बोलिवारियन विकल्पः विभ्रम और यथार्थ

बोलिवारियन विकल्पः विभ्रम और यथार्थ

सनी, अरविन्‍द

आलेख प्रस्‍तुत करते हुए सनी

आलेख प्रस्‍तुत करते हुए सनी

लातिन अमेरिका में ‘गुलाबी ज्वार’ (Pink) की परिघटना तमाम बौद्धिक तबकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। वेनेजुएला, बोलीविया, इक्वाडोर, उरुग्वे में खुद को वामपन्थी बताने वाली सरकारों की संसदीय मार्ग से स्थापना को ही गुलाबी ज्वार का नाम दिया गया है। इसे गुलाबी यानी हल्का लाल इसके संसदीय चरित्र के कारण कहा गया है। इस गुलाबी ज्वार ने उन “मार्क्सवादियों” को एक बार पुनः सक्रिय कर दिया है जो नयी क्रान्तियों की परियोजना तैयार करने की बजाय हताशा और निराशा में मार्क्सवादी सिद्धान्त में नये-नये किस्म के “इज़ाफ़े” करने में व्यस्त थे। अब ऐसे तमाम वामपंथी बुद्धिजीवियों समाजवाद के संस्थापकों स्तालिन और माओ को तानाशाहों के रूप में पेश कर रहे हैं और मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु को निशाना बनाते हुए अब बोलिवारियन विकल्प को ही 21 वीं शताब्दी का समाजवाद घोषित कर रहे हैं। माइकल लेबोवित्ज़, मारता आनेकर, इस्तवान मेस्ज़ारोस और अपने देश के एजाज़ अहमद, प्रभात पटनायक आदि जैसे संशोधनवादी बुद्धिजीवी और कुछ ग्रुप व वामपंथी पत्रिकाएँ बोलिवारियन विकल्प के नायकों का खूब स्तुति गान कर रहे हैं। बोलिवारियन विकल्प वामपंथी और उग्रपरिवर्तनवादी बौद्धिक व राजनीतिक दायरों में नये समाजवादी विकल्प के तौर पर दर्ज़ हो रहा है और, ह्यूगो शावेज के शब्दों में, सोवियत समाजवाद के “राज्यवाद” का एक नया विकल्प बन रहा है।
यह 21वीं सदी का नया “समाजवाद” क्या है? इसका आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम क्या है? क्या अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करणों का समय सच में ही बीत चुका है? क्या ‘शीत प्रासाद पर धावे’ का युग बीत चुका है? मेस्ज़ारोस के शब्दों में, क्या क्रान्तियों के नये संस्करण अब चुनाव के रास्ते सरकारों में जाने के रूप में ही हो सकते हैं? इस प्रकार के तमाम सवालों का जवाब देकर ही इस ‘21वीं सदी के समाजवाद’ की मूल अन्तर्वस्तु की सही और सटीक पहचान की जा सकती है क्योंकि साम्राज्यवाद-विरोधी होना, कल्याणकारी नीतियों को लागू करना और लोकप्रिय जनवादी संस्थाओं की स्थापना अपने आप में समाजवाद का द्योतक नहीं है। सच है कि अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण कहीं घटित होते नज़र नहीं आ रहे हैं। अरब जनउभार, ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो’ आन्दोलन व यूरोप से लेकर एशिया और पूरी दुनिया में उठे छिटपुट आन्दोलन किसी युगान्तरकारी राजनीतिक व आर्थिक-सामाजिक परिवर्तनों की तरप़फ़ इशारा नहीं कर रहे हैं। आज साम्राज्यवाद के ऐसे दौर में जब पूँजीवाद-विरोधी जनान्दोलन स्वतःस्फूर्त रूप से फूटते हुए नज़र आ रहे हैं लेकिन कहीं भी पूँजीवाद का कोई व्यावहारिक विकल्प खड़ा होता नहीं नज़र आ रहा है, जब अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के निकट भविष्य में निर्मित होने की कोई सम्भावना नहीं नज़र आ रही है, तो ऐसे में कोई भी जनपक्षधर स्वप्नद्रष्टा व्यक्ति दो तरह की उम्मीदों में जी सकता है। एक तो है वैज्ञानिक आशावाद जिसमें आशावाद की बुनियाद किसी ठोस समाजवादी मॉडल की वर्तमान दुनिया में मौजूदगी या ऐसे किसी मॉडल के निकट भविष्य में निर्मित हो जाने की सम्भावना नहीं है बल्कि एक वैज्ञानिक इतिहासबोध, जनता और समाज विकास के विज्ञान पर भरोसा होता है। दूसरे किस्म की उम्मीद है एक प्रकार का छद्म आशावाद। इतिहास बोध से वंचित और जनसंघर्षों से कटे तमाम बुद्धिजीवियों को अपने निराशावाद को ढकने के लिए किसी न किसी छद्म विकल्प की ज़रूरत होती है ताकि वे एक छद्म आशावाद में जी सकें। जनता से कटे और हवाई-गुलाबी सपनों में जीने वाले ऐसे बुद्धिजीवी जो कुछ मौज़ूद है उसी से काम चला लेने के पक्षधर होते हैं और पुरानी चीज़ों को ही नये नाम देकर उसे ही नये के तौर पर प्रस्तुत करते रहते हैं ताकि इनका जश्न मना सकें और नया विकल्प खड़ा करने की ज़हमत से भी बचा जा सके। आज हम मेस्ज़ारोस, लोबोवित्ज़, मारता आनेकर, और ‘पिंक टाइड’ के रंग में रंगे ‘मंथली रिव्यू स्कूल’ से जुड़े बुद्धिजीवियों को इसी प्रकार के छद्म आशावाद पालने वाले बुद्धिजीवियों के रूप में देख सकते हैं। न सिर्फ ये लोग बल्कि हमारे देश में भी ऐसे ग्रुप और बुद्धिजीवी मौज़ूद हैं जो इस ‘निराशावादी आशावाद’ के शिकार हैं। चूँकि इन्हें अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण कहीं संघटित होते नज़र नहीं आ रहे हैं, इसलिए ये अपनी निराशा और एक प्रकार के क्षोभ को छिपाने के लिए बोल उठते हैं कि अब ‘शीत प्रासाद पर धावे’ का दौर बीत चुका है और अब लातिन अमेरिकी बोलिवारियन विकल्प ही आज का समाजवादी विकल्प है; कि अब हम मार्क्स और लेनिन के दौर से काफी आगे निकल चुके हैं और अब बोलिवारियन विकल्प ही समाजवाद के स्वप्न का समकालीन साकार रूप है।

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