उत्तर-मार्क्सवाद के ‘कम्युनिज़्म’: उग्रपरिवर्तन के नाम पर परिवर्तन की हर परियोजना को तिलांजलि देने की सैद्धान्तिकी

उत्तर-मार्क्सवाद के ‘कम्युनिज़्म’:  उग्रपरिवर्तन के नाम पर परिवर्तन की हर परियोजना को तिलांजलि देने की सैद्धान्तिकी

शिवानी, बेबी

शिवानी अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए

शिवानी अपना आलेख प्रस्‍तुत करते हुए

“उत्तर-मार्क्सवाद के ‘कम्युनिज़्म’” इस विषय पर एक आलेख की ज़रूरत क्यों? क्या मार्क्सवाद का दौर बीत चुका है और कोई उत्तर-मार्क्सवादी दौर शुरू हो गया है? इस आलेख के आरम्भ में ही हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमारे विचार में एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद के सामने कोई संकट नहीं है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मार्क्सवाद पर विचारधारात्मक हमलों का सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है। फ़र्क बस इतना है कि 1989 में बर्लिन की दीवार के गिरने और 1990 में सोवियत संघ के औपचारिक विघटन के साथ विचारधारा और राजनीति की दुनिया में पूँजीवादी विजयवाद की उन्मत्त घोषणाओं की तरह ये नये बौद्धिक आक्रमण उतने खुले और आवरणहीन नहीं हैं। आज के दौर में, एक बार फिर, बुर्जुआ सांस्कृतिक और बौद्धिक उपकरण मार्क्सवाद पर नये हमले कर रहे हैं और कम्युनिस्ट आन्दोलन से लेकर छात्रों, बुद्धिजीवियों आदि के बीच एक विभ्रम पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी अनायास नहीं है कि पूँजीवाद, अपने वर्चस्वकारी मैकेनिज़्म के ज़रिये सहज गति से तमाम क़ि‍स्म के रंग-बिरंगे ‘रैडिकल’ बुद्धिजीवियों को पैदा कर रहा है, जो मार्क्सवाद की बुनियादी प्रस्थापनाओं पर चोट कर रहे हैं। उत्तर-मार्क्सवादियों की एक पूरी धारा है जो उग्र-परिवर्तनवादी जुमलों का सहारा लेकर मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी अर्न्तवस्तु पर निशाना साध रही है। ऐलन बेज्यू, स्लावोय ज़ि‍ज़ेक, एण्टोनियो नेग्री, माइकल हार्ट, याक्स रैंशिये, अर्नेस्टो लाक्लाऊ, चैण्टेल माउफ आदि जैसे तमाम “रैडिकल दार्शनिक” इसी उत्तर-मार्क्सवादी विचार-सरणि से आते हैं। एक बात जिसे यहाँ पर विशेष तौर पर रेखांकित करने की ज़रूरत है वह यह कि मार्क्सवाद पर जो भी विचारधारात्मक-बौद्धिक हमले होते रहे हैं या फिर हो रहे हैं, उनके नाम नये हो सकते हैं लेकिन उनकी अन्तर्वस्तु में कुछ भी नया नहीं है, जैसा कि एक बार एक अलग सन्दर्भ में ज्याँ पॉल सार्त्र ने कहा था। सार्त्र ने कहा था कि मार्क्सवाद-विरोधी विचारधाराएँ जो कुछ सही कह रही हैं, वह मार्क्सवाद पहले ही कह चुका है और जो कुछ वे नया कह रही हैं वह ग़लत है! उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, प्राच्यवाद, उत्तर-प्राच्यवाद, सबऑल्टर्निज्म जैसी तमाम ‘उत्तर-’ विचार-सरणियों की “चुनौतियों” का क्या हश्र हुआ, यह हम सभी जानते हैं। ये सभी विचार-सरणियाँ विचारधारात्मक कोमा में पड़ी आख़ि‍री साँसें गिन रही हैं! उत्तर-मार्क्सवादी दर्शन और सिद्धान्त इन्हीं क़िस्म-क़िस्म की ‘उत्तर-’ विचार सरणियों का एक ‘अपग्रेडेड वर्जन’ है।
हालाँकि मार्क्सवाद पहले ही ऐसे तमाम विचारधारात्मक और सैद्धान्तिक हमलों का जवाब दे चुका है; लेकिन आज जो नये विचारधारात्मक हमले हैं, वे कम से कम ऊपर से पूँजीवाद की अन्तिम विजय की बात नहीं कर रहे हैं। उल्टा वे पूँजीवाद से आगे जाने और कई बार ‘कम्युनिज़्म’ की बात कर रहे हैं। लेकिन जैसे ही आप उनके ‘कम्युनिज़्म’ के विस्तार में जाते हैं तो आप पाते हैं कि उसमें नाम के अतिरिक्त कुछ भी कम्युनिस्ट नहीं है! वे मार्क्सवाद से ज़्यादा ‘रैडिकल’ किसी विचारधारा की माँग रख रहे हैं, मार्क्सवाद से आगे जाने का दावा कर रहे हैं, और मार्क्स की शिक्षाओं की प्रासंगिकता समाप्त होने का दावा कर रहे हैं; उनका दावा है कि हम मार्क्सवादी कम्युनिज़्म से आगे आ चुके हैं और अब उत्तर-मार्क्सवादी कम्युनिज़्म का दौर है! आगे हम इनके उत्तरमार्क्सवादी ‘कम्युनिज़्मों’ की अन्तर्वस्तु की विस्तार से पड़ताल करेंगे। लेकिन एक बात तय है कि एक बार फिर क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन का एक अहम कार्यभार यह भी बन जाता है कि ऐसे विचारधारात्मक हमलों के बरक्स न सिर्फ मार्क्सवाद की दृढ़ता से हिफ़ाजत की जाए बल्कि इन हमलों का मुँहतोड़ जवाब भी दिया जाए और दिखलाया जाए कि इन ‘नये’ हमलों में कुछ भी नया नहीं है और दरअसल पुराने बुर्जुआ सिद्धान्तों की ‘शराब’ को ही नयी फैशनेबुल फ्रांसीसी दर्शन की ‘बोतल’ में परोस दिया गया है।

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