़-फोड़ के ख़िलाफ़ लड़ाई” और 3 अप्रैल, 1930 को स्तालिन का दूसरा मशहूर लेख “सामूहिक खेतों के कामरेडों को जवाब” प्रावदा में छपता है। पार्टी द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और अन्य कदमों के ज़रिये पहले दौर में फैली अराजकता काबू में आने लगती है और इसका असर सामूहिक खेतों के प्रतिशत पर तुरन्त दिखाई देता है।

“1 मार्च, 1930 के 57.2 प्रतिशत के सामूहिकीकरण का आँकड़ा 1 अगस्त, 1930 में घटकर 21.9 प्रतिशत हो जाता है। जो फिर से बढ़कर जनवरी, 1931 में 25.9 प्रतिशत हो जाता है।”40

सामूहिकीकरण के प्रतिशत का नीचे आना भी सभी जगह एक जैसा नहीं रहा। कुछ क्षेत्रों में बहुत कम बदलाव आया, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में बहुत बड़े स्तर पर किसानों ने सामूहिक-खेत छोड़े। इस तरह स्पष्ट है कि ज़बरदस्ती सामूहिक खेतों के निर्माण की न तो पार्टी की, और न ही स्तालिन की कोई नीति थी जिस तरह के अक्सर इल्जाम लगाए जाते हैं (बल्कि स्तालिन और पार्टी ने इसके ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ा और स्थिति को काबू में किया। पहले आन्दोलन के दौरान भयंकर अराजकता के बावजूद उत्पादन का स्तर नीचे नहीं आया, 1930 में अनाज का उत्पादन 77 मिलीयन टन रहा, जबकि 1929 में उत्पादन 71.7 मिलीयन टन था।41 इस तरह उत्पादन के नीचे आने, फसल बरबाद होने की बुर्जुआ मीडिया की कहानियाँ मनगढ़त हैं।

दूसरा आन्दोलन – इसके बाद सामूहिकीकरण का दूसरा आन्दोलन शुरू होता है जो वर्ष 1931–32 में चलता है। इस बार अधिक योजनाबद्ध ढंग से काम हाथ में लिया जाता है। सितम्बर–दिसम्बर, 1930 के चार महीनों के समय में सामूहिकीकरण के लिए व्यापक प्रचार मुहिम चलाई जाती है। सामूहिक-खेत छोड़कर जाने वाले किसानों के साथ मीटिंगों का सिलसिला चलाया गया, किसानों को शिक्षित करने के लिए केन्द्र बनाए गए और 5,625 विशेष भर्ती दस्ते भेजे गए।42

दूसरी ओर पार्टी की नीति भी बदल जाती है। पहले आन्दोलन में मुख्य निशाना कुलकों पर लगाम कसने का था, अब कुलकों को एक वर्ग के रूप में ख़त्म कर देने का लक्ष्य तय किया गया। इसके चलते कुलकों का विरोध पहले से भी अधिक तीखा हो गया। पहले आन्दोलन में कुलक वर्ग को उम्मीद थी कि सामूहिकीकरण की प्रक्रिया असफ़ल हो जाएगी और फिर से पहले वाली स्थिति बहाल हो जाएगी, लेकिन पहले चरण की सफ़लता, जनान्दोलन का उभार व फैलाव और पार्टी की बदली हुई नीति यानी नए सिरे से योजनाबन्दी व संगठन और कुलकों का एक वर्ग के रूप में सफाया करने की नीति ने उनके सामने यह स्पष्ट कर दिया कि सामूहिकीकरण की प्रक्रिया न तो असफ़ल होने वाली है और न ही पीछे हटने वाली है। नतीजतन, सामूहिकीकरण की प्रक्रिया कुछ क्षेत्रों में खुले गृहयुद्ध में बदल गई। यूक्रेन इन क्षेत्रों में से एक था, जहाँ यह टकराव सबसे भयंकर रहा। कुलकों द्वारा खड़े किए गए हथियारबन्द दस्तों ने जगह-जगह विद्रोह किए, आतंकवादी कार्रवाइयाँ कीं, पार्टी द्वारा भेजे गए कितने ही कम्युनिस्टों को मारा गया। सामूहिकीकरण की प्रक्रिया को असफ़ल करने के लिए उत्पादन के साधनों का ख़ात्मा बड़े स्तर पर किया गया ताकि सामूहिक खेत शुरू ही न हो सकें। पकी फसलों को जलाया गया, और इमारतों को तबाह किया गया। तोड़-फोड़ की ये घटनाएँ पहले आन्दोलन के मुकाबले दूसरे आन्दोलन के दौरान अत्यधिक बढ़ गईं।

“1928 में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में घोड़ों की संख्या 34 मिलियन थी, जो 1932 में घटकर 15 मिलियन रह गई। इसे कुछ बोल्शेविकों ने घोड़ों का एक वर्ग के रूप में ख़ात्मा कहा। 70.5 मिलियन घरेलू पशुओं में से 1932 में 40.7 मिलियन बचे। 26 मिलियन सूअरों की संख्या सामूहिकीकरण के इस दौर में घटकर 11.7 मिलियन रह गई।”43

कुलकों द्वारा अफ़वाहें फैलाई गईं और राजनीतिक प्रचार किया गया, किसानों की निरक्षरता, सांस्कृतिक पिछड़ेपन, अन्धविश्वासों और धार्मिक विश्वासों का पूरा फ़ायदा उठाया गया और उन्हें बोल्शेविकों के ख़िलाफ़ भड़काया गया।

कुलकों के प्रति पार्टी की नीति क्या थी, इसके बारे में स्पष्ट कर देना चाहिए। जैसा कि हमने पहले देखा है कि 1929–30 के पहले आन्दोलन के दौरान 3,33,000 कुलक परिवारों को बेदखल किया गया और देशनिकाला दिया गया, लेकिन दूसरे आन्दोलन के दौरान यह आँकड़ा घटकर 76,000 हो गया। पहले आन्दोलन के दौरान देशनिकाला दिए गए 70,000 परिवारों को वापस बुलाया गया। पार्टी-नीति इसके बारे में साफ़ थी कि सिर्फ़ प्रतिक्रान्तिकारी कार्रवाइयाँ और तोड़-फोड़ करने वाले कुलक परिवार ही बेदखली और देश निकाले के लिए चुने जाएँगे और ‘कुलकों में बहुसंख्या पर भरोसा किया जा सकता है’44 इस तरह कुलकों को बड़े स्तर पर बेदख़ल करने, क़त्लेआम करने और देशनिकाला देने की कोई आधिकारिक नीति नहीं थी। अक्सर यह समझा जाता है कि मंझोले किसान समूचे वर्ग के रूप में सामूहिकीकरण के पक्ष में आ खड़े होंगे और पार्टी द्वारा उनको समझा-बुझाकर ऐसा किया जा सकता है। लेकिन ऐसा असम्भव है। मंझोले किसान कोई एकाश्मी वर्ग नहीं है, इसमें निम्न मंझोले किसान, मध्यवर्ती तथा मुक़ाबलतन अमीर मंझोले किसान शामिल रहते हैं। मंझोले किसानों के इस पीछे वाले हिस्से में से कुछ अपनी सामाजिक पोज़िशन और कुछ कुलकों के प्रचार-प्रोपेगेण्डा के कारण काफ़ी बड़ी संख्या में सामूहिकीकरण की ख़िलाफ़त करते हैं और कुलकों के साथ मिलकर तोड़-फोड़ और प्रतिक्रान्तिकारी कार्रवाइयों में शामिल होते हैं। स्पष्ट है कि ऐसे अपराधों के लिए जो नीति कुलकों के लिए होगी, वही नीति ऐसे मंझोले किसानों के लिए भी लागू होगी ही। इसलिए मंझोले किसानों के कुछ हिस्से को भी देशनिकाले और अलग-अलग तरह की सज़ाओं का सामना करना पड़ा।

अब आइए, यूक्रेन में अकाल पड़ने की कहानी की तरफ़। पहले ही कहा गया है कि अनाज की कमी ज़रूर खड़ी हुई थी, लेकिन अकाल की कहानी पूरी तरह मनगढ़ंत है जिसके पीछे हिटलर की प्रचार मशीनरी और विलियम हर्स्ट का अमेरिका में क़ायम किया गया ‘पीत पत्रकारिता’ का साम्राज्य था। अनाज की कमी के लिए स्तालिन को क़सूरवार ठहराना वैसे ही है जैसे अक्टूबर क्रान्ति के बाद शुरू हुए गृहयुद्ध के लिए कोई लेनिन को क़सूरवार ठहराए, या फिर आज के हालातों में, अगर कोई नेता सभी लोगों को अनाज मुहैया करवाने के लिए ग़रीब और मँझोले किसानों के सामूहिक खेत क़ायम करना शुरू करे जिसका अमीर भूमिपति विरोध करें और इन दो पक्षों में लड़ाई शुरू हो जाए और फिर एक-दो वर्षों के लिए खेती में अस्थिरता व अमीर भूमिपतियों द्वारा अनाज की जमाखोरी और तोड़-फोड़ के कारण अनाज की कमी खड़ी हो जाए, और फिर कोई अनाज की पूर्ति सभी के लिए सुनिश्चित बनाने की कोशिश करने वाले नेता को इस वक़्ती कमी के लिए क़सूरवार ठहराए। आज अगर कोई ऐसी बात करेगा तो उस पर हँसा जाएगा, लेकिन चूँकि यह स्तालिन ने किया इसलिए पूँजीवाद के सभी बुद्धिजीवी और मीडिया चीखते हुए स्तालिन को अपराधी सिद्ध करने पर तुल जाते हैं। अब हम कुछ तथ्यों की बात करते हैं। यूक्रेन में अकाल की ख़बर सबसे पहले 18 फरवरी, 1935 के शिकागो अमेरिकन के मुख्य पन्ने पर प्रकाशित हुई जिसमें सोवियत यूनियन में भुखमरी से 60 लाख लोगों के मरने का खुलासा किया गया। है न हैरानी की बात, अकाल पड़ा 1932–33 में और पता चला 1935 में, और वह भी कुछ ही मौतें नहीं, 60 लाख मौतें। इस कहानी के अन्तर्गत हर्स्ट की प्रेस ने नात्सियों की प्रचार मशीनरी के झूठों को लगातार छापा। इसे और सच्चा बनाने के लिए अकाल की तस्वीरें छापी गईं जिनका बाद में पता चला कि वे असल में सोवियत यूनियन में पड़े 1922 के अकाल की तस्वीरें थीं। नात्सियों के प्रचार को दूसरा विश्वयुद्ध ख़त्म होने पर अमेरिकी खुफ़िया एजेंसियों और साम्राज्यवादी प्रचार मशीनरी ने सँभाल लिया। फ़र्क यह था कि मौतों की संख्या और अकाल का अरसा लगातार लम्बे होते गए। रॉबर्ट कांक्वेस्ट जो कि कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार का एक मुख्य कारिन्दा है, ने 1983 में रीगन के कम्युनिस्ट विरोधी जिहाद के समय मौतों की संख्या खींचकर 1 करोड़ 40 लाख कर दी और अकाल का अरसा 1937 तक कर दिया! कांक्वेस्ट, सोलजिंत्सन जैसे साम्राज्यवादी कारिन्दों द्वारा पेश किए गए “तथ्य” आज भी गूँजते रहते हैं, भले ही आधिकारिक तौर पर इन्हें काफ़ी पहले ही नंगा किया जा चुका है। इस बारे में डगलस टौटल की किताब45 पढ़ी जा सकती है। लूडो मार्टेंस ने अन्य कितने ही शोधकर्मियों के हवाले देकर इसे रद्द किया है। जैसा कि पहले ही ज़िक्र किया गया है, अनाज की कमी पैदा ज़रूर हुई, लेकिन इसके व्यापक भुखमरी में बदलने से पहले ही परिस्थितियों पर काबू पा लिया गया, पूरे सोवियत यूनियन में अनाज की राशनिंग शुरू की गई और यूक्रेन के लिए अनाज की खास सप्लाई की व्यवस्था की गई। एक बात और, इसी दौरान सोवियत यूनियन में टाइफ़स भी फैला। टाइफ़स की महामारी रूस के लिए सदियों से मौत का दूसरा नाम रही है, यह रूस के लिए कितनी बड़ी समस्या थी, इसका पता तो इसी से लग जाता है कि लेनिन को दिसम्बर, 1919 में कहना पड़ा – या तो रूस में समाजवाद रहेगा, या फिर टाइफ़स।46 यह भी उस दौरान हुई मौतों के लिए जिम्मेदार था। 1928–33 के पूरे अरसे के दौरान हुई ऐसी मौतों की संख्या जो किसी न किसी रूप में सामूहिकीकरण से जुड़ी हुई हैं, 4 लाख 80 हज़ार से ऊपर नहीं जाती, इसमें टाइफ़स से हुई मौतें भी शामिल हैं।47

इस तरह, तेज़ी से औद्योगिकीकरण और इसलिए कृषि का तेज़ विकास और उसके लिए सामूहिकीकरण, इसके अलावा इतिहास ने स्तालिन के सामने कोई रास्ता नहीं रखा था, और स्तालिन इसे पहले ही देख रहे थे, एक भविष्यदर्शी की तरह (1931 में कहे गए स्तालिन के ये शब्द किसी भी शब्दजाल का नक़ाब उतारने के लिए काफ़ी हैं) – हम विकसित देशों से पचास या सौ वर्ष पीछे खड़े हैं। हमें यह फ़र्क दस वर्षों में मिटाना होगा। या तो हम ऐसा कर लेंगे, नहीं तो हमारी तबाही होगी।48 पूरे दस वर्ष बाद 1941 में नात्सियों ने सोवियत यूनियन पर हमला कर दिया था!!

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1934 के वर्ष तक ऐसा लग रहा था कि जैसे सब कुछ ठीक-ठाक है। 1934 में हुई अठारहवीं पार्टी कांग्रेस को जीत और एकता की कांग्रेस कहा गया क्योंकि एक तरफ़ आर्थिक मोर्चे पर सोवियत यूनियन सफ़लताएँ दर्ज़ कर रहा था, दूसरी ओर राजनीतिक तौर पर भी स्थिरता आती लग रही थी। पार्टी में अधिकतर विरोधी जैसे जिनोवियेव, कामेनेव, बुखारिन, प्याताकोव, रादेक, रिकोव, प्रियोब्राजेंस्की आदि को एक बार फिर पार्टी में शामिल कर लिया गया था, और ये सब नेता कांग्रेस में भी शामिल हुए थे और भाषण देने वालों में शामिल थे। लेकिन यह सबकुछ अधिक दिन तक न चला, 1 दिसम्बर, 1934 को पार्टी के अग्रणी नेता किरोव की लेनिनग्राद में पार्टी कार्यालय में ही हत्या हो गई। इसके बाद वह घटनाक्रम शुरू हुआ जिसको लेकर स्तालिन और बोल्शेविकों के ख़िलाफ़ सबसे अधिक कुत्साप्रचार होता है।

1936–38 के मुक़दमे और शुद्धिकरण मुहिम

किरोव की हत्या से थोड़ी देर बाद ही जिनोवियेव और कामेनेव को पार्टी कामों से बाहर कर दिया जाता है और जिनोवियेववादियों की पार्टी से छँटनी शुरू हो जाती है, लेकिन इस समय के दौरान बड़े स्तर पर गिरफ़्तारियाँ और सजाएँ शुरू नहीं हुई थीं। 16 महीनों तक जाँच चलती रही और जुलाई, 1936 में जाकर जिनोवियेव और कामेनेव के ख़िलाफ़ मुक़दमा शुरू होता है। जनवरी, 1937 में प्याताकोव, रादेक और दूसरे त्रॉत्सकीवादियों पर मुक़दमा चलता है। मई, 1937 में मार्शल तुखाचोव्सकी और अन्य सैन्य उच्च अधिकारियों की गिरफ़्तारी होती है और मुक़दमे शुरू होते हैं। फरवरी–मार्च, 1938 में बुखारिन, रिकोव और दूसरे दक्षिणपंथी ब्लॉक के सदस्यों पर मुक़दमा चलाया जाता है। 1937–38 में पार्टी में शुद्धिकरण मुहिम चलती है, इस दौरान गिरफ़्तारियों और सजाओं जिसमें मौत की सजाएँ भी शामिल हैं, में तेज़ी से वृद्धि होती है जो वर्ष 1939 में एकदम नीचे आ जाती हैं। ख्रुश्चेव के “गुप्त भाषण” से पहले भी इस सारे घटनाक्रम के लिए स्तालिन को क़सूरवार ठहराया जाता था, लेकिन उस समय तक कुत्साप्रचार का मुख्य ज़ोर शुद्धिकरण मुहिमों के दौरान “स्तालिन द्वारा क़त्ल” किए गए “बेक़सूर” लोगों की संख्या पर होता था (ख्रुश्चेव ने अपने “गुप्त भाषण” में “दस्तावेज़ों” के ज़रिए स्तालिन को इस “क़त्लेआम” का क़सूरवार ठहराया। ख्रुश्चेव के खुलासों को विश्वभर की बुर्जुआ प्रचार मशीनरी, त्रॉत्सकीपंथियों और संशोधनवादियों ने हाथों-हाथ लिया। सबसे पहले हम ख्रुश्चेव के खुलासों और उस समय की असल पार्टी नीति को देखते हैं।

ग्रोवर फर ने अपनी किताब “ख्रुश्चेव लाइड” में इस पूरे घटनाक्रम के साथ जुड़े ख्रुश्चेव के 18 झूठों का ज़िक्र किया है (इनमें से हम पार्टी नीति से सम्बन्धित झूठों को लेंगे।)

पहला झूठ – ख्रुश्चेव स्तालिन और ज़दानोव द्वारा पोलितब्यूरो के दूसरे सदस्यों को 25 सितम्बर, 1936 को भेजे गए तार का हवाला देता है – “हम इसे पूरी तरह आवश्यक और फ़ौरी समझते हैं कि कामरेड एजोव को अन्दरूनी मामलों के लिए जनकमिसार नियुक्त किया जाए। यगोदा त्रॉत्सकीपंथी-जिनोवियेववादी गुट का पर्दाफ़ाश करने में नाकाम रहा है। इस मामले में ओ.जी.पी.यू. चार वर्ष पीछे है।”49 इसकी व्याख्या ख्रुश्चेव यह करता है कि स्तालिन का मतलब यह था कि एन.के.वी.डी. बड़े स्तर पर गिरफ़्तारियाँ और मौत की सज़ाएँ देने में चार वर्ष पीछे है। जबकि तार में लिखे हुए से ही यह स्पष्ट है कि यहाँ त्रॉत्सकीपंथी-जिनोवियेववादी गुट का पर्दाफ़ाश करने के सम्बन्ध में बात हो रही थी। उस समय तक जिनोवियेव-कामेनेव मुक़दमे के दौरान यह बात सामने आ चुकी थी कि 1932 में त्रॉत्सकी के नेतृत्व में त्रॉत्सकीपंथियों, जिनोवियेववादियों और अन्य द्वारा एक गुप्त ब्लॉक बनाया जा चुका था जिसका मक़सद आतंकवादी कार्रवाइयाँ करना और बोल्शेविक नेताओं की हत्याएँ करना और विद्रोह की तैयारी करना था। यगोदा के भी इस ब्लॉक से जुड़े होने का शक था।50 यह ब्लॉक बनाए जाने को त्रॉत्सकी के अपने पुरालेखों के आधार पर भी सिद्ध किया जा चुका है जिन्हें 1980 के बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने सार्वजनिक कर दिया है।51

दूसरा झूठ – “फरवरी–मार्च, 1937 में केन्द्रीय कमेटी के प्लेनम में स्तालिन की रिपोर्ट ‘पार्टी कामकाज की कमज़ोरियों और त्रॉत्सकीपंथियों व अन्य दोमुँहो के सफ़ाए के लिए तरीके’ में व्यापक आतंक फैलाने की नीति का सैद्धान्तिक आधार इस रूप में मौजूद है कि जैसे जैसे हम समाजवाद की तरफ़ बढ़ते हैं, वर्ग युद्ध तीखा होना लाज़िमी है। स्तालिन ने ज़ोर देकर कहा कि इतिहास और लेनिन दोनों ने हमें यही सिखाया है।”52 लेकिन स्तालिन की उक्त रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है (इस पूरी रिपोर्ट की प्रतिलिपि उपलब्ध है) ,53 बल्कि इस पूरी रिपोर्ट और प्लेनम की समाप्ति के वक़्त के स्तालिन के भाषण में बिल्कुल उल्टा मामला है। स्तालिन बिना सोचे-समझे लोगों को पार्टी से निकालने और मुक़दमेबाज़ी के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं और इस तरह की कार्यपद्धति को रोकने का आह्वान करते हैं। पूरे भाषण में चौकसी बढ़ाने, कार्यकर्ताओं की राजनीतिक शिक्षा के कोर्स शुरू करने, जनता से करीबी सम्बन्ध क़ायम करने, नौकरशाही पर लगाम कसने, पार्टी अधिकारियों की पार्टी सदस्यों द्वारा आलोचना संगठित करने आदि तरह के सुझावों का ज़िक्र है।

तीसरा झूठ – बहुत से सदस्यों ने, ख़ास तौर पर पोस्तेशेव ने फरवरी–मार्च, 1937 के उपरोक्त ज़िक्र में आए प्लेनम के व्यापक दमन-चक्र चलाने के फैसले का विरोध किया।54 जैसा कि हमने ऊपर देखा है कि न तो स्तालिन की रिपोर्ट में और न ही समाप्ति भाषण में किसी दमन-चक्र का ज़िक्र है। इस प्लेनम में पारित हुआ प्रस्ताव छपा नहीं था, लेकिन रूसी इतिहासकार जुखोव ने इस प्रस्ताव की पूरी प्रतिलिपि को 2003 में छपवाकर इस झूठ को पूरी तरह नंगा कर दिया है। प्रस्ताव की प्रतिलिपि अब उपलब्ध है।55

और तो और, इतिहासकार ज. आर्क गैटी और ओलेग नौमेव ने सोवियत पुरालेखों के आधार पर यह दिखलाया है कि वास्तव में पोस्तेशेव दमन-चक्र का समर्थक था और इसी कारण उसे जनवरी, 1938 के प्लेनम में पोलितब्यूरो की उम्मीदवार सदस्यता से हटा दिया गया था। और आगे, ख्रुश्चेव को पोस्तेशेव की जगह नियुक्त किया गया था।56 इस बारे में विस्तृत ब्योरे ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाईड” पृष्ठ 282–88 पर पढ़े जा सकते हैं। उसी महीने उसे तीन हज़ार पार्टी सदस्यों को बाहर निकालने और झूठे मुक़दमे चलाने के दोषों में गिरफ़्तार किया गया।

चौथा झूठ – “जनवरी, 1938 के प्लेनम में दमन-चक्र को रोकने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया गया।”57 लेकिन मामला यहाँ भी उल्टा है।

“पार्टी केन्द्रीय कमेटी का प्लेनम पार्टी संगठनों और उनके नेताओं का इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाना ज़रूरी समझता है कि अपनी कतारों में त्रॉत्सकीपंथियों-दक्षिणपंथियों का सफ़ाया करने के लिए अपनी मुख्य कोशिशों के दौरान वे गम्भीर ग़लतियाँ और अनियमितताएँ कर रहे हैं … पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की लगातार हिदायतों और चेतावनियों के बावजूद बहुत से मामलों में पार्टी संगठन ग़लत पहुँच अपनाते रहे हैं और अपराधिक छिछलेपन के ढंग से कम्युनिस्टों को पार्टी से बाहर निकालते रहे हैं।

“… बोल्शेविक चौकसी … यह नहीं है कि अटकलपच्चू ढंगों या मनमर्जी से हज़ारों-लाखों की संख्या में बाहर निकाल दो, हर किसी को जो सामने आता है।

“निर्देश दिए जाते हैं कि पार्टी में से लोगों को अन्धाधुन्ध बाहर निकालना बन्द किया जाए…

“निर्देश दिए जाते हैं कि जो पार्टी नेता केन्द्रीय कमेटी के निर्देश नहीं लागू कर रहे उन्हें पार्टी के पदों से हटाया जाए और उन्हें पार्टी के आगे पेश किया जाए…”58

11 नवम्बर, 1938 को स्तालिन और मोलोतोव हस्ताक्षरों के नीचे जारी निर्देश:

“… एन.के.वी.डी. के काम करने और मुक़दमे चलाने के तरीके में बहुत सारे और बहुत गम्भीर नुक़्स मिले हैं। … स्थानीय और केन्द्रीय स्तर पर एन.के.वी.डी. में दुश्मन एजेण्ट और जासूस घुसपैठ कर चुके हैं।

“जनकमिसारों की काउंसिल और पार्टी की केन्द्रीय कमेटी यह प्रस्ताव पारित करती है:

“1. एन.के.वी.डी. और सरकारी वकीलों पर कोई भी बड़ी गिरफ़्तारी और देशनिकाला देने के हुक्म पर पाबन्दी लगाई जाती है…

“… एन.के.वी.डी. और सरकारी पैरवीकारों को चेतावनी दी जाती है कि किसी कर्मचारी द्वारा, वह चाहे कोई भी हो, सोवियत कानूनों और सरकारी दिशा-निर्देशों से ज़रा सी चूक पर भी सख़्त क़ानूनी कार्रवाई शुरू की जाएगी…”59

इस तरह यह कहना कि दमन-चक्र चलाने और बड़ी संख्या में गिरफ़्तारियाँ और मौत की सजाएँ पार्टी और स्तालिन की नीति थी, पूरी तरह ग़लत है। बल्कि, उन्होंने लगातार इसके ख़िलाफ़ सटैण्ड लिया और जितनी सम्भव हद तक हो सका, इसे क़ाबू किया गया। पोस्तेशेव का मामला यहाँ ऊपर देख चुके हैं। इस प्लेनम से पहले ही ऐजोव के तीन डिप्टी बर्खास्त किए जा चुके थे। अप्रैल, 1938 में उसके अधिकार कम कर दिए गए, अगस्त में लवेंती बेरिया को एजोव का डिप्टी नियुक्त किया गया और उसका एन.के.वी.डी. में अस्तित्व लगभग ख़त्म कर दिया गया। नवम्बर में उसे पूरी तरह बर्खास्त कर दिया गया और अप्रैल, 1939 में एजोव गिरफ़्तार कर लिया गया।

पाँचवाँ झूठ – “लवेंती बेरिया के गैंग ने गिरफ़्तार किए गए लोगों में से अधिक से अधिक को मौत के घाट उतारने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया।”60 इस पूरे झूठ का मक़सद स्तालिन को बुरा दिखाना था क्योंकि स्तालिन और केन्द्रीय कमेटी ने दमन-चक्र को रोकने के लिए एन.के.वी.डी. में बड़े स्तर पर फ़ेरबदल शुरू किया था, और ख्रुश्चेव स्तालिन के इस क़दम को भी बुरा दिखाना चाह रहा था। लेकिन वास्तव में मामला पूरी तरह उल्टा है। बेरिया को नवम्बर, 1938 में एन.के.वी.डी. का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और उसके बाद गिरफ़्तारियाँ और सजाएँ तेज़ी से कम हुईं और गिरफ़्तार किए गए लोगों को रिहा किया जाने लगा। यहाँ तक कि ख्रुश्चेव द्वारा “स्तालिन के अत्याचारों के शिकार” लोगों के सम्मान को पुनःस्थापित करने के लिए कायम किए गए पोस्पेलेव कमिशन के आँकड़े भी ख्रुश्चेव के इस झूठ को स्पष्ट करते हैं, बाकी इतिहासकारों की तो बात ही अलग है। इसके अलावा यह भी याद रखा जाना चाहिए कि 1939–40 में गिरफ़्तारियाँ और सजाएँ भुगतने वाले अधिक लोगों में वे अधिकारी या पार्टी सदस्य थे जिन्हें बिना ज़रूरत के पार्टी सदस्यों को पार्टी से निकालने, झूठे मुक़दमे दर्ज करने और सजाएँ देने का दोषी पाया गया था।

साल 1935 1936 1937 1938 1939 1940
गिरफ़्तारियाँ 114456 88873 918671 629695 41627 127313
मौत की सजाएँ 1229 1118 353074 328618 2601 1863
स्रोत – ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाइड”, पृष्ठ 328

अब हम “मास्को मुक़दमे” की ओर वापिस आते हैं। तरह-तरह के इतिहासकारों जैसे राबर्ट कनकुएस्ट, सोलजिंत्सन, मेदवेदेव बन्धु, त्रॉत्सकीपंथियों आदि द्वारा यह ढिण्ढोरा पीटा जाता है कि मास्को मुक़दमे पूरी तरह “दिखावा” थे और सारे के सारे इकबालनामे पूरी तरह से जाली थे। क्या सभी लोग ऐसा ही मानते हैं, आइए देखें। सैन्य अफसरों के मुक़दमों को छोड़कर बाक़ी सारे मुक़दमे खुले हालों में चलाए गए और सभी देशों के राजदूतों, पत्रकारों और बहुत सारे लेखकों की मौजूदगी में चलाए गए। इनमें से कई ने बाद में इन मुक़दमों के सही होने और अपराधियों के इकबालनामे एकदम दरुस्त होने की बात क़बूली। इनमें से एडवर्ड डेवीज़ उस समय अमेरिका के सोवियत यूनियन में प्रधान राजदूत और ख़ुद वकील थे; 61 डी.एन. प्रिंट ब्रिटेन के राजदूत और विश्वप्रसिद्ध वकील थे; 61 अन्ना लूई स्ट्रांग एक अमेरिकी लेखक थी जिसे 1949 में सोवियत यूनियन से निकाला गया था, इसके बावजूद उसने अपनी किताब ‘स्तालिन युग’ में इन मुक़दमों के सही होने की पुष्टी की। इसके अलावा स्वीडन के राजदूत की गुप्त रिपोर्टें जो उस समय भेजी गईं, इस बात की गवाही देती हैं (लूडो मार्टंज़, मारियो सूसा, अन्ना लूई स्ट्रांग)। सैन्य अफसरों द्वारा सोवियत सरकार और बोल्शेविक पार्टी को उलटाने की साज़िश को तो त्रॉत्सकीपंथी लेखक इसाक डिऊशर जो स्तालिन के प्रति “आलोचनात्मक रुख” रखने के लिए मशहूर है, ने भी सही माना है। यह अलग बात है कि उसे दुख है कि स्तालिन ने ऐसा होने नहीं दिया!62 यह तो चलो सोवियत यूनियन में मुक़दमों और इकबालनामों की बात हुई, त्रॉत्सकी 1934 और इसके बाद खुलेआम सोवियत सत्ता और स्तालिन का तख्तापलट करने के लिए आवाज़ें कस रहा था।

“फासीवाद की जीत के लिए सबसे अहम परिस्थितियाँ कोमिण्टर्न ने पैदा कीं … हिटलर को पलटाने के लिए कोमिण्टर्न का सफाया करना ज़रूरी है।”62

“स्तालिनवादी कोमिण्टर्न और स्तालिनवादी कूटनीति ने हिटलर को दोनों हाथों से मदद की।”63

“कोमिण्टर्न नौकरशाही, सामाजिक-जनवादियों से मिलकर यूरोप को, वास्तव में पूरे विश्व को एक फासीवादी यातना शिविर में बदल देने के लिए हर सम्भव काम कर रही है।”63

“मज़दूरो, इस नौकरशाह कबाड़ से पीछा छुड़ाना सीखो।”64

“मज़दूरों को नौकरशाह दुस्साहसवादियों के सिद्धान्त और अमल को मज़दूर आन्दोलन से बाहर करना ही होगा।”64
यह 1934 की बात है, इसके बाद तो त्रॉत्सकी ने कितनी ही जगहों पर स्तालिन का तख्तापलट करने के लिए आवाज़ कसी। इसके बावजूद कोई यह सोचे कि त्रॉत्सकी ने सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने के बारे में नहीं सोचा होगा, यह मानने लायक नहीं लगता।

इसके अलावा, यह भी अक्सर शोर मचाया जाता है कि कारख़ानों और अन्य जगहों पर विध्वंस मचाने, तोड़-फोड़ की कार्रवाइयाँ होने आदि की कहानियाँ स्तालिन द्वारा गढ़ी या गढ़ाई गई थीं। पर इनकी पुष्टि करने वाले बहुत सारे लोग हैं। जॉन लिटलपेज और डीमारी बैस की किताब “इन सर्च ऑफ़ सोवियत गोल्ड” विश्व प्रसिद्ध है। लिटलपेज एक अमेरिकी इंजीनियर था जो 1928–37 तक कोयला खानों में विशेषज्ञ के रूप में सोवियत यूनियन में काम करने गया था। उसने अपनी किताब में तोड़-फोड़ होने की गवाही तो भरी ही है, साथ ही उसने इसकी कार्यप्रणाली (modus operandi) के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। एक अन्य अमेरिकी इंजीनियर जॉन स्कॉट ने अपनी किताब “बिहाइंड द यूराल्ज़” में इस तरह की तोड़-फोड़ की कार्रवाइयों का ज़िक्र किया है। हालाँकि इन दोनों किताबों के लेखक उस समय तक इन्हें साधारण रिश्वतखोरी के मामले समझते थे। लिटलपेज ने विदेशों से मशीनें खरीदने के सौदों में भी भ्रष्टाचार का ज़िक्र किया है जिसमें प्याताकोव शामिल था।65 अन्ना लूई स्ट्रांग ने अपनी किताब में इस तरह की कितनी ही उदाहरणें दी हैं जो उसने ख़ुद देखीं।66 यह ध्यान देने योग्य है कि 1934 से पहले इन अपराधों के लिए अक्सर सख्त सजाएँ नहीं दी जाती थीं, अक्सर पछतावा करने पर छोड़ दिया जाता था या किसी दूसरे क्षेत्र में काम करने के लिए भेज दिया जाता था।

अन्त में हम सफाई मुहिमों में मारे गए लोगों और जेलों या गुलाग शिविरों में भेजे गए लोगों की संख्या की तरफ़ आते हैं। कन्कुऐस्ट, सोलजिंत्सन आदि जो सफाई मुहिमों व पूरे स्तालिन काल के दौरान स्तालिन के “दमन” के “शिकार हुए लोगों” की संख्या के बारे में सभी तरह के स्तालिन-विरोधी प्रचार के गंगोत्री-स्रोत हैं, के मुताबिक़ पूरे स्तालिन काल के दौरान मारे गए लोगों की संख्या 1 करोड़ 20 लाख (कन्कुएस्ट) से लेकर 6 करोड़ 60 लाख (सोलजिंत्सन) तक जाती है इनके मुताबिक़ ये सभी राजनीतिक कैदी थे और सभी ही “मासूम” और “बेकसूर” थे और इनमें से 30 लाख तो 1937–38 में ही मारे गए। वास्तविक संख्या कितनी थी? इसके बारे में पेशेवर इतिहासकारों जैसे जॉन आर्च गैटी, ग्रोवर फर और रूसी इतिहासकारों वी.एन. जैमस्कोव, ए.एन. डुगिन आदि बहुत पहले इन दावों को झुठला चुके हैं।67 रिटर्सपोर्न के मुताबिक़, 1937–38 के वर्षों के दौरान, पार्टी में से निकाले गए लोगों की संख्या 2,78,818 थी जो कि उससे पहले होती रही सफाई मुहिमों के मुक़ाबले कम थी। गैटी के मुताबिक़, यह संख्या 1,80,000 थी।68 अमेरिकन हिस्टोरीकल रिव्यू में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ 1937–39 के दौरान गुलाग शिविरों में मरने वालों की संख्या 1 लाख 60 हज़ार थी न कि 30 लाख।69 येल्तसिन द्वारा सोवियत पुरालेखों के इंचार्ज बनाए गए वोल्कोगोनोव के मुताबिक़ 1 अक्टूबर, 1936 से लेकर 30 सितम्बर, 1938 तक सैन्य ट्रिब्यूनल द्वारा 30,514 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। 1930 और 1940 के दशकों के इस बेहद मुश्किल वक़्त में भी सोवियत यूनियन में बालिग आबादी का 2.4 प्रतिशत जेल में था, जबकि 1996 में अमेरिका का यही आँकड़ा 2.8 प्रतिशत था,70 भले ही अमेरिका में सोवियत यूनियन के उन हालातों जैसे हालात बिल्कुल भी नहीं थे। अमेरिका की जेलों में अपराधी और स्तालिन की जेलों में बेकसूर, यह है पूँजीवादी चाकरों का “लॉजिक”! इन आँकड़ों के बारे में अधिक विस्तार में जाना सम्भव नहीं है, इसके लिए बहुत अधिक साहित्य उपलब्ध है जो देखा जा सकता है।

सोवियत-जर्मन समझौता

एक और अहम मुद्दा है जिसे आधार बनाकर स्तालिन पर कीचड़ उछाला जाता है। लेकिन इस प्रचार में कभी नहीं बताया जाता कि सोवियत यूनियन ने फ्रांस और ब्रिटेन के साथ फासीवाद विरोधी मोर्चा बनाने और धुरी शाक्तियों द्वारा हमला होने की सूरत में एक-दूसरे की सैन्य मदद करने के लिए पूरा ज़ोर लगाया था लेकिन फ्रांस और ब्रिटेन के इरादे और थे। जब सितम्बर, 1938 में हिटलर ने चेकोस्लोवाकिया पर हमला बोला तो सोवियत यूनियन ने ब्रिटेन या फ्रांस में से एक की सहायता से चेकोस्लोवाकिया की रक्षा करने का प्रस्ताव रखा लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस तो चेकोस्लोवाकिया को हिटलर को सौंपने की तैयारी में थे ताकि हिटलर के पूर्व में बढ़ने की राह में आने वाली हर रुकावट हटाई जा सके। 30 सितम्बर, 1938 को म्यूनिख समझौते के अन्तर्गत, जिसमें सोवियत यूनियन को शामिल करने से इनकार कर दिया गया था और जिसे हमारे वक्तों की अमन की गारण्टी का नाम दिया गया था, चेकोस्लोवाकिया का एक हिस्सा हिटलर के हवाले कर दिया गया और हिटलर ने पूरे चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा करने में देर न लगाई। मार्च, 1939 तक जर्मनी और उसके संगियों पोलैण्ड और हंगरी ने बोहेमिया, कारपेथो-यूक्रेन, मोराविया, मैमल आदि पर कब्जा कर लिया। जर्मनी और इटली ने रस्मी तौर पर सैन्य व राजनीतिक गठजोड़ का ऐलान कर दिया; जर्मनी व जापान कोमिण्टर्न-विरोधी गठजोड़ पहले ही कायम कर चुके थे। मई, 1939 में जापान ने सोवियत यूनियन पर हमला कर दिया। बिल्कुल इसी समय, जब साम्राज्यवादी यह सोच रहे थे कि हिटलर पूर्व की ओर चढ़ाई करेगा और सोवियत यूनियन दोनों तरफ़ से उलझ जाएगा तो दिनों में ढह जाएगा, तब स्तालिन ने ऐसा कूटनीतिक पैंतरा खेला कि साम्राज्यवादी एक बार तो अवाक रह गए। अगस्त, 1939 में जर्मनी और सोवियत यूनियन के बीच एक-दूसरे पर हमला न करने का समझौता हो गया। यह शायद दुनिया का सबसे शानदार कूटनीतिक पैंतरा होगा!

इस समझौते से सोवियत यूनियन ने कई फायदे हासिल किए – पहला, अब उसे एक ही मोर्चे यानी जापान के साथ निपटना पड़ना था जिसे उसने अच्छी तरह हराया; दूसरा, नाज़ियों के ख़िलाफ़ तैयारी के लिए सोवियत यूनियन को महत्वपूर्ण ढाई वर्षों का समय मिल गया; तीसरा, ऐस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया जो गृहयुद्ध से पहले रूस का हिस्सा थे, को सोवियत गणराज्यों के तौर पर शामिल करके लेनिनग्राद तक जर्मनी की पहुँच को कुछ मुश्किल बना दिया; चौथा, गृहयुद्ध के समय पोलैण्ड द्वारा कब्जाए गए रूसी इलाके वापिस लेने का मौका मिल गया जिसके कारण नाज़ी सेना को काफ़ी बड़े मोर्चे पर हमला करना पड़ना था; पाँचवाँ और सबसे अहम, इस समझौते के साथ लड़ाई में ब्रिटेन और फ्रांस की “निष्पक्ष” रहने की चाल फुस्स हो गई क्योंकि अब लड़ाई जर्मनी के पश्चिमी मोर्चे से शुरू हुई और साम्राज्यवादियों को मजबूर होकर सोवियत यूनियन से समझौता करना पड़ा और सोवियत यूनियन धुरी शक्तियों के ख़िलाफ़ अकेला पड़ जाने से बच गया, भले ही ब्रिटेन-अमेरिका (फ्रांस पर जर्मनी का कब्जा हो गया था) ने सिर्फ़ शाब्दिक लड़ाई लड़ी और पश्चिम की ओर से मोर्चा 1944 में खोला गया जब हिटलर की हार तय हो चुकी थी! लेकिन फिर भी इससे इतना ज़रूर हो गया कि साम्राज्यवादी सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ हिटलर की मदद करने लायक न रहे। इस तरह जिस समझौते के लिए स्तालिन को बदनाम किया जाता है, उसके लिए तो स्तालिन को दाद देनी बनती है।

स्तालिन का नौकरशाही के ख़िलाफ़ और जनवाद के लिए संघर्ष

पार्टी में नौकरशाही और इसके ख़िलाफ़ संघर्ष को स्तालिन काफ़ी पहले ही पहचान चुके थे। 1928 में अपने लेख72 में स्तालिन लिखते हैं:

“… मसला सिर्फ़ पुराने नौकरशाहों तक ही सीमित नहीं है। असल मसला नए नौकरशाहों का है जो सोवियत सरकार के साथ हमदर्दी रखते हैं, और अन्त में कम्युनिस्ट नौकरशाहों का है। कम्युनिस्ट नौकरशाह सबसे ख़तरनाक किस्म का नौकरशाह होता है। क्यों? क्योंकि वह अपनी नौकरशाही को पार्टी सदस्यता के कार्ड के नीचे छिपा लेता है। और, दुर्भाग्य से, ऐसे कम्युनिस्ट नौकरशाह हमारी कतारों में बड़ी संख्या में हैं।

“सभी तरह के संगठनों में हम नौकरशाही को किस तरह ख़त्म कर सकते हैं?

“ऐसा करने का एक ही तरीक़ा है, और वह है नीचे से नियंत्रण कायम करना, हमारी संस्थाओं में फैली नौकरशाही, उनकी कमियों-कमज़ोरियों और उनकी गलतियों को नीचे से, मेहनतकश वर्ग के विशाल जन-समूहों द्वारा आलोचना को संगठित करना।

“मैं जानता हूँ कि हमारे संगठनों में मौजूद नौकरशाहाना विकृतियों के ख़िलाफ़ साधारण जनता के गुस्से को सक्रिय करने के वक्त कई बार हमारे ऐसे कामरेडों की उँगलियों पर पैर रखने पड़ेंगे जिन्होंने गुजरे समय में अहम सेवाएँ प्रदान की हैं लेकिन अब नौकरशाही के रोग से पीड़ित हैं। लेकिन क्या इस वजह से हमें नीचे से नियंत्रण कायम करने के अमल को रोकना चाहिए?

“इस तरह पार्टी का तात्कालिक काम यह बनता है कि: नौकरशाही के ख़िलाफ़ तीखा संघर्ष करना, नीचे से लोगों द्वारा आलोचना को संगठित करना, और इस आलोचना को पहचानते हुए और इसकी रौशनी में हमारी कमियों-कमजोरियों को दूर करने के लिए व्यावहारिक फैसले लेना।”

इसके बाद भी, स्तालिन के लेखन और भाषणों में नौकरशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष का बार-बार ज़िक्र आता है, लेकिन इसके लिए उनका ज़ोर अक्सर पार्टी सदस्यों की राजनीतिक शिक्षा, पार्टी सदस्यों द्वारा नेताओं की आलोचना आदि पर रहता है। जिस तरह ऊपर ज़िक्र में आए लेख में स्तालिन “साधारण जनता द्वारा आलोचना” का स्टैण्ड लेते हैं, इसी तरह का स्टैण्ड वह फिर से लेते दिखाई नहीं देते।

इसी तरह स्तालिन समाज में अधिक जनवाद के लिए संघर्ष भी चलाते हैं। इसकी सबसे तीखी अभिव्यक्ति 1936 के संविधान को लिखे जाने के वक्त होती है। संविधान तैयार करते समय स्तालिन ने सोवियतों के सदस्यों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव करवाने, कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों के अलावा दूसरे शहरी ग्रुपों द्वारा उम्मीदवार खड़े करने की आज्ञा होने, चुनाव-प्रचार और सार्वजनिक सभाओं में लोगों को उम्मीदवारों और पार्टी के व्यक्तियों से सवाल-जवाब करने और चुनावों के लिए गुप्त मतदान होने के पक्ष में दृढ़ स्टैण्ड लिया। उनके और मोलोतोव के ज़ोर देने पर संविधान में यह प्रस्ताव शामिल हुआ जबकि पहले मसविदे में बिना-मुकाबले चुनाव या प्रतिनिधियों के जरिए सोवियतों के सदस्य चुनने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन यह चुनाव कभी भी नहीं हुए।73

प्रत्यक्ष चुनावों को स्तालिन नौकरशाही पर लगाम कसने के एक ढंग के रूप में देखते थे, लेकिन जिस तरह 1928 के बाद घटनाओं का सिलसिला चला, उसने स्तालिन को “साधारण मेहनतकश जनता द्वारा आलोचना” के अपने विचार को विकसित करने का अवसर ही न दिया। दूसरा, जो ज्यादा महत्वपूर्ण कारण है, वह यह है कि स्तालिन 1936 तक शत्रुतापूर्ण वर्गों के ख़त्म होने और अप्रत्यक्षतः वर्ग संघर्ष ख़त्म होने के नतीजे तक पहुँच चुके थे। उनके लिए नौकरशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष बुर्जुआजी के ख़िलाफ़ संघर्ष का, बुर्जुआ विश्व दृष्टिकोण के ख़िलाफ़ संघर्ष का, यानी वर्ग संघर्ष का एक हिस्सा नहीं था, उनके लिए यह विध्वंसकारी एजेण्टों, तोड़-फोड़ करने वालों, जासूसों आदि के ख़िलाफ़ संघर्ष था जो, वह मुख्य रूप में, विदेशी पूँजीवादी सरकारों और राजनीतिक शत्रुओं द्वारा भेजे या पैदा किए गए मानते थे। स्वाभाविक ही इन परिस्थितियों और इस समझ के मुताबिक़ कोई भी इस नतीजे तक ही पहुँचेगा कि इस तरह के एजेण्टों के साथ निपटने के लिए खुफिया पुलिस और एजेंसियाँ ही पर्याप्त हैं। दूसरा, उनके चिन्तन के मुताबिक़ पार्टी जनता के लिए जिम्मेदार थी, पार्टी जनता के लिए एक पिता जैसी स्थिति में पहुँच गई थी। इसका आगे हम और ज़िक्र करेंगे।

स्तालिन और सोवियत वैज्ञानिकों में बहसें

वैज्ञानिकों पर दमन, वैज्ञानिक खोजों को दबाना और समूचे रूप में विज्ञान को पीछे खींचना, इसे तोड़ना-मरोड़ना और ज़बरदस्ती विज्ञान पर ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ लादना – यह दोष भी स्तालिन के ख़िलाफ़ और सामान्यतः कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ बुर्जुआ मीडिया और प्रचार का मुख्य हथियार बने रहते हैं। सोवियत यूनियन में विज्ञान पर कितनी रोक हो सकती है, इसका वैसे तो सीधा सा अन्दाजा इस बात से ही हो जाता है कि जिस तेज़ी से रूस जैसे बहुत ही पिछड़े देश ने विज्ञान में 1917 की क्रान्ति के बाद तरक्की की, वह विज्ञान पर दबदबा बनाने से सम्भव हो ही नहीं सकती। फिर भी कुछ बातें इस बारे में की जा सकती हैं। ईथन पोलाक नाम का एक अमेरिकी लेखक सोवियत यूनियन में विज्ञान और वैज्ञानिकों पर दमन के सबूत जुटाने के लिए सोवियत यूनियन के पुरालेखों का अध्ययन करने के लिए जाता है और 2006 में वह अपनी किताब “स्तालिन एण्ड सोवियत साईंस वार्ज़” पूरी करता है। किताब की भूमिका में ही यहाँ से शुरू करता है:

“जोसेफ स्तालिन ने सोवियत यूनियन पर शासन करते हुए बहुत सारी उपाधियाँ हासिल कीं। … दूसरे विश्व युद्ध के बाद, उसने एक और उपाधि हासिल की: “विज्ञान का मुखिया”। संगीत मण्डली के मुखिया के रूप में वह पोडीयम पर खड़ा हुआ और वैज्ञानिक उसके इशारों पर गा रहे थे।

“आखि़र स्तालिन एक स्कॉलर क्यों बनना चाहता था?”74

यह उद्धरण इसलिए दिया गया है कि लेखक कोई कम्युनिस्ट नहीं है, बल्कि स्तालिन का घोर विरोधी दिख रहा है। लेकिन अपनी किताब में जो जानकारियाँ वह देता है, यह किताब स्तालिन का पक्ष ले बैठती है। वह बताता है कि 1946 के बाद, विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में बहसों का आयोजन होता है और स्तालिन सहित पार्टी के अग्रणी नेता इन बहसों में शामिल होते हैं। अख़बारों के पन्नों पर विभिन्न राय रखने वाले वैज्ञानिकों के लेख रोज़ाना छपते थे ताकि साधारण जनता भी बहसों को पढ़ सके और बहसें महीनों चलती थीं। हालाँकि ईथन पोलाक की यह कोशिश है कि यह सिद्ध हो सके कि यह बहस विरोधियों को किनारे लगाने के लिए की जाती थीं, लेकिन उसके द्वारा दिए गए तथ्य उलटी कहानी बयान करते हैं।

दर्शन पर चली बहस के दौरान अलेक्सांद्रोव की किताब पर बहस चलती है, जिसके विचारों से स्तालिन सहमत नहीं थे। जदानोव ने अलेक्सांद्रोव की कई नुक्तों पर आलोचना रखी, लेकिन जैसा कि प्रचारित किया जाता है कि पार्टी से असहमत होने वाले वैज्ञानिकों को ख़त्म कर दिया जाता था, ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि बहस ख़त्म होने पर अलेक्सांद्रोव को इंस्टीच्यूट ऑफ़ फिलॉसफी का डायरेक्टर नियुक्त कर दिया गया।75 भाषा विज्ञान पर बहस में भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में सोवियत यूनियन में मान्यता प्राप्त अथारिटी निकोलाई मार से असहमति रखने वाले एक जार्जिया के वैज्ञानिक चिकोबावा ने अपने कई लेख स्तालिन तक पहुँचाए, जिसके बाद भाषा विज्ञान पर सार्वजनिक बहस खोल दी गई। स्तालिन ने भी इस विषय पर एक लम्बा लेख लिखा और निकोलाई मार की अवस्थिति को ग़ैर-मार्क्सवादी सिद्ध किया।75 इसी तरह जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, शरीर-क्रिया विज्ञान पर भी बहसों का आयोजन हुआ। यहाँ मुख्य बात यह नहीं है कि स्तालिन या पार्टी विज्ञान के किस नुक्ते पर ठीक थे या ग़लत, बल्कि यह है कि विज्ञान पर पाबन्दी जैसी सोवियत यूनियन में कोई चीज़ नहीं थी और न ही ऐसी कोई पार्टी नीति थी।

विज्ञान एक लोकप्रिय विषय बन चुका था:

“लाइसैंकों आन्दोलन … जिन सामाजिक हालातों में विकसित हुआ: … एक समाज जिसमें साक्षरता दर काफ़ी ऊँची थी और विज्ञान एक लोकप्रिय विषय बन चुका था जिसने जेनेटिक्स को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना दिया; एक ऐसी सांस्कृतिक क्रान्ति हो रही थी जिसके अन्तर्गत कम्युनिस्ट नौजवानों ने कुलीन अकादमीशियनों से मुकाबला करने का हौसला किया…”76

“वनस्पतिशास्त्र और जेनेटिक्स के वैज्ञानिकों के बीच मतभेद साधारण हालातों में कोई बड़ा मामला नहीं बनता था। परन्तु, 1930 के दशक में सोवियत हालातों में यह बहुत जल्दी एक सार्वजनिक मुद्दा बन गया। पेपरबैक संस्करणों के अमेरिका में एक बड़े मुनाफे वाला धन्धा बनने से बहुत पहले ही, सोवियत यूनियन में विश्व क्लासिक्स, वैज्ञानिक खोज संबंधित लेखन, कविता, और राजनीतिक लेखन हजारों लाखों की संख्या में सस्ते संस्करणों के रूप में छापा जाता था। पूरे विश्व में समाजवादी देशों के शहरों में किताबों की दुकानों की भरमार देखी जा सकती है। … ग़ैर-रूसी गणराज्यों में विज्ञान की अकादमियों की स्थापना की केन्द्रीय एशिया और काकेशस में जारशाही समय की मध्ययुगीनता ख़त्म करने में अहम भूमिका थी। विज्ञान में यह दिलचस्पी पुराने, परम्परागत समाजवादी विश्वास में जुड़ गई कि विज्ञान की मदद से संसार को बेहतर बनाया जा सकता है।”77

इस तरह, विज्ञान के ख़िलाफ़ व्यापक जिहाद नाम की कोई चीज़ सोवियत यूनियन में नहीं थी, स्तालिन के समय में भी नहीं। लेकिन सारा कुछ ठीक-ठाक था, ऐसा भी नहीं था, और एक वर्ग समाज में सब कुछ ठीक-ठाक होगा, ऐसा अगर कोई सोचता है तो यह उसकी ग़लती है या अधिक उम्मीदें हैं। कई वैज्ञानिकों को पार्टी की नाराज़गी झेलनी पड़ी, वैज्ञानिकों को सजाएँ भी हुईं और कई वैज्ञानिकों के लेखन को दबाया भी गया, ऐसा सम्भव है। एक बात नोट करने वाली है कि किसी भी वैज्ञानिक को सिर्फ़ उसकी वैज्ञानिक खोज या विचार को आधार बनाकर सजा हुई हो, ऐसी एक भी उदाहरण नहीं मिलती। जिन मामलों में सजाएँ हुईं, वे सारे मामले राजनीतिक थे। दूसरा, पार्टी में नौकरशाही कोई कम मज़बूत नहीं थी, और वहाँ भी नौकरशाह वैज्ञानिकों को बख्शते होंगे, मुश्किल है। तीसरा, सोवियत यूनियन की घरेलू और अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ; सोवियत वैज्ञानिकों और विश्व के दूसरे हिस्सों में जारी वैज्ञानिक कामों में आदान-प्रदान के अवसर बहुत सीमित थे। विज्ञान के उन क्षेत्रों में जिनमें देश की सुरक्षा से सम्बन्धित खोज-कार्य होते थे, उनमें पूँजीवादी देशों के जासूसों का ख़तरा समझा जाता था, जो समाजवादी संक्रमण के दौर की ग़लत समझ के कारण बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखा जाता था। दर्शन के क्षेत्र में अधूरी समझ, वैज्ञानिकों की तरफ़ से भी कम्युनिस्टों की तरफ़ से भी, बहुत बार परेशानी का सबब बनती थी। बाक़ी, पूँजीवादी देशों में भी मार्क्सवाद और कम्युनिज़्म के प्रति थोड़ा सा भी झुकाव रखने वाले वैज्ञानिकों की समस्याएँ भी कम नहीं थीं, और आज भी कम नहीं हैं, और उनका शैक्षणिक संस्थाओं व पाठयक्रमों में ब्लैकआउट होना अपवाद नहीं है। आइंस्टीन, स्टीफन गाउल्ड इसके बड़े उदाहरण हैं।

स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत यूनियन

कुल मिलाकर, स्तालिन के विरोधी स्तालिन के समय को रूस की बर्बादी, जनता पर अत्याचार और तानाशाही के दौर के रूप में पेश करते हैं। लेकिन क्या सचमुच ऐसा था? बिल्कुल भी नहीं। अब यह भी देख लें कि सोवियत यूनियन में स्तालिन के समय में कितनी “बर्बादी या तबाही” हुई है।

पहले विश्वयुद्ध और फिर गृहयुद्ध, जो वास्तव में सभी साम्राज्यवादी शक्तियों के ख़िलाफ़ युद्ध था क्योंकि प्रतिक्रान्ति की अप्रत्यक्ष मदद के अलावा इन्होंने सोवियत यूनियन को चारों तरफ़ से घेरा हुआ था, में बोल्शेविकों के नेतृत्व में सोवियत मज़दूरों और किसानों ने युद्ध जीतकर मानव-मुक्ति संघर्ष की नई गाथा लिखी। जब 1921 तक युद्ध के सात वर्ष ख़त्म हुए तो समूचा सोवियत यूनियन तबाही की कहानी बयान कर रहा था। कृषि में उत्पादन का स्तर विश्व युद्ध शुरू होने के समय के स्तर से आधे से कम रह गया था, अधिकतर इलाकों में अकाल की स्थिति थी। उद्योग में इससे भी बुरी हालत थी, औद्योगिक उत्पादन विश्व युद्ध से पहले के उत्पादन का सातवाँ हिस्सा था। अधिकतर खदानें तबाह हो चुकी थीं, कच्चे माल की भारी कमी थी। नई आर्थिक नीति आने के साथ स्थिति कुछ सँभली लेकिन उस समय के दौरान लेनिन का स्वास्थ्य जवाब देने लगा और जनवरी, 1924 में लेनिन की मौत हो गई। एक ऐसा देश, जहाँ निरक्षरता व्यापक थी, स्वास्थ्य ढाँचा लगभग था ही नहीं, तकनीकी विकास बहुत नीचे था, शहरों के बाहर बिजली न के बराबर थी, मज़दूर वर्ग और किसानों का संयुक्त मोर्चा मज़बूत नहीं था, चारों तरफ़ से विश्व पूँजीवाद की आर्थिक नाकाबन्दी से घिरा हुआ था और विश्व के नक्शे पर फासीवाद अपने पैर जमा चुका था, स्तालिन के सामने था जिसका नेतृत्व उनको आने वाले तीस वर्षों तक करना था। 1953 में जब स्तालिन की मौत होती है, उद्योग, विज्ञान, तकनीक व सैन्य शक्ति के तौर पर सोवियत यूनियन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी ताक़त बन चुका था और कई मामलों में अमेरिका को भी पीछे छोड़ चुका था। सभी नागरिकों के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएँ और निःशुल्क शिक्षा सुविधाएँ देने वाला सोवियत यूनियन दुनिया का पहला देश था। बेरोज़गारी ख़त्म थी, वेश्यावृति जैसी सामाजिक बुराइयों का सफाया किया जा चुका था, स्त्रियों की स्थिति किसी भी “सभ्य” देश से कहीं बेहतर थी। भुखमरी नाम की कोई चीज़ नहीं रह गई थी। यह सब कुछ दूसरे विश्वयुद्ध की भयंकर तबाही के बावजूद हुआ जिसमें सोवियत यूनियन के ढाई करोड़ लोग मारे गए, इससे कहीं अधिक जख्मी हुए, हिटलर की फासीवादी रेजिमेण्टों ने सोवियत यूनियन के आधे हिस्से को तबाह कर दिया था, और युद्ध की आर्थिक क़ीमत सोवियत यूनियन की दो पंचवर्षीय योजनाओं के उत्पादन के बराबर थी। सोवियत यूनियन के मज़दूरों व किसानों के राज्य की इन प्राप्तियों जिन्हें विकसित पूँजीवादी देशों द्वारा अपने स्वर्ण युग में भी हासिल करने के लिए कई गुणा अधिक समय लगा था और जो पूरी तीसरी दुनिया यानी विश्व की अस्सी प्रतिशत की उपनिवेशवादी लूट, अपने देश की बहुसंख्यक आबादी की लूट व दमन, और यहाँ तक कि गुलाम व्यापार जैसी घिनौनी प्रथा से हासिल की गई मोटी कमाई के कारण सम्भव हुई थीं, को पूँजीवादी जगत में कोई जड़-बुद्धि ही नकारता है।

1940 तक ही सोवियत यूनियन ऐसी ताक़त बन चुका था जो न सिर्फ़ हिटलर की औद्योगिक व सैन्य शक्ति से टक्कर लेने में सक्षम थी बल्कि उसे हराने के भी काबिल थी। हिटलरी जर्मनी जिसने फ्रांस जैसी साम्राज्यवादी शक्ति को अपनी कुछ ही डिवीजनों से एक महीने के भीतर ही मिट्टी में मिला कर रख दिया, पूरे यूरोप में उसकी सेना को रोकने वाला कोई दिखाई नहीं दे रहा था, ने 240 डिवीजनों में बँटी 30 लाख की सेना जो विश्व की सबसे अधिक प्रशिक्षित और हथियारों से सुसज्जित थी, से दो हजार मील लम्बे मोर्चे के जरिए सोवियत यूनियन पर हमला किया लेकिन आखिरकार न सिर्फ़ सोवियत यूनियन के हाथों हारा बल्कि लाल सेना ने समूचे पूर्वी यूरोप को मुक्त कराया। इस पूरी लड़ाई में सोवियत यूनियन लगभग अकेला रहा, ब्रिटेन व अमेरिका ने सिर्फ़ शाब्दिक लड़ाई लड़ी और जब हिटलर की हार तय हो चुकी थी तो पश्चिम से जर्मनी पर हमला करके अधिक से अधिक पूर्वी देशों पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए ताबड़तोड़ दौड़ लगाई। हालीवुड की फिल्मों और भाड़े के लेखकों द्वारा साम्राज्यवादी चाहे जितना मर्जी झूठ बोल लें लेकिन सच्चाई यही है कि फासीवादी जर्मनी को सोवियत समाजवादी राज्य को तबाह करने के लिए साम्राज्यवादियों ने खूब प्रेरित किया, अपने सहयोगियों की तबाही भी झेली लेकिन उन्होंने सोवियत लोगों की ताक़त को बहुत कम करके आँका था।

आखि़र कहाँ ग़लत थे स्तालिन

ऐसा नहीं है कि स्तालिन ने कोई ग़लतियाँ नहीं कीं, बेशक उन्होंने ग़लतियाँ कीं। लेकिन ग़लतियाँ वे नहीं जिनके बारे में पूँजीवादी मीडिया और चाकर बुद्धिजीवी शोर मचाते हैं, बल्कि कहीं और हैं। स्तालिन की गलतियों का मूल्यांकन करते हुए ऐतिहासिक नज़रिया अपनाना बहुत ज़रूरी है, न कि स्तालिन को परिस्थितियों से अलग करके एक व्यक्ति के तौर पर देखना, जैसा कि सब तरह के बुर्जुआ लेखक करते हैं (वह भी बहुत भद्दे रूप में), या त्रॉत्सकीपंथी या अन्य “मार्क्सवादी” करते हैं। स्तालिन की गलतियों के स्रोत वस्तुगत भी हैं, और मनोगत भी।

वस्तुगत कारणों में पहला कारण तो वह अन्तरराष्ट्रीय और घरेलू परिस्थितियाँ थीं, जिसके दौरान स्तालिन ने सोवियत यूनियन का नेतृत्व सँभाला। इनके बारे में हम ऊपर काफ़ी चर्चा कर आए हैं। इन प्रतिकूल परिस्थितियों में सोवियत सत्ता का अस्तित्व बनाए रखना ही एक बड़ा प्रश्न था, जिसमें स्तालिन न सिर्फ़ कामयाब रहे, बल्कि उन्होंने समूचे देश का नक़्शा बदल कर रख दिया, इसके बावजूद कि उनके कार्यकाल के दौरान दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही के भयंकर छः वर्ष भी सोवियत यूनियन ने झेले। दूसरा, स्तालिन के सामने पूर्व के समाजवादी निर्माण का कोई तजुर्बा नहीं था जिससे वह कुछ भी सीख सकते। समाजवाद का निर्माण मानवता के लिए एकदम नया रास्ता था जिस पर मानवता ने पहली बार चलना था। और तो और, उस समय तो यह भी प्रश्न हल नहीं था कि एक अकेला देश समाजवाद के निर्माण की तरफ़ बढ़ भी सकता है या नहीं, बोल्शेविक पार्टी के अधिकतर सिद्धान्तकार ही ऐसा सम्भव नहीं मानते थे और सबकी उम्मीद यूरोपीय क्रान्ति पर लगी हुई थी। यूरोपीय क्रान्ति भी नहीं हुई और बिल्कुल उसी समय पार्टी को लेनिन की मौत का नुक़सान झेलना पड़ा। इस स्थिति में स्तालिन ने न सिर्फ़ एक देश में समाजवाद की अवस्थिति अख्तियार की, बल्कि उसकी पूरी दृढ़ता से हिफ़ाज़त की, इसे सैद्धान्तिक रूप में सिद्ध किया और व्यवहार में लागू करके दिखाया जो अपने-आप में ही एक महान-प्राप्ति है।

तीसरा, स्तालिन को समाजवाद की जो समझ विरासत में मिली, वह ही सीमित थी (भले ही यह सीमाएँ ऐतिहासिक थीं)। समाजवाद के निर्माण का अर्थ मुख्य रूप से उत्पादक शक्तियों के विकास से लिया जाता था ताकि उत्पादन इतना बढ़ जाए कि क्रय-विक्रय का प्रश्न ही ख़त्म हो जाए, उत्पादक शक्तियों का विकास निस्संदेह मज़दूर वर्ग की सत्ता का लक्ष्य है, लेकिन यह विकास उत्पादन सम्बन्धों के निरन्तर विकास के साथ जुड़ा हुआ है, यह समझ अभी विकसित नहीं हुई थी। स्तालिन भी इसी समझ के दायरे के भीतर ही सोच रहे थे, हालाँकि 1952 में छपी ‘सोवियत यूनियन में समाजवाद की आर्थिक समस्याएँ’ नामक अपनी किताब में वह इस नतीजे तक पहुँच चुके हैं कि समाजवाद में माल उत्पादन जारी रहता है, जिसका मतलब स्पष्ट है कि समाज में वर्गों का अस्तित्व है। इसके साथ ही वह यहाँ तक कहते हैं:

“बेशक, हमारे मौजूदा उत्पादन सम्बन्ध ऐसे दौर में हैं जब यह उत्पादक शक्तियों के विकास के लिए पूरी तरह अनुकूल हैं … परन्तु … यह जानते हुए कि उत्पादन सम्बन्धों का विकास उत्पादक शक्तियों के विकास से पीछे रह जाता है, और पीछे रहेगा भी, वहाँ निश्चित ही अन्तरविरोध मौजूद हैं, और मौजूद रहेंगे।

अगर इन समस्याओं को अनदेखा किया गया जैसा कि याराशेनको कर रहा था, “तो उत्पादन सम्बन्ध उत्पादक शक्तियों के और आगे के विकास में गम्भीर रुकावट बन सकते हैं।”

लेकिन यह समाजवादी समाज के अन्तरविरोधों के बारे में ठोस विश्लेषण नहीं था, यह एक अमूर्त नतीजा था। इसके साथ ही उनके अपने चिन्तन में यांत्रिक भौतिकवादी विचलन था, वह विरोधियों की एकता और संघर्ष के बुनियादी नियम को पूरी तरह से और मुख्य नियम के तौर पर समझने में नाकाम रहे। विरासत में मिली समाजवाद की अर्थवादी समझ और चिन्तन में यांत्रिक भौतिकवाद का विचलन वह मनोगत कारण बने जिनके कारण स्तालिन समाजवाद के संक्रमण काल की उस समझ तक पहुँचने में नाकाम रहे जिस तक बाद में माओ पहुँचे। वह समाजवाद के संक्रमणकाल को सैद्धान्तिक स्तर पर समझने में नाकाम रहे, भले ही अनुभववादी ढंग से समाजवाद के दौरान आने वाली समस्याओं और रुकावटों से लड़ते रहे।

वह उत्पादक शक्तियों और उत्पादन सम्बन्धों के बीच के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध, और आधार व अधिरचना में द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध होने की समझ से दूर रहे; आधार व अधिरचना में से उनके लिए आधार ही प्रमुख बना रहा और आधार में, उत्पादक शक्तियों और उत्पादन सम्बन्धों में से उनका मुख्य ज़ोर उत्पादक शक्तियों पर रहा। इससे बहुत सारी गड़बड़ियाँ पैदा हुईं जो अब हमें सोवियत समाजवाद को पीछे मुड़कर देखते हुए दिखाई देती हैं।

उत्पादक शक्तियों में भी उनका मुख्य ज़ोर मनुष्य पर नहीं, बल्कि तकनीक के विकास पर रहता है, उनके मुताबिक़ “जब तकनीक तैयार कर ली गई हो, तो हमें ऐसे आदमियों की ज़रूरत है जो उस तकनीक को पूरी तरह इस्तेमाल कर सकते हों …” सिर्फ़ इन्हीं अर्थों में ही वह यह कहते हैं कि “इसलिए पुराने नारे ‘तकनीक हर बात का फ़ैसला करती है’ की जगह हमें नारा देना चाहिए – ‘कार्यकर्ता सब चीज़ों का फ़ैसला करते हैं।’”78

स्तालिन ने वर्गों के अस्तित्व के बारे में भी ग़लत समझ बनाई। 1936 में जब सोवियत यूनियन में क़ानूनी रूप में निजी सम्पत्ति का खात्मा हो जाता है तो स्तालिन इसे शत्रुतापूर्ण वर्गों का खात्मा समझ लेते हैं। इसलिए उनके लिए समाजवादी समाज के भीतर वर्ग संघर्ष के मौजूद होने का प्रश्न ही अप्रत्यक्षतः ख़त्म हो जाता है। वर्ग संघर्ष के ख़त्म होने के नतीजे ने समाजवादी समाज में जनता के बीच अन्तरविरोधों को समझने, और हल करने के प्रश्न को भी ख़त्म कर दिया। अन्तरविरोधों की ग़लत समझ उनसे निपटने के ग़लत ढंगों में अभिव्यक्त हुई, जिसके कारण ज्यादतियाँ हुईं। इसी कारण से वर्ग संघर्ष को ठीक ढंग से चलाया भी नहीं जा सका। जैसा कि हम पहले भी देख चुके हैं कि पार्टी और सरकार में नौकरशाही की समस्या के बारे में स्तालिन 1928 में ही गहराई से सोच रहे थे। अपने निबन्ध ‘नीचे से सार्वजनिक आलोचना संगठित करो’ में स्तालिन ने इससे निपटने के लिए नीचे से आलोचना यानी साधारण जनता को नौकरशाहों के ख़िलाफ़ संगठित करने पर ज़ोर दिया। लेकिन यह समझने के बावजूद स्तालिनकाल में नौकरशाहों के ख़िलाफ़ जनान्दोलन संगठित नहीं किए गए बल्कि हर बार जब नौकरशाही व प्रतिक्रान्तिकारियों के ख़तरे ने सिर उठाया और इनके ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा गया तो उनके साथ प्रशासनिक ढंगों से ही निपटा गया। प्रशासनिक ढंगों के जरिए नौकरशाही से कभी भी निपटा नहीं जा सकता, जिसके कारण नौकरशाही पार्टी और सरकार में अपनी जड़ें जमाती गई और स्तालिन की मौत के बाद पार्टी का नेतृत्व हथियाने में कामयाब हो गई।

उनके मुताबिक़, जब कोई आर्थिक आधार ख़त्म हो जाता है तो उसके अनुसार अधिरचना भी ख़त्म हो जाती है। वह समाज में व पार्टी में बुर्जुआ विचारों के प्रभाव को नहीं देख सके और न ही नई बुर्जुआजी के पैदा होने के स्रोत को ही पहचान सके। वह यह नहीं समझ पाए कि समाजवाद के दौरान तीन बड़े फर्क – उद्योग व कृषि के बीच का फर्क, गाँव व शहर के बीच का फर्क और दिमागी श्रम व शारीरिक श्रम के बीच का फर्क बने रहते हैं, बुर्जुआ विचारों के पनपने की ज़मीन बनी रहती है और पूँजीवादी पुनर्स्थापना का ख़तरा बना रहता है। यह सारा कुछ माओ ही समझ सके, वह भी शायद इसलिए कि उनके सामने सोवियत यूनियन का समाजवादी तजुर्बा और वहाँ पुनर्स्थापना का तजुर्बा मौजूद था और सोवियत यूनियन के मुकाबले कम मुश्किल अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ थीं।

एक और नतीजा जो इस ग़लत समझ के कारण सामने आया, वह यह था कि स्तालिन पूँजीवादी पुनर्स्थापना के लिए विदेशी हमले को मुख्य कारक समझते थे, न कि अन्दरूनी कारकों को। सोवियत समाज के भीतर ही बुर्जुआजी के पैदा होने व उस द्वारा सत्ता हथियाकर पूँजीवादी मार्ग पकड़ लेने की सम्भावना पर ज़ोर नहीं दिया गया। इसलिए जो भी किया गया वह अनुभववादी ढंग से किया गया, न कि सैद्धान्तिक नीति द्वारा। हर प्रतिक्रान्तिकारी साजिश या कार्रवाई या अभिव्यक्ति को साम्राज्यवादी साजिश माना गया न कि सोवियत समाज के भीतर चल रहे वर्ग संघर्ष की अभिव्यक्ति। क्योंकि ख़तरा मुख्यतः विदेशी साजिश माना जाता रहा, यह भी प्रतिक्रान्तिकारियों व नौकरशाहों से निपटने के लिए जनान्दोलन खड़े करने के स्थान पर प्रशासनिक ढंगों पर ज़ोर देने का एक कारण बना। प्रशासनिक ढंगों पर अधिक ज़ोर देने के कारण राज्य के कामों में जनता की भागीदारी बढ़ने और अधिक से अधिक हद तक राजकीय कामों को जनता की निगरानी के नीचे लाने का काम बहुत पिछड़ा रहा। कतारों में और साधारण जनता में क्रान्तिकारी चौकसी विकसित नहीं हो सकी। अब यह सामने आ रहा है कि नौकरशाही और पूँजीवादी-पंथी पार्टी और सरकारी तंत्र पर व्यापक रसूख रखते थे और बहुत बार पार्टी के फैसले लागू भी नहीं करते थे या ग़लत ढंग से लागू करते थे, जिसे लाल झण्डे को हराने के लिए लाल झण्डा ज्यादा ज़ोर से लहराना कहा जाता है। इसी कारण इनके कारनामों का कलंक भी समूची पार्टी और स्तालिन पर लगा। इसका मतलब यह नहीं कि स्तालिन व पार्टी के अग्रणी नेताओं को नौकरशाही व पूँजीवादी-पंथियों के पार्टी में प्रभाव का पता नहीं था, उन्हें अच्छी तरह पता था। लेकिन प्रश्न उनसे निपटने का था जिसे हल करने में वे नाकाम रहे।

लेकिन यह भी सच है कि स्तालिन की गलतियों के मुकाबले उनका योगदान कहीं अधिक बड़ा है। यह स्तालिन ही थे जिन्होंने लेनिन की मौत के बाद गैर-लेनिनवादी धाराओं को हराया। यह स्तालिन ही थे जो सोवियत यूनियन में समाजवाद के निर्माण की अवस्थिति पर तब भी डटे रहे जब अधिकतर पुराने बोल्शेविक इस राह से भटक गए थे। यह स्तालिन ही थे जिन्होंने समाजवाद के निर्माण को आगे बढ़ाया, पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू कीं और दुनिया का पहला समाजवादी राज्य कायम किया। यह स्तालिन ही थे जिनके नेतृत्व में एक तबाह-बर्बाद देश विश्व की दूसरी बड़ी ताक़त बनकर उभरा, वह भी विश्वयुद्ध की तबाही झेलते हुए और अपने दम पर। यह स्तालिन ही थे जिनके नेतृत्व में सोवियत यूनियन ने नाजी युद्ध-मशीन तबाह की और दुनिया को फासीवादी ख़तरे से बचाया। हिटलर सोवियत यूनियन को जीतने के बाद क्या करता आज इसके बारे में सिर्फ़ सोचा ही जा सकता है।

मसले और भी हैं जैसे स्पेन के गृहयुद्ध में सोवियतों और साम्राज्यवादियों की भूमिका, यूनान की घटनाओं में स्तालिन की भूमिका, चीनी क्रान्ति में स्तालिन की भूमिका, आदि। लेकिन ये मुद्दे फिलहाल बहस से बाहर हैं। इसके अलावा स्तालिन की शख्सियत के बारे में तरह-तरह के आनुवांशिक, नस्ली आधार और ग़रीब-मज़दूर पृष्ठभूमि के आधार बनाकर जो कुछ प्रचार त्रॉत्सकीपंथी और बुर्जुआ प्रचारक करते हैं, उसकी “वैज्ञानिकता” में इतनी “वैज्ञानिकता” नहीं है कि उस पर समय खराब किया जाए। वैसे भी व्यक्तित्व-विश्लेषण उस व्यक्ति के पास बचा हुआ आखिरी हथियार होता है जिसके पास हर तरह की दलील ख़त्म हो जाती है और ऐसे हारे भगोड़े व्यक्तित्व-विश्लेषण के पर्दे के नीचे निजी कुत्साप्रचार ही करते हैं, इसका जवाब स्तालिन ने अपने समय में भी नहीं दिया क्योंकि व्यवहार में आपकी राजनीति क्या है, वर्गीय अवस्थिति क्या है, यही सब कुछ तय करने का पैमाना होता है और यही वह पैमाना है जिससे पूँजीवादी चाकर, निम्न-बुर्जुआ बुद्धिजीवी, त्रॉत्सकी व उसके पैरोकार सबसे अधिक डरते हैं। अन्त में, स्तालिन अपनी गलतियों व कमजोरियों के बावजूद, मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनता के महान नेता थे, यही कारण है कि सोवियत यूनियन टूटने के बाद बुर्जुआ आजादी की वास्तविकता सामने आई तो लोग फिर से लेनिन-स्तालिन के पोस्टर लेकर सड़कों पर हैं। स्तालिन को रूस में तीसरे सबसे अधिक लोकप्रिय नेता के तौर पर चुना गया और यहाँ तक कि मौजूदा रूसी पूँजीवादी निज़ाम भी स्तालिन के नाम को भुनाने की कोशिशें कर रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद, पूँजीपति वर्ग को आज भी कम्युनिज़्म का और कम्युनिस्ट नेताओं का भूत उतना ही सता है, जितना मार्क्स के कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखते समय सता रहा था।

सन्दर्भ

1. त्रॉत्सकी, माई लाइफ, Pathfinder Press, New York, 1970, पृष्ठ 512, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 19

2. त्रॉत्सकी, रूसी क्रान्ति का इतिहास, भाग-3, अन्तिका – 1, इण्टरनेट संस्करण

3. त्रॉत्सकी, ‘लेनिनवाद या त्रॉत्सकीवाद’ से

4. इआन ग्रे, स्तालिन – मैन ऑफ़ हिस्ट्री, पृष्ठ 159, लूडो मार्टंज़, ‘अनैदर व्यू ऑफ़ स्तालिन’ (इण्टरनेट संस्करण, पी.डी.एफ.) में से दिया उद्धरण, पृष्ठ 25 (इसके बाद जहाँ भी लूडो मार्टंज़ का उद्धरण दिया जाता है, वहाँ उसका अर्थ लूडो मार्टंज़, “Another View of Stalin” ही लिया जाए)

5. लेनिन, Closing Speech On The Political Report Of The Central Committee Of The R.C.P.(B.) March 28, https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1922/mar/27.htm

6. त्रॉत्सकी: ‘ईस्टमैन की किताब सिन्स लेनिन डाइड के बारे में’, बोल्शेविक 16; 1 सितम्बर, 1925, पृष्ठ 68, ग्रोवर फर द्वारा अपनी किताब ‘ख्रुश्चेव लाइड’ में उद्धृत, अंग्रेजी से अनुवाद हमारा, ज़ोर हमारा। विस्तार के लिए देखें: त्रॉत्सकी, लियून, “त्रॉत्सकी द्वारा दो बयान”। “वामपंथी विरोधी गुट की चुनौती”

7. Lenin, Letter to the Congress, https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1922/dec/testamnt/congress.htm

8. लेनिन, ऐनेसा आर्मा को पत्र, 19 फरवरी, 1917

9. त्रॉत्सकी, माई लाइफ, Pathfinder Press, New York 1970, पृष्ठ 479–480

10. मार्टिन निकोलस, सोवियत संघ में पूँजीवादी पुनर्स्थापना (हिन्दी), राहुल फाउण्डेशन, पृष्ठ 22

11. लेनिन, संग्रहित रचनाएँ, (अंग्रेजी संस्करण), भाग – 33, पृष्ठ 65; मार्टिन निकोलस द्वारा उपरोक्त में उद्धरण, पृष्ठ 23

12. मौरिस डाब, Soviet Economic Development since 1917, Routledge & Kegan Paul Ltd., 1949, p150

13. लेनिन, संयुक्त राज्य अमेरिका के नारे के बारे में, 23 अगस्त, 1915, ज़ोर हमारा।

14. Leon Trotsky, The Program of Peace, 1915–16, in Nashe Slovo
http://www.marxists.org/history/etol/newspape/fi/vol05/no09/trotsky.htm

15. त्रॉत्सकी, “रूसी क्रान्ति का इतिहास”, खण्ड-3 की अन्तिका

16. त्रॉत्सकी, “लेनिन के बाद तीसरी इण्टरनेश्नल”, 1928,
http://www.marxists.org/archive/trotsky/1928/3rd/ti03.htm#p1-08

17. स्तालिन, ‘लेनिनवाद की समस्याएँ’, अंग्रेजी संस्करण, पीकिंग, 1976, पृष्ठ 208

18. ई.एच.कार, Foundations of a Planned Economy, vol. 2, New York: The MacMillan Company, 1971, p7, 10–12, 20; लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 126

19. उपरोक्त, पृष्ठ 28–29, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 126

20. उपरोक्त, पृष्ठ 42, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 127

21. उपरोक्त, पृष्ठ 60, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 127

22. उपरोक्त, पृष्ठ 67, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 127

23. त्रॉत्सकी, “लेनिन के बाद तीसरी इण्टरनेश्नल”, 1928, अनुवाद व ज़ोर हमारा

24. त्रॉत्सकी, “स्थाई क्रान्ति”, पाठ-7, आकार प्रकाशन, पृष्ठ-238, अनुवाद हमारा

25. त्रॉत्सकी, “स्थाई क्रान्ति” की भूमिका में से, पृष्ठ-125, आकार प्रकाशन, अनुवाद हमारा

26. स्तालिन, केन्द्रीय कमेटी का 4–12 जुलाई, 1928 का प्लेनम, औद्योगिकीकरण और अनाज की समस्या, 9 जुलाई, 1928 को दिए भाषण में से

27. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 52

28. RW Davies, The Industrialization of Soviet Russia I: Socialst Offensive; The Collectivization of Soviet Agriculture, 1929–1930; Cambridge, Massachusetts: Harvard University Press, 1980, p 4–5; लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 127

29. उपरोक्त, पृष्ठ 32, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 53

30. ई.एच. कार, Foundations of a Planned Economy, vol. 2, New York: The MacMillan Company, 1971, p65; लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 127

31. उपरोक्त, पृष्ठ 73, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 127

32. RW Davies, p112, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 58

33. RW Davies, p40–41, केन्द्रीय कमेटी की 5 जनवरी, 1930 की मीटिंग में हुए फैसले “सामूहिकीकरण की रफ़्तार और कोलखोज खड़े करने में राजकीय मदद के बारे में” के उद्धरण से, लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 70

34. अन्ना लूई स्ट्रांग, स्तालिन युग, हिन्दी, फिलहाल प्रकाशन, पृष्ठ 46

35. RW Davies, p 262–263, 442; लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 77

36. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 63

37. विस्तार के लिए देखें – अन्ना लूई स्ट्रांग, स्तालिन युग, 27–39

38. प्रावदा, 6 जनवरी, 1930; केन्द्रीय समिति का ‘सामूहिकीकरण की रफ़्तार’ के बारे में फ़ैसला से, ‘लेनिनवाद की समस्याएँ’, अंग्रेजी संस्करण, पीकिंग, 1976, पृष्ठ 500 पर उद्धृत

39. स्तालिन, ‘सफ़लता से चक्कर’, ‘लेनिनवाद की समस्याएँ’, अंग्रेजी संस्करण, विदेशी भाषा प्रेस, पीकिंग, 1976, पृष्ठ 483–491

40. RW Davies, p442–443, Table 17; लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 82

41. RW Davies, p419, Table 17; लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 83

42. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 63

43. Charles Bettelheim, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 74

44. केन्द्रीय कमेटी का प्रस्ताव, लूडो मार्टंज़ द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 75

45. Douglus Tottle, Fraud, Famine, and Fascism: The Ukrainian Genocide Myth from Hitler to Harvard, pdf copy on http://rationalrevolution.net/special/library/famine.htm

46. Anantnarayan; Panikar, Text Book of Microbiology, Orient Longman

47. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 91–95

48. स्तालिन, The Tasks of Business Executives (Speech Delivered at the First All-Union Conference of Leading Personnel of Socialist Industry), February 4, 1931, http://www.marxists.org/reference/archive/stalin/works/1931/02/04.htm

49. ख्रुश्चेव का “गुप्त भाषण” से, ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाइड”, पृष्ठ 41–42, 271–73

50. जे. आर्क गैटी, The Great Purges Reconsidered, PhD Thesis Boston College, Chap 5, 1979, p326; राबर्ट थ्रस्टन, Life and Terror in Stalin’s Russia 1934–1941, Yale University Press, 1998 p35; Marc Jansen, Nikita Petrov. Stalin’s Loyal Executioner: People’s Commissar Nikolai Ezhov 1895-1940. Hoover Institution Press, 2002, p54; ग्रोवर द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 42

51. J Arch Getty, “Trotsky in Exile: The Founding of Fourth International” Soviet Studies 38 No. 1, January, 1986, 28 and n. 19 p34; ग्रोवर द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 42

52. ख्रुश्चेव का “गुप्त भाषण” से, ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाइड”, पृष्ठ 42

53. http://www.marx2mao.com/Stalin/MB37.html

54. ख्रुश्चेव का “गुप्त भाषण” से, ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाइड”, पृष्ठ 45

55. ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाइड”, पृष्ठ 280–281

56. J Arch Getty and Oleg V Naumov, The Road to Terror: Stalin and the Self-Destruction of the Bolsheviks 1932–1939, Yale University Press, 1999, p517

57. ख्रुश्चेव का “गुप्त भाषण” से, ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाइड”, पृष्ठ 73

58. केन्द्रीय कमेटी के जनवरी, 1938 के प्लेनम का फ़ैसला; लूडो मार्टंज़, Another View of Stalin, Internet edition, p185–86 पर उद्धृत

59. लूडो मार्टंज़, Another View of Stalin, Internet edition, p187

60. ख्रुश्चेव का “गुप्त भाषण” से, ग्रोवर फर, “ख्रुश्चेव लाइड”, पृष्ठ 75

61. Mário Sousa, “The class struggle during the thirties in the Soviet Union – The purges of the CPSU and the political trials”,2001, http://www.mariosousa.se/TheclassstruggleduringthethirtiesintheSovietUnion050801.html

62. Deutscher, Isaac. Stalin; A Political Biography. New York: Oxford Univ. Press, 1967, p379; लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 168–69

63. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 131

64. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 132

65. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 142–44

66. अन्ना लूई स्ट्रांग, स्तालिन युग, पृष्ठ 73–77

67. Victims of the Soviet Penal System in the Pre-War Years: A First Approach on the Basis of Archival Evidence, J. Arch Getty, Gábor T. Rittersporn and Viktor N. Zemskov, The American Historical Review, Vol. 98, No. 4 (Oct., 1993), p1017–1049, Published by: Oxford University Press

68. Mario Sousa, Lies Concerning the History of the Soviet Union, http://www.northstarcompass.org/nsc9912/lies.htm

69. उपरोक्त

70. Gábor T. Rittersporn, लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 187 पर उद्धृत

71. Getty, A. Origins of the Great Purges. Cambridge, N. Y.: Cambridge Univ. Press, 1985, p176, लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 188

72. स्तालिन, ‘नीचे से आलोचना संगठित करो’ (यह लेख यंग कम्युनिस्ट लीग की आठवीं कांग्रेस के सामने 16 मई, 1928 को दिए गए भाषण का हिस्सा है), Essential Stalin, Rahul Foundation, 2010, p221, अनुवाद हमारा

73. लूडो मार्टंज़, पृष्ठ 116–118; Grover Furr, Stalin and Struggle for Democratic reforms, http://clogic.eserver.org/2005/furr.html

74. ईथन पोलाक, “स्तालिन एण्ड सोवियत साईंस वार्ज़” प्रिंस्टन यूनीवर्सिटी प्रेस, भूमिका

75. Stalin and the Defence of Science, review of ‘Stalin and the Soviet Science Wars’ by Ethan Pollock in 2006 http://www.lalkar.org/issues/contents/nov2008/stalinscience.html

76. Richard Levins and Richard Lewontin, The Dialectical Biologist, Aakar publishers; 2009, p164

77. उपरोक्त, p184

78. स्तालिन, लाल सैनिकों की अकादमी के स्नातकों के सामने भाषण, 4 मई, 1935

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