हमारा यह स्पष्ट और दृढ़ मत है कि मार्क्सवाद की एकमात्र सार्थकता सामाजिक व्यवहार का मार्गदर्शक होने में है। दुनिया की तमाम व्याख्याओं का अन्तिम लक्ष्य उसे बदलना ही हो सकता है। और जैसा कि प्लेख़ानोव ने कहा था, ज़िन्दा लोग ज़िन्दा सवालों पर सोचते हैं। ज़ाहिर है कि ”’शोध के लिए शोध” हमारा उद्देश्य नहीं हो सकता। ‘अरविन्द मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान’ के शोध-अध्ययन-विषयक तमाम उपक्रमों का लक्ष्य उन सैद्धान्तिक प्रश्नों का हल ढूँढ़ने की कोशिशों में हाथ बँटाना है, जो आज विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के समक्ष जीवन्त-ज्वलन्त प्रश्न के रूप में मौजूद हैं। इनमें से कुछ प्रश्न बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की सफलताओं-विफलताओं के विश्लेषण-समाहार से जुड़े हुए हैं। नयी सर्वहारा क्रान्तियों की पूर्वपीठिका तैयार करने के लिए समाजवाद की समस्याओं और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना के कारणों पर गहन एवं व्यापक शोध-अध्ययन की ज़रूरत है। यह ज़रूरत इसलिए भी और अधिक है कि अकर्मक अकादमिक मार्क्सवादियों ने इस विषय पर थोक भाव से लिखकर काफ़ी विभ्रम फैला रखा है और ज़्यादातर युवा वाम बुद्धिजीवी क्रान्तियों के बुनियादी दस्तावेज़ों तथा बहसों और सैद्धान्तिक लेखन की मूल सन्दर्भ-सामग्री के बजाय अकादमिक वाम, ‘फ्रैंकफ़र्ट स्कूल’ और ‘न्यू लेफ़्ट’ की विभिन्न उपधाराओं के बुद्धिजीवियों को ही पढ़कर दिग्भ्रमित होते रहते हैं।
दूसरा प्रश्न, भूमण्डलीकरण के दौर में विश्व पूँजीवाद की संरचना, उत्पादन एवं विनिमय की प्रक्रिया तथा उसके राजनीतिक एवं सांस्कृतिक-वैचारिक अधिरचनात्मक तन्त्र को सांगोपांग समझने का है। इसे समझना मज़दूर प्रतिरोध के नये रूपों तथा विश्व सर्वहारा क्रान्ति की नयी लाइन के विकास के लिए ज़रूरी है।
तीसरा प्रश्न, जो दूसरे से ही जुड़ा हुआ है, वह है भारत और तमाम अन्य उत्तर-औपनिवेशिक, कृषि प्रधान देशों के सामाजिक-आर्थिक विकास की गतिकी की सांगोपांग समझ हासिल करना, इन देशों के औद्योगिक विकास तथा भूमि-सम्बन्धों के पूँजीवादी रूपान्तरण का अध्ययन करना, राजनीतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक परिवर्तनों का अध्ययन करना तथा साम्राज्यवाद और देशी पूँजी के बीच के सम्बन्धों की प्रकृति का अध्ययन करना।
चौथा प्रश्न, भारत के औद्योगिक और ग्रामीण मज़दूर आन्दोलन को नयी परिस्थितियों में संगठित करने से, उसकी दिशा और रास्ता तय करने से तथा भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास तथा उसके पुनर्निर्माण की चुनौतियों एवं कार्यभारों का अध्ययन करने से जुड़ा हुआ है।
पाँचवाँ, भारत में सर्वहारावर्गीय सांस्कृतिक आन्दोलन नये सिरे से खड़ा करने की चुनौतियों और कार्यभारों के सन्दर्भ में सांस्कृतिक आन्दोलन के इतिहास और सैद्धान्तिक प्रश्नों पर शोध-अध्ययन भी संस्थान का एक अहम कार्यभार होगा।
संस्थान के शोध अध्ययन का छठा दायरा मार्क्सवादी दृष्टि से संचार-माध्यमों का अध्ययन (मीडिया स्टडीज़) होगा। टी.वी.-कम्प्यूटर-इण्टरनेट और डिजिटल तकनोलॉजी ने जनमानस तक मीडिया की पहुँच के दायरे को न केवल बहुत अधिक बढ़ा दिया है, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को शासक वर्ग के वैचारिक-सांस्कृतिक वर्चस्व का सबसे प्रभावी साधन बना दिया है। आज दुनिया में मीडिया का मार्क्सवादी अध्ययन एक ज्वलन्त विषय बना हुआ है और हम भी इसे ज़रूरी समझते हैं। प्रश्न केवल बुर्जुआ मीडिया और ”संस्कृति उद्योग” के अध्ययन-विश्लेषण का ही नहीं है, बल्कि वैकल्पिक मीडिया और वैकल्पिक सांस्कृतिक माध्यमों के विकास का भी है।
शोध-अध्ययन का सातवाँ एजेण्डा दार्शनिक-सैद्धान्तिक दायरा होगा। सामाजिक जीवन, सामाजिक चेतना और प्रकृति-विज्ञान के सतत् विकास के साथ दर्शन के बुनियादी प्रश्नों पर बहस और चिन्तन भी गहराई में उतरते जाते हैं और व्यापक होते जाते हैं। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के निरूपण और व्याख्या को लेकर बहस आज भी जारी है। ऐतिहासिक भौतिकवाद की कई अवधारणाओं की अलग-अलग व्याख्याएँ की जाती हैं। क्वाण्टम भौतिकी और सापेक्षिकता के सामान्य सिद्धान्त के एकीकरण के लिए जारी सैद्धान्तिक कार्य और वाद-विवाद का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के विकास से सीधा रिश्ता है और इससे जुड़े प्रश्नों पर सुधी चिन्तक-वैज्ञानिक काफ़ी काम कर रहे हैं। एक सैद्धान्तिक मुद्दा उत्तर-आधुनिकतावाद और उसकी सहचरी बुर्जुआ विचार-सरणियों की मार्क्सवादी समालोचना में योगदान का भी है। ज़िज़ेक और एलेन बैदियू जैसे नव मार्क्सवादी बुद्धिजीवी और कई ”मुक्त चिन्तक” बन चुके मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन भी मार्क्सवादी दर्शन, समाजवादी प्रयोगों, पार्टी-राज्यसत्ता-वर्ग के अन्तरसम्बन्धों, वर्ग और जेण्डर के अन्तरसम्बन्ध आदि अनेक ऐसे प्रश्नों पर काफ़ी कुछ लिख रहे हैं, जिन पर क्रान्तिकारी मार्क्सवादी अवस्थिति प्रस्तुत करना और ‘पॉलिमिक्स’ में उतरना बेहद ज़रूरी है।
ऐसे सभी मुद्दों को पहले से सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता, हम केवल विषयवस्तु के दायरे की बात कर सकते हैं।
‘अरविन्द मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान’ उपरोक्त विषयों पर सामूहिक और व्यक्तिगत स्तर पर शोध-अध्ययन करने वाले साथियों को अपने पुस्तकालय और ‘डॉक्युमेण्टेशन सेण्टर’ से (जिनकी स्थापना की तैयारी जारी है) आवश्यक सामग्री की सहायता उपलब्ध करायेगा। चूँकि हम किसी भी प्रकार का सरकारी या संस्थागत अनुदान नहीं लेंगे, और केवल लक्ष्य से सहमत नागरिकों के व्यक्तिगत अनुदान ही हमारा मुख्य स्रोत होंगे अतः शोध-अध्ययन करने वाले साथियों को शोधवृत्ति दे पाना हमारे लिए सम्भव नहीं होगा, लेकिन स्वीकृत शोध-अध्ययन परियोजनाओं में लगे साथियों को पुस्तकालय, डॉक्युमेण्टेशन सेण्टर, इण्टरनेट आदि की निःशुल्क सुविधा के अतिरिक्त संस्थान के परिसर में निर्धारित अवधि के लिए निःशुल्क आवास और ‘न लाभ न हानि’ आधार पर संचालित मेस की सुविधा उपलब्ध करायी जायेगी। संस्थान की स्क्रीनिंग कमेटी की स्वीकृति के बाद, शोध सामग्री को संस्थान प्रकाशित-मुद्रित करने की ज़िम्मेदारी ले सकता है।
संस्थान के परिसर में वर्ष भर विभिन्न विषयों पर संगोष्ठी (सेमिनार), विचारगोष्ठी (सिम्पोज़ियम), परिसंवाद (कोलोकियम) और कार्यशालाएँ (वर्कशॉप) आयोजित की जायेंगी, जिनमें पढे़ गये आलेखों/शोधपत्रों के संकलन प्रकाशित किये जायेंगे।
संस्थान अपनी एक वेबसाइट चलायेगा, जिस पर मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट आन्दोलन के सैद्धान्तिक-व्यावहारिक प्रश्नों पर सामग्री प्रस्तुत की जायेगी। मीडिया और समाज पर केन्द्रित एक ई-जर्नल भी निकालना हमारी दूरगामी योजना में शामिल है।
मार्क्सवाद की एक सैद्धान्तिक पत्रिका का प्रकाशन इस वर्ष से शुरू हो जायेगा। साहित्य-संस्कृति की वैचारिकी ‘सृजन-परिप्रेक्ष्य’ का पुनर्प्रकाशन भी सम्भवतः अगले वर्ष से शुरू हो जाये। अब इसका प्रकाशन संस्थान की ओर से ही होगा।
संस्थान फ़िलहाल लखनऊ स्थित एक भवन से अपना काम शुरू करेगा। हमारी कोशिश है कि यथाशीघ्र लखनऊ महानगर के निकट कहीं हम मनोरम प्राकृतिक परिवेश वाला एक परिसर विकसित कर लें, लेकिन इसमें कुछ वर्षों का समय तो लग ही जायेगा।
हम देश भर के सहयात्री साथियों से अपील करते हैं कि वे पुस्तक-पत्रिकाओं के अपने व्यक्तिगत संग्रह, कम्युनिस्ट आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन व अन्य सामाजिक आन्दोलन से सम्बन्धित दस्तावेज़, कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, संस्कृतिकर्मियों व लेखकों के निजी दस्तावेज़ और पत्र-व्यवहार संस्थान के पुस्तकालय और डॉक्युमेण्टेशेन सेण्टर, को दानस्वरूप प्रदान करें। हम ऐसी हर ऐतिहासिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित-संरक्षित करने का वचन देते हैं।